पूर्णिमा की रात थी । उज्जवल चाँदनी चहुँ ओर बिखरी हुई थी । एक नन्हाँ बालक अपनी परछाई को देखकर बहुत खुश हुआ। उसे पकड़ने के लिये इधर से उधर घुटनोँ के बल चलता रहा । छाया पकड़ने के लिये कभी अपने हाथ बढ़ाता, कभी पीछेघूम जाता । पर वह तो छाया ठहरी ! कैसे पकड़ मेँ आती ?
उसकी माँ बहुत देर तक यह तमाशा देख-देख कर हँसती रही । पर जब बच्चा थक गया, तो माँ को तरस आ गया । उसने बच्चे के पास जाकर उसका एक हाथ उठाया और उसके सिर पर रख दिया ।
बच्चे ने देखा कि परछाई उसकी पकड़ मेँ आ गई । वह खिलखिलाकर हँस पड़ा । माँ ने उसे चूमकर अपनी गोद मेँ उठा लिया ।
इसी प्रकार आज इंसान अबोधता के कारण परमात्मा को अपने से बाहर खोज रहा है । अनेकोँ साधन अपनाकर उसे पाने हेतु प्रयत्नशील है । किँतु उसका हर प्रयास विफल हो जाता है । वह थककर निराश हो जाता है ।
पर जब एक "पूर्ण सद्गुरु" का सान्निध्य मिलता है, तो वे उसे आत्मकेन्द्रित कर देते हैँ । तब कहीँजाकर ईश्वर पकड़ मेँ आता है । उसका भीतर ही साक्षात् दर्शन हो जाता है ।
उसकी माँ बहुत देर तक यह तमाशा देख-देख कर हँसती रही । पर जब बच्चा थक गया, तो माँ को तरस आ गया । उसने बच्चे के पास जाकर उसका एक हाथ उठाया और उसके सिर पर रख दिया ।
बच्चे ने देखा कि परछाई उसकी पकड़ मेँ आ गई । वह खिलखिलाकर हँस पड़ा । माँ ने उसे चूमकर अपनी गोद मेँ उठा लिया ।
इसी प्रकार आज इंसान अबोधता के कारण परमात्मा को अपने से बाहर खोज रहा है । अनेकोँ साधन अपनाकर उसे पाने हेतु प्रयत्नशील है । किँतु उसका हर प्रयास विफल हो जाता है । वह थककर निराश हो जाता है ।
पर जब एक "पूर्ण सद्गुरु" का सान्निध्य मिलता है, तो वे उसे आत्मकेन्द्रित कर देते हैँ । तब कहीँजाकर ईश्वर पकड़ मेँ आता है । उसका भीतर ही साक्षात् दर्शन हो जाता है ।
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