‘रोती रही चिल्लाती रही पर किसी ने जाने नहीं दिया’
“मुझे भी जाना है” हमेशा बस यही कहती थी पर किसी ने कभी भी मुझे जाने ही नहीं दिया. कभी-कभी तो लगता था कि मेरी बात सुनने वाला कोई भी नहीं है. मैं चाहे दिनभर रोती रहूं पर किसी पर भी मेरे रोने का असर नहीं पड़ेगा. एक दिन तो मैंने बापू को कहा कि ‘बापू मुझे भी भइया के साथ जाने दो ना’ पर बापू ने मुझे गुस्से भरी आंखें दिखाते हुए कहा कि ‘चुप कर के घर में बैठ जा और घर का काम क्या खत्म हो गया है’? बापू की इस बात का जरा भी बुरा ना लगा पर जब मां भी बापू की तरह ही बातें करती तो ऐसा लगता था कि अब मुझे सुनने वाला कोई भी नहीं है और मेरे लिए बेहतर यही है कि बस जिंदगी भर इस चारदीवारी के अंदर घर के काम करना सीख लूं. यह कहानी हरियाणा के उस गांव की है जहां 12 साल की लड़की राधा को इसलिए पढ़ने-लिखने नहीं दिया जाता था क्योंकि वो लड़की है और उसके स्कूल जाने के सपने को तोड़ दिया जाता था.
सबला (राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण योजना)
सबला के अंतर्गत किशोरी बालिकाओं के लिए निम्नलिखित गतिविधियां आयोजित की जाती हैं:
सबला कार्य कैसे करती है ?
सबला का लक्ष्य
सबला के अंतर्गत आयरन एवं फोलिक एसिड की गोलियों के साथ-साथ वर्ष में 300 दिन पोषाहार भी प्रदान किया जाता है. सबला योजना में आंगनबाड़ी का विशेष महत्व होता है जिसमे आंगनबाड़ी केंद्रों में युवतियों को विभिन्न विषयों पर व्यावहारिक जानकारी भी दी जाती हैं. युवतियों के प्रोत्साहन हेतु इस योजना में ‘सखी’ और ‘सहेली’ जैसे पद भी बनाए गए हैं जिन पर युवतियों में से ही किसी एक को नियुक्त किया जाता है. इन केंद्रों पर वर्ष में एक दिन ‘किशोरी दिवस’ भी मनाया जाता है जो प्रत्येक राज्य में वहां की सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है.
क्या सबला योजना वास्तव में लड़कियों का भविष्य सुधार सकती है. सबला योजना को भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा है. सबला योजना में बहुत से नए और बेहतर कदम उठाए गए हैं पर वास्तविक सच्चाई यह है कि अभी भी सबला योजना बड़े स्तर पर लड़कियों को स्कूल पढ़ने-लिखने भेजने के लिए असमर्थ है.
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