प्रेम व करुणा दोनों ही एक दूसरे के पूरक विषय है ....एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं....फिर भी डॉ. हरिवंश राय बच्चनजी का विश्लेषण न केवल सही है बल्कि उपयुक्त भी है...
प्रेम स्वयं-स्फूर्त हो सकता है लेकिन करुणा उपजति है, बनती है, जन्म लेती है....बस यही फर्क मुझे दिखता है....हो सकता है प्रेम में करुणा का अभाव हो लेकिन करुणा में प्रेम अवश्य होता है....
प्रेमी के कई मायने हो सकते है प्रेमी भी भिन्न भिन्न रूप में मिलते है ....रिश्ते के अनुसार प्रेम का प्रकार व असर बदलते जाता है....प्रेम में स्वार्थ एक अनिवार्य दुर्गुण है ....स्वार्थ के बगैर प्रेम संभव नहीं ....माँ अपने कातिल पुत्र के लिए भी क्षमाशील होती है उसकी ढाल होती है ...वहीँ एक सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए अपनी जान कुर्बान करने में जरा भी वक़्त नहीं लगाता .....
प्रेम को पग-पग पर परीक्षाएं देनी होती है करुणा के साथ ऐसा कोई बंधन नहीं होता ...एक विद्यमान है जबकि दूसरा आवरण मात्र है....
करुणाशील व्यक्ति चोट खाया हुआ, सुधरा हुआ, सबक सीखा हुआ व्यक्ति होता जबकि प्रेमी केवल नैसर्गिक गुण अवगुण का वाहक होता है.....
प्रेम स्वयं-स्फूर्त हो सकता है लेकिन करुणा उपजति है, बनती है, जन्म लेती है....बस यही फर्क मुझे दिखता है....हो सकता है प्रेम में करुणा का अभाव हो लेकिन करुणा में प्रेम अवश्य होता है....
प्रेमी के कई मायने हो सकते है प्रेमी भी भिन्न भिन्न रूप में मिलते है ....रिश्ते के अनुसार प्रेम का प्रकार व असर बदलते जाता है....प्रेम में स्वार्थ एक अनिवार्य दुर्गुण है ....स्वार्थ के बगैर प्रेम संभव नहीं ....माँ अपने कातिल पुत्र के लिए भी क्षमाशील होती है उसकी ढाल होती है ...वहीँ एक सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए अपनी जान कुर्बान करने में जरा भी वक़्त नहीं लगाता .....
प्रेम को पग-पग पर परीक्षाएं देनी होती है करुणा के साथ ऐसा कोई बंधन नहीं होता ...एक विद्यमान है जबकि दूसरा आवरण मात्र है....
करुणाशील व्यक्ति चोट खाया हुआ, सुधरा हुआ, सबक सीखा हुआ व्यक्ति होता जबकि प्रेमी केवल नैसर्गिक गुण अवगुण का वाहक होता है.....
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