आधुनिक भारत की मानसिकता....
देश लुटता रहे लुटने दो
कोई भूँखा रोता है तो रोने दो
हमको क्योँ करेँ देश की परवाह
हमको भी तो मंत्री बनना है
हमको भी तो घोटाले करना है जी
हिन्दी का करके परित्याग
इंग्लिश मेँ पढ़ेँगे लेक्चर हम
विदेशी ब्राँड पे हम मरते हैँ
अपनी संस्कृति से दूर भागा करते हैँ
रटकर दो चार थ्योरम और ईक्यूशन
हमको भी तो डॉक्टर इंजीनियर बनना है जी
देश जाये भाड़ मेँ हमको क्या करना है जी
भारत की भाषा संस्कृति हमेँ गँवारु लगती है
मंदिर और धर्म ग्रंथ हमेँ ऊबाऊ लगते है
वेस्टर्न कल्चर को आधुनिकता के नाम पर अपनाते हैँ
क्रॉस चर्च बाईबिल जीसस के पीछे भागा करते हैँ
भारत से हमको क्या करना हैँ.,
हमको तो यूएस का वीजा पाना है
हमको भी तो डॉलरो मेँ कमाना है जी
तिथी तीज त्योहारोँ का हमको ज्ञान नहीँ
हम तो वेँलेँटाईन क्रिसमस मनाया करते हैँ
कौन थे आजाद भगतसिँह और राजीव दीक्षित
इससे हमको क्या करना जी
हमको तो बस सक्सेस पाना है जी
भीड़ का हिस्सा बनकर खो जाना है
.....अपूर्ण
शायद कभी पूरी ना हो
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