अगर
जिंदगी बिगड़ गई तो दूसरी कहा से लाओगें श्यामगढ़ मे एक संत स्वभाव
का जुलाहा रहता था एक लड़के ने उसके स्वभाव के बारे मे बहुत सुन रखा था वह
उसके स्वभाव की परीक्षा लेने एक दिन उसके पास पहुँच गया और उनसे एक साड़ी की
कीमत पूछी जुलाहे ने कीमत बताई तो लड़के ने साड़ी के दो टुकड़े कर दिए और
पूछा अब इसकी क्या कीमत है जुलाहे ने फिर वही कीमत बताई लड़का तो जुलाहे को
चिढाना चाहता था अत: वह साड़ी के टुकड़े करता रहा और दाम पूछता रहा जुलाहा भी
बड़े शांत होकर कीमत बताता रहा जब साड़ी के टुकड़े टुकड़े हो गये तो लड़के ने
कहा यह अब मेरे किसी काम की नही है जुलाहा बोला तुम ठीक ही कहते हो बेटा ये
टुकड़े तो तुम्हारे किसी काम के नही है लड़के को यह सुनकर थोड़ी शर्म महसूस
हुई तो वह साड़ी की कीमत देने लगा पर जुलाहे ने कहा तुम्हारे पैसे से यह
नुकसान पूरा नही हो सकता है किसानों की मेहनत से कपास पैदा होता है उस रूई
से मैने सूत काता फिर रंगरेज ने रंगा और फिर साड़ी तैयार हुई हमारी मेहनत तब
सफल होती जब कोई इसे पहनता लड़के ने जुलाहे से माफी माँगी तो वह जुलाहा
बोला बेटा एक साड़ी खराब होने पर दूसरी बन सकती है पर जिंदगी बिगड़ गई तो
दूसरी कहाँ से लाओगें जुलाहे की बात सुनकर लड़के ने प्रण लिया कि अब वह कभी
किसी को नुकसान नही पहुँचाएगा.
No comments:
Post a Comment