Saturday, February 2, 2013

सबला योजना


‘रोती रही चिल्लाती रही पर किसी ने जाने नहीं दिया’
“मुझे भी जाना है” हमेशा बस यही कहती थी पर किसी ने कभी भी मुझे जाने ही नहीं दिया. कभी-कभी तो लगता था कि मेरी बात सुनने वाला कोई भी नहीं है. मैं चाहे दिनभर रोती रहूं पर किसी पर भी मेरे रोने का असर नहीं पड़ेगा. एक दिन तो मैंने बापू को कहा कि ‘बापू मुझे भी भइया के साथ जाने दो ना’ पर बापू ने मुझे गुस्से भरी आंखें दिखाते हुए कहा कि ‘चुप कर के घर में बैठ जा और घर का काम क्या खत्म हो गया है’? बापू की इस बात का जरा भी बुरा ना लगा पर जब मां भी बापू की तरह ही बातें करती तो ऐसा लगता था कि अब मुझे सुनने वाला कोई भी नहीं है और मेरे लिए बेहतर यही है कि बस जिंदगी भर इस चारदीवारी के अंदर घर के काम करना सीख लूं. यह कहानी हरियाणा के उस गांव की है जहां 12 साल की लड़की राधा को इसलिए पढ़ने-लिखने नहीं दिया जाता था क्योंकि वो लड़की है और उसके स्कूल जाने के सपने को तोड़ दिया जाता था.

‘अब किसी और का सपना ना टूट पाए’
सबला (राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण योजना)

राधा जैसी वो हजारों लड़कियां जो स्कूल की तरफ अपने कदम बढ़ाना चाहती हैं उनके लिए केन्द्र सरकार ने किशोरी बालिकाओं के सशक्तिकरण के उद्देश्य से ‘सबला’ नामक योजना इंदिरा गांधी के जन्मदिन 19 नवंबर, 2010 को प्रारंभ किया था. सबला योजना खास तौर से उन किशोरियों पर केंद्रित है जो किसी भी कारणवश स्कूल नहीं जा पा रही हैं. सबला योजना भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही है और यह योजना देश भर के 200 जिलों में प्रभावी है. इस योजना के अंतर्गत किशोरियों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है. एक वर्ग 11 से 14 वर्ष की उन किशोरियों का है जो स्कूल छोड़ चुकी हों और दूसरे वर्ग में 15 से 18 वर्ष की सभी किशोरियों को शामिल किया गया है.


सबला के अंतर्गत किशोरी बालिकाओं के लिए निम्नलिखित गतिविधियां आयोजित की जाती हैं:

1. पोषण आहार प्रदाय

2. आईएफए टेबलेट वितरण

3. स्वास्थ्य जांच एवं संदर्भ सेवा

4. स्वास्थ्य एवं पोषण शिक्षा

5. परिवार कल्याण, ARSH (Adolescent Reproduction and Sexual Health) बच्चों की देखभाल एवं गृह प्रबंधन पर मार्गदर्शन

6. लाइफ स्किल एजुकेशन एवं लोक सेवाओं तक पहुंच

7. व्यवसायिक प्रशिक्षण


सबला कार्य कैसे करती है ?

सबला योजना के अंतर्गत ग्राम/मोहल्ले के आंगनबाड़ी केंद्र में किशोरियों का नामांकन किया जाता है और उन्हें निर्धारित दिन आवंटित किए जाते हैं और जिस दिन उनका नाम निर्धारित किया जाता है उन्हें उसी दिन उनका नामाकन होता हैं. सबला योजना की खास बात यह है कि

दिनों का आवंटन इस तरह  से किए जाते हैं कि स्कूल न जाने वाली युवतियां स्कूली युवतियों के संपर्क में आए और अपनी सहेलियों के द्धारा वो स्वयं भी स्कूल जाने को प्रेरित हो सके.


सबला का लक्ष्य
सबला के मुख्य उद्देश्यों में किशोरियों को स्वावलंबी एवं सशक्त बनाना, उनके स्वास्थ्य एवं पोषण में सुधार करना, उन्हें सार्वजनिक एवं सरकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली की जानकारी देना और औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करना शामिल हैं. सभी युवतियों के स्वास्थ्य की देखभाल भी करना सबला योजना के अंतर्गत आता है.


सबला के अंतर्गत आयरन एवं फोलिक एसिड की गोलियों के साथ-साथ वर्ष में 300 दिन पोषाहार भी प्रदान किया जाता है. सबला योजना में आंगनबाड़ी का विशेष महत्व होता है जिसमे आंगनबाड़ी केंद्रों में युवतियों को विभिन्न विषयों पर व्यावहारिक जानकारी भी दी जाती हैं. युवतियों के प्रोत्साहन हेतु इस योजना में ‘सखी’ और ‘सहेली’ जैसे पद भी बनाए गए हैं जिन पर युवतियों में से ही किसी एक को नियुक्त किया जाता है. इन केंद्रों पर वर्ष में एक दिन ‘किशोरी दिवस’ भी मनाया जाता है जो प्रत्येक राज्य में वहां की सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है.


क्या सबला योजना वास्तव में लड़कियों का भविष्य सुधार सकती है. सबला योजना को भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा है. सबला योजना में बहुत से नए और बेहतर कदम उठाए गए हैं पर वास्तविक सच्चाई यह है कि अभी भी सबला योजना बड़े स्तर पर लड़कियों को स्कूल पढ़ने-लिखने भेजने के लिए असमर्थ है.








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