करुणा और प्रेम दोनों का जन्म एक ही स्रोत से होता है वह है मन ।प्रेम तब तक करुणा के साथ रहता है जबतक उसमे स्वार्थ न आ जाए और जब स्वार्थ उत्पन्न होता है तो करुणा नहीं होती ।करुणा निश्चय ही प्रेम से बड़ी होती है और यदि प्रेम मे करुणा रहे तो प्रेम अपने चरम रूप मे सामने आता है ।और जब केवल प्रेम रहे तो भी वह अपने चरम रूप मे ही आता है और तब एक प्रेमी अपने ही साथी को मारने मे हिचकता नहीं जैसा रूप आज हमें दिख रहा है ।यह सत्य है कि स्वार्थ के बिना प्रेम संभव नहीं होता और करुणा निःस्वार्थ होती है ।पर आज के परिवेश मे लोग दो रूप लिए चलते है करुणा का जो दिखाने की चीज़ है और स्वार्थ छुपाने की और दोनों को मिला जो प्रेम उत्पन्न होता है वह केवल और केवल दिखावा ही होता है ।पहचानना मुश्किल है की सामने वाले का हृदय करुणा से भरा है की मिलावट यहाँ भी डेरा डाल चुकी है ।
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