Sunday, March 31, 2013

- अशोक चक्रधर

पानी से निकलकर मगरमच्छ किनारे पर आया,
इशारे से बंदर को बुलाया.
बंदर गुर्राया- खों खों, क्यों,
तुम्हारी नजर में तो मेरा कलेजा है?
मगर्मच्छ बोला- नहीं नहीं, तुम्हारी भाभी ने
खास तुम्हारे लिये सिंघाड़ेका अचार भेजा है.
बंदर ने सोचा ये क्या घोटालाहै,
लगता है जंगल में चुनाव आने वाला है.
लेकिन प्रकट में बोला- वाह!
अचार, वो भी सिंघाड़े का,
यानि तालाब के कबाड़े का!
बड़ी ही दयावान तुम्हारी मादा है,
लगता है शेर के खिलाफ़
चुनाव लड़ने का इरादा है.
कैसे जाना, कैसे जाना? ऐसे जाना, ऐसे जाना
कि आजकल भ्रष्टाचार की नदी में
नहाने के बाद जिसकी भी छवि स्वच्छ है,
वही तो मगरमच्छ है.
- अशोक चक्रधर

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