बच्चों पर कार्य करने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर कहते हैं कि नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था कि किसी समाज की आत्मा की सबसे अच्छी पहचान इसी से होती है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जाड़े की एक रात में दिल्ली में एक बस में एक छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म और फिर उसकी हत्या के बाद लोगों में आक्रोश का जैसा उभार देखने को मिला, उसने भारतीय समाज की आत्मा के लिए परीक्षा की स्थितियां पैदा कर दी हैं।
माना जा रहा है कि लड़की पर हमला करने वालों में एक लड़का शामिल था, जो अभी वयस्क भी नहीं है। मौजूद कानूनों के तहत उसे वयस्कों को मिलने वाली सजा नहीं दी जा सकती। पीडि़त लड़की के माता-पिता के अलावा कई राजनीतिज्ञों, कानूनविदों, टिप्पणीकारों और आम लोगों का भी मानना है कि लड़के को अपराध के लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए और उसे वयस्कों की तरह सजा भी भुगतनी चाहिए, बशर्ते अदालत में उसका अपराध प्रमाणित हो जाता है।
इस मांग में कई नैतिक और वैधानिक उलझनें निहित हैं, जिनका संबंध बचपन, आपराधिक भागीदारी, सजा, सुधार, न्याय और आम लोगों की संवेदनाओं से है। यह बेहद जरूरी है कि इनके बारे में गली-नुक्कड़ से लेकर न्यूज चैनलों, अखबारों और अंतत: संसद में जमकर बहस हो। इसकी वजह यह है कि हम जो रास्ता चुनेंगे, वह न केवल हमारे बच्चों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि जैसा कि मंडेला ने कहा था, हमारी आत्माओं पर भी असर डालेगा।
पहला सवाल बचपन के स्वरूप और बचपन में किए गए अपराधों को लेकर वयस्कों की प्रतिक्रिया का है। ऐसे कई निर्णायक वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद हैं जो बड़े हो रहे बच्चों की मानसिक अपरिपक्वता, इस दौरान शरीर में हो रहे बदलावों तथा हार्मोन्स के स्राव से पैदा हो रहे संदेह एवं अपनी मर्जी से जीने की इच्छा के साथ दूसरों पर निर्भरता के साथ तालमेल बिठाने में होने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हैं।
हममें से कितने ऐसे हैं जिन्होंने बचपन से जीवन की दहलीज पर कदम रखने की इस यात्रा में दिल टूटने, आश्चर्य, क्रोध और उम्मीद के भावनात्मक उभारों को महसूस नहीं किया है? हममें से अधिकांश ऐसे हैं जिन्हें इस दौरान माता-पिता, शिक्षक, बड़े भाई-बहन अथवा किसी दोस्त का भावनात्मक संबल मिला, लेकिन उन बच्चों का क्या, जिनके पास विकास की इस यात्रा में ऐसा कोई सहारा नहीं है।
बेसहारा बच्चों और युवकों के बीच काम करते हुए हमने महसूस किया है कि इनमें से अधिकांश अपने हिंसक तथा गाली-गलौज करने वाले शराबी पिता, अपनों के दुराचार या फिर पारिवारिक उपेक्षा के चलते घर से भागने को मजबूर होते हैं। सड़कों पर घूमते हुए वे अपना एक अलग परिवार अथवा ऐसे दूसरे बच्चों के साथ अपनी अलग गैंग बनाते हैं और छोटे-मोटे अपराध, सेक्स तथा ड्रग्स के सहारे अपना जीवन बसर करते हैं।
क्या हम बाल अपराधियों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा वयस्कों के साथ करते हैं? 1990 के दशक में अमेरिका में किशोर अपराधों की बढ़ती तादाद के चलते कई लोग उन्हें सड़क के लुटेरों के नाम से संबोधित करने के साथ-साथ वयस्क अपराध के लिए वयस्क सजा की जोरदार वकालत करने लगे।
यह माहौल काफी हद तक वैसा ही था, जैसा दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म के बाद भारत में देखने को मिल रहा है, लेकिन सौ साल पहले जूलियन मैक नामक जज ने सलाह दी थी कि बाल अपराधियों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए, जैसा कि एक बुद्धिमान पिता अपने बच्चे के साथ करता है। बेघर बच्चों के साथ काम करते हुए जब हम उन्हें बार-बार चोरी करते, झूठ बोलते या हिंसक व्यवहार करते हुए देखते हैं, तो कई बार मैं और मेरे सहयोगी निराशा की भावना से भर जाते हैं।
इससे निबटने का सबसे अच्छा तरीका क्या हो, इसकी तलाश में हम छटपटाते रहते हैं। हमने यही सीखा है कि इसका एकमात्र जादुई मंत्र यही है कि आप ऐसे बच्चों के साथ वही व्यवहार करें, जो आप अपने बच्चों के साथ करते हैं। जब आपके अपने बच्चे गलत रास्ते पर चले जाते हैं- झूठ बोलना, चोरी करना, हिंसक व्यवहार करना आदि उनकी आदत हो जाती है तो आप उन्हें सही रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं, उन्हें सजा देते हैं, लेकिन कभी उनकी देखभाल करना नहीं छोड़ते और न ही कभी उनपर भरोसा करना छोड़ते हैं।
फिर इस उम्र के दूसरे बच्चे, जो किसी जिम्मेदार वयस्क के सुरक्षा कवच से वंचित रहे हैं, के साथ अलग व्यवहार का क्या औचित्य है? यह तर्क कि बच्चों के लिए कम सजा के प्रावधान से बाल अपराधों की संख्या में तेजी से वृद्धि होगी, के पक्ष में भारत या दुनिया में कोई सबूत नहीं है।
जैसा कि बाल अधिकार कार्यकर्ता निकोल मेनेजेस बताते हैं, वर्ष 2011 में भारतीय दंड संहिता के अधीन हुए अपराधों का 1.1 फीसदी हिस्सा ही बाल अपराधों का था। 120 करोड़ की आबादी वाले देश में, जिसमें करीब आधे बच्चे हैं, सालाना करीब 30 हजार बाल अपराधों का आंकड़ा नगण्य जैसा है।
यदि हमारा मकसद कुछ बच्चों द्वारा किए गए दुष्कर्म और हत्या जैसे गंभीर अपराधों का बदला लेना है, तो हमें उन्हें न केवल जेल में बंद करना चाहिए बल्कि फांसी देने तक से भी गुरेज नहीं करना चाहिए। लेकिन यदि हमारा मकसद उन्हें सुधारना है, जैसा कि हम अपने बच्चों के साथ करते हैं, तो वयस्कों के लिए बनी जेल में डालना सबसे आखिरी विकल्प है, क्योंकि यहां रहकर उनके अंदर छिपी अच्छाइयों के सामने आने की संभावना सबसे कम होती है।
बाल अपराधों को रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि बड़ों की सुरक्षा कवच से वंचित बच्चों तक समय रहते पहुंचा जाए, उनके लिए सैकड़ों की संख्या में आवासीय स्कूल खोले जाएं, जहां उनकी देखभाल के साथ-साथ शिक्षा, भोजन और सुरक्षा की भी व्यवस्था हो। बाल अपराधियों के लिए कड़ी सजा के प्रावधान से उनकी क्रूरता में और इजाफा ही होगा। बच्चे- वे चाहे मेरे, आपके या सड़कों पर घूमने वाले ही क्यों न हों, उन्हें प्यार, विश्वास और सही दिशा देने की जरूरत होती है।
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