16 दिसंबर की वो रात इतनी भयानक होगी, यह उसने कभी सोचा भी नहीं होगा. पिता से वादा किया था कि वह अपनी सभी जिम्मेदारियां निभाएगी लेकिन शाम होते-होते वह एक ऐसी दुर्घटना का शिकार हो गई जिसकी कल्पना मात्र से ही इंसानी रूह तक कांप उठती है. राजधानी दिल्ली में 16 जनवरी की रात जो हुआ उसके बारे में दोबारा किसी को बताने की जरूरत नहीं है, उस खौफनाक तारीख के बारे में पूरा देश जानता है. लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी भारत का कानून असहाय साबित हो रहा है क्योंकि गैंग रेप की बेहद अमानवीय और निर्मम दुर्घटना में सबसे क्रूर किरदार निभाने वाले अभियुक्त को नाबालिग करार दे भारतीय कानून उसके लिए एक मददगार की भांति सहायता कर रहा है.
एक नहीं दो-दो बार बलात्कार और फिर शरीर में रॉड डाल आंते बाहर निकाल चलती बस से नीचे फेंकने जैसा घिनौना काम इसी नाबालिग ने किया था, तो फिर किस आधार पर भारतीय कानून और दंडाधिकारी उस हैवान को मासूम बता उसकी सजा कम करवा रहे हैं?
जो इंसान इतनी क्रूरता के साथ एक लड़की के शरीर में रॉड डाल सकता है, जो एक लड़की को चलती बस से नीचे फेंक सकता है, जो इंसानियत को इस तरह तार-तार कर सकता है, क्या उसे मासूम नाबालिग माना जाना चाहिए? क्या मात्र 6 महीने की सजा के बाद यह दानव समाज में खुला घूमेगा?
हैवानियत की हद नहीं
उस रात उन पांच व्यक्तियों में एक ऐसा लड़का भी था जो अवयस्क था, उसकी उम्र लगभग 17 साल 6 महीने की थी. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि बलात्कार करते समय उसी ने इंसानियत की सारी हदें पार की और यही नहीं उसी ने ही पीड़िता के अंगो को सबसे ज्यादा नुकसान भी पहुंचाया था. इतना सब करने के बाद भी उसकी हैवानियत कम नहीं हुई और उसने लड़की के शरीर में रॉड डालकर उसके अन्दर के अंगों को भी जख्मी कर दिया. कोई इंसान इस हद तक भी जा सकता है, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. लड़की के शरीर को अपनी क्रूरता से छलनी करने वाले इस तथाकथित नाबालिग मासूम लड़के ने उसे मृत समझ बस से नीचे भी फेंक दिया था.
नाबालिगों की गुण्डागर्दी
इस नाबालिग लड़के के दिमाग में इतनी क्रूरता कहां से आई इसका जवाब शायद किसी के पास ना हो लेकिन अकसर इसी उम्र के लड़के लगातार समाज को ठेस पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं.
हम अपने ही समाज पर नजर डाले तो पाएंगे कि एक खास वर्ग के बच्चों का असामाजिक कृत्यों में संलिप्त होना एक सामान्य सी बन गई है. 14 से 17 वर्ष तक के लड़कों का बसों में पॉकेट मारना, लड़कियों पर कमेंट पास करना, अश्लील हरकतें करना, नशाखोरी आदि में शामिल होना आम बात हो गई है.
निश्चित ही यह उम्र भटकने वाली होती है जिसके परिणामस्वरूप इसी उम्र में किशोर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो समाज के लिए खतरा साबित हो रहे हैं. पुलिस और परिवार वाले अकसर इन्हें नाबालिग और बचकाना समझकर छोड़ देते हैं जिसकी वजह से इनकी दुष्टता और अधिक बढ़ जाती है.
ऐसे में अगर भारतीय कानून में इन नाबालिगों को भी सही और उपयुक्त सजा का प्रावधान हो तो शायद समाज में कुछ सुधार की गुजांइश है.
14 से 17 और 18 साल की उम्र के लड़के ना सिर्फ आपको निचले और गरीब तबके में ऐसी हरकतें करते हुए मिलेंगे बल्कि अमीर और मध्यम वर्गीय परिवारों में भी इनका यही हाल है. गरीब और निचले तबके के अधिकतर परिवार इस उम्र के बच्चों पर कंट्रोल नहीं रखते. कई परिवारों को तो पता ही नही होता कि उनका बच्चा क्या कर रहा है और क्या नहीं. मध्यम वर्गीय परिवारों में अवश्य ही बच्चों पर अधिक ध्यान दिया जाता है लेकिन यहां भी लड़का अगर कोई गलती करते हुए पकड़ा जाए तो उसे लड़का समझ या उसके कॅरियर का वास्ता दे मामला रफा-दफा कर दिया जाता है. कई बार तो ऐसा भी होता है कि अगर लड़का किसी लड़की को छेड़ दे तो लड़के वाले उलटा लड़की को ही बुरा-भला कहने लगते हैं. वहीं अमीरजादों की हरकतों की वजह सभी को पता है. पैसा और पॉवर के मद में कई युवा अंधे हो जाते है.
वक्त रहते नहीं टोकना
हमारे समाज में लड़कियों को तो बचपन से ही उनकी सीमाएं बताई जाने लगती है कि क्या करना है क्या नहीं करना है, लेकिन लड़को को कुछ भी समझाया नहीं जाता है. परिवार वाले समझते हैं कि ये तो लड़का है इनको इन पाबंदियों की कोई जरूरत नहीं है और उनकी किसी भी गलती कोलड़का समझ कर रफा-दफा कर देते हैं, जिसका नतीजा हमें आज देखने को मिल रहा है. आज भी कुछ ऐसे वर्ग हैं जिनमें लड़को के साथ किसी भी प्रकार की सख्ती नहीं बरती जाती जिसके परिणामस्वरूप लड़के इतनी बड़ी-बड़ी घटनाओं को अंजाम देते हैं. हाल में हुआ गैंग रेप इसी का एक घिनौना उदाहरण है.
इस गैग रेप में शामिल नाबालिग पर निम्नलिखित आरोप लगाए गए :
1. दो बार युवती से रेप करने का आरोप.
2. युवती के शरीर में इसी नाबालिग ने रॉड डाली थी.
3. मरा हुआ समझकर इसने ही अपने साथियों को उसको सड़क पर फेंक देने की सलाह दी थी.
यह पढ़कर कोई नहीं कह सकता है कि किसी नाबालिग की सोच इतनी भयावह भी हो सकती है. ऐसे में हमारे कानून में इनके लिए सजा का प्रावधान तो है लेकिन हमारा समाज इससे संतुष्ट नहीं है और अगर हम तार्किक और नैतिक स्तर पर देखें तो यह सजा बहुत ही कम है.
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सजा
जुवेनाइल जस्टिस धारा 15 जी केयर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड के मुताबिक 16-18 उम्र के आरोपियों को दोषी करार होने पर उन्हें किसी भी संगीन अपराध में अधिक से अधिक तीन वर्ष की सजा सुनाई जा सकती है.
वहीं जुवेनाइल जस्टिस की धारा 16 के मुताबिक किसी भी दोषी को सिर्फ उसकी 18 वर्ष की आयु पूरी होने तक ही बाल सुधार गृह में रखा जा सकता है. 18 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद उसको वहां से रिहा कर दिया जाता है ऐसे में जबकि इस मामले में नाबालिग की उम्र को 17 वर्ष छह माह और ग्यारह दिन बताया गया है, तो नियमानुसार अधिकतम 4-6 माह के लिए ही बाल सुधार गृह में रहना पड़ सकता है.
अब सवाल यह खड़ा होता है कि इतना संगीन जुर्म करने के बाद भी क्या इस नाबालिग को 4-6 महीने की सजा पर्याप्त है? कानून यह क्यों नहीं समझता कि जब तक उसको कोई कड़ी सजा नहीं मिलेगी वो नहीं सुधरेगा. क्या गारंटी है की इतनी कम सजा पाने के बाद वो सुधर जाएगा? क्या वह बाहर आने के बाद फिर उस कहानी को नहीं दोहराएगा? आखिर 6 महीने की सजा से उसे क्या सीख मिल जाएगी?
आज हमारे समाज के सामने यह बहुत बडा सवाल है पर जवाब किसी के पास नहीं है, यहां तक कि हमारे कानून भी इस मसले पर असहाय सा ही नजर आ रहा है. लेकिन हम सब जानते हैं कि भारतीय कानून में संशोधन होते रहे हैं और आगे भी हो सकते हैं. अब समय आ चुका है कि नाबालिगों के संदर्भ में भी कानून बदले.
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