Sunday, March 10, 2013

संस्‍कारी श्‍यामा

संस्‍कारी श्‍यामा
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घर में लोग पांच थे
चारपाइयां चार
पांचवी थी पर झोल था उसमें
इतना कि मूंज नीचे जमीन छू ले, उस पर लेटते ही
इसमें पूछने और बताने की जरुरत नहीं थी
श्‍यामा सो जाएगी इस पर.....
मां कहे कि ना कहे, श्‍यामा को पता है अपनी जगह...।

दूध एक किलो आता था और
मलाई आधी छटांक से कम
छोटा तो छोटा है
मलाई नहीं खायेगा तो बड़ा कैसे होगा...।
श्‍यामा को दूध अच्‍छा नहीं लगता
श्‍यामा को दूध पीकर क्‍या कुश्‍ती लड़ने जाना है....।

घुटने में दर्द है मां के
दवा लगाने के बाद चूल्‍हा चौका संभाल ही लेगी
श्‍यामा के सिवा है ही कौन और घर में
मां के बाद...उसे मां बनना होता है पूरे घर की
बेटी तो कहने भर को है....।

विदा तो बेटियां ही होती हैं, घर संभालना नहीं जानते भले
पर घर बेटेों का ही तो है, दुकान के साथ साथ
बाहर नेमप्‍लेट पर
लिखा है अब बेटेों का भी नाम....जिनके नाम हो ही जाना है इस घर को....
श्‍यामा तो गई अपने घर....ऐसा कहती है मां

श्‍यामा के पति का घर
श्‍यामा के पिता का घर
श्‍यामा के भाइयों का घर
श्‍यामा का घर.....कहां है श्‍यामा का घर....
ना श्‍यामा पूछती है कभी, ना मां बताती है कभी....
पति के पास अपने काम से फुर्सत कहां
खाली तो श्‍यामा है...

इस बार पूछेगी,
राखी पर आएंगे जब भाई....
वे भाई, जो राखी बंधवाकर वचन देंगे
बहन को जमाने के सब दुखों से बचाने का
बस कमर के दर्द से नहीं बचा पाएंगे
जो झोल वाली चारपाई से बैठ गया सदा के लिए....।

इस तरह परिवार के लिए त्‍याग
और प्रेम के संस्‍कार लेकर बड़ी हुई श्‍यामा....
इसी तरह बड़ी होती है वह लड़की
जिसका नाम श्‍यामा है....
और नाम कुछ और हो तो क्‍या फर्क पड़ता है......

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