Friday, February 1, 2013

अंबार आँसुओं का

अंबार आँसुओं का, जो फूटने को तैयार है,
जाने क्यूँ गले में, फांस सा अटका पड़ा है,
दर्द बेपनाह, जो किसी दौड़ के घोड़े पर सवार है ,
जाने क्यूँ कदमों में रफ़्तार लेकर भी सीधा खड़ा है !

तड़प रहा है मन भागने को, चारों दिशाओं में,
फड़फड़ा रहा है पंख, लेकिन उड़ ना रहा है,
तसल्ली तो दे रहा है ख़ुद को, कि मैं कमज़ोर नहीं,
पर न जाने क्यूँ कदमों में रफ़्तार लेकर भी सीधा खड़ा है !

बेचैन दिल हर दूजे लम्हे में, धड़कन टटोलता है,
भरोसा तो है, फिर भी थमने का भय सता रहा है,
जानता है नादान नहीं, खुदको वो पुचकार लेगा,
पर न जाने क्यूँ कदमों में रफ़्तार लेकर भी सीधा खड़ा है !

ऐ-ख़ुदा, बस थोड़ी सी हिम्मत देदे,
रुला दे तो कर दूँ खाली, आँसुओं का जो घड़ा है,
और कर दूँ इस दर्द को आज़ाद उसके अश्व पर,
जो कदमों में रफ़्तार लेकर भी सीधा खड़ा है ...

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