एक था राजा ‘अजूबामल।’ उसके नगर के चारों और घनी पहाड़ियां थीं। उसके यहां सभी चीजों का दाम एक टका था। केसर हो या नमक, सब्जी हो या लकड़ी, कोयला हो या सोना, सब एक ही दाम में तुलते थे। अजूबाल बहुत मनमानी करता था। उसने कुछ चापलूस मंत्री नियुक्त कर रखे थे। वह उन्हीं की सलाह से सभी काम करता। बेचारी प्रजा डर के मारे कुछ नहीं कहती थी। उस नगर में शिकायत करने वाले को ही जेल हो जाती थी।
एक बार नगर में तीन मित्र आए। वहां की दशा देखकर पहले दो मित्रों ने कहा, ‘भईया, इस नगर में रहना खतरे से खाली नहीं है। राजा की सनक का क्या भरोसा? कब किसे दबोच ले?’
तीसरा मित्र सभी चीजों के इतने कम दामों से खुश था। वह बोला, ‘मैं तो यहीं मजे से जीवन गुजारूंगा। कितनी अच्छी बात है कि मनचाही चीजें मिलेंगी। पहले दो मित्रों ने उसे बहुत समझाया कि वह लौट चले किंतु तीसरा मित्र टस-से-मस न हुआ। हारकर पहले दो मित्रों ने अपना पता देकर कहा, ‘यदि हमारी जरूरत पड़े तो बुलवा लेना। हम शीघ्र ही मदद को आ जाएंगे।’
तीसरे मित्र ने बे-मन से उनका पता संभाला और मकान की खोज में चल पड़ा। पहले दो मित्रों ने घोड़े को एड़ लगाई और रातों-रात नगर से बाहर निकल गए। तीसरा मित्र सुबह सोकर उठा। मुंह-हाथ धोकर बाजार की ओर चल पड़ा।
वहां उसने एक टका देकर स्वादिष्ट मिठाई खरीदी। दोने में से पहला टुकड़ा उठाया ही था कि राजा के सिपाहियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। हुआ यूं कि पिछली रात राजा के महल में चोरी हो गई थी. राजा ने आदेश दिया,‘जो भी अजनबी नगर द्वार से भीतर आया है, बेशक वही चोर होगा। उसे फांसी पर लटका दो।’
अब तो तीसरे मित्र की जान पर बन आई। उसने राजा से अनुनय-विनय की किंतु राजा ने अनसुना कर दिया। अंत में उसने दोनों मित्रों का सारा हाल लिखकर संदेश भिजवा दिया। अगले ही दिन फांसी का समय तय हुआ। बाजार के बीचों-बीच चौक पर फांसी दी जानी थी। सारा शहर अजनबी चोर को देखने उमड़ पड़ा। राजा भी पालकी पर सवार होकर पहुंच गया।
तभी तीसरे मित्र के पास एक खत पहुंचा। वह दोनों मित्रों ने लिखा था। तीसरे ने खत पढ़ा और फाड़कर चबा गया। कुछ ही देर में दोनों मित्र भी आ पहुंचे। ज्यों ही जल्लाद आगे बढ़ा। पहला मित्र राजा के चरणों में गिरकर बोला, ‘महाराज, मेरे मित्र को छोड़ दें। इसके बाल-बच्चे बहुत छोटे हैं।’
तीसरा मित्र वहीं से चिल्लाया, ‘नहीं महाराज, मुझे मरने दें। भला मरने से कैसा डरना?’ उसकी बात काटकर दूसरा मित्र बोला, ‘तुम दोनों सौ साल जीओ। महाराज तो मुझे ही फांसी चढ़ाएंगे।’ बस फिर क्या था! एक नौटंकी शुरू हो गई। तीनों मित्र एक-दूसरे से पहले मरना चाहते थे। राजा अजूबामल चक्कर खा गया।
वह कभी एक मित्र की ओर देखता तो कभी दूसरी की ओर। नगरवासी इस तमाशे को देखकर हैरान थे। अजूबामल ने तीनों मित्र को अपने पास बुलाकर पूछा, ‘मुझे सच-सच बता दो कि तुम मरने के लिए इतने उत्सुक क्यों हो? वरना मैं सबको जेल में डाल दूंगा।’
तीसरे मित्र ने योजना के मुताबिक हिचकिचाते हुए उत्तर दिया, ‘महाराज, आज मरने की बहुत शुभ घड़ी है। इस घड़ी में मरने वाला सीधा स्वर्गलोक जाएगा, इसलिए हम लड़ रहे हैं?’ यह सुनते ही अजूबामल का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कड़कर बोला, ‘प्यारे मंत्रियों, शुभ घड़ी में मरने का सबसे पहला हक राजा को मिलना चाहिए। भला मेरे होते कोई और स्वर्ग में क्यों जाएगा? मुझे शीघ्र ही फांसी पर चढ़ा दो।’
मंत्रियों ने सोचा कि राजा के मरते ही हम राज्य पर कब्जा कर लेंगे। उन्होंने एक क्षण भी विलंब नहीं किया और अजूबामल को फांसी पर चढ़ा दिया। प्रजा मंत्रियों की चाल भांप गई थी। उसने पत्थर मार-मारकर मंत्रियों को अधमरा कर दिया।
जानते हो नया राजा कौन बना? पहले मित्र को राजा बनाया गया क्योंकि उसकी बुद्धिमानी से ही अजूबामल का अंत हुआ था। बाकी दो मित्र मंत्री बने। नगर में उचित कायदे-कानून बने और सभी सुख से रहने लगे।
एक बार नगर में तीन मित्र आए। वहां की दशा देखकर पहले दो मित्रों ने कहा, ‘भईया, इस नगर में रहना खतरे से खाली नहीं है। राजा की सनक का क्या भरोसा? कब किसे दबोच ले?’
तीसरा मित्र सभी चीजों के इतने कम दामों से खुश था। वह बोला, ‘मैं तो यहीं मजे से जीवन गुजारूंगा। कितनी अच्छी बात है कि मनचाही चीजें मिलेंगी। पहले दो मित्रों ने उसे बहुत समझाया कि वह लौट चले किंतु तीसरा मित्र टस-से-मस न हुआ। हारकर पहले दो मित्रों ने अपना पता देकर कहा, ‘यदि हमारी जरूरत पड़े तो बुलवा लेना। हम शीघ्र ही मदद को आ जाएंगे।’
तीसरे मित्र ने बे-मन से उनका पता संभाला और मकान की खोज में चल पड़ा। पहले दो मित्रों ने घोड़े को एड़ लगाई और रातों-रात नगर से बाहर निकल गए। तीसरा मित्र सुबह सोकर उठा। मुंह-हाथ धोकर बाजार की ओर चल पड़ा।
वहां उसने एक टका देकर स्वादिष्ट मिठाई खरीदी। दोने में से पहला टुकड़ा उठाया ही था कि राजा के सिपाहियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। हुआ यूं कि पिछली रात राजा के महल में चोरी हो गई थी. राजा ने आदेश दिया,‘जो भी अजनबी नगर द्वार से भीतर आया है, बेशक वही चोर होगा। उसे फांसी पर लटका दो।’
अब तो तीसरे मित्र की जान पर बन आई। उसने राजा से अनुनय-विनय की किंतु राजा ने अनसुना कर दिया। अंत में उसने दोनों मित्रों का सारा हाल लिखकर संदेश भिजवा दिया। अगले ही दिन फांसी का समय तय हुआ। बाजार के बीचों-बीच चौक पर फांसी दी जानी थी। सारा शहर अजनबी चोर को देखने उमड़ पड़ा। राजा भी पालकी पर सवार होकर पहुंच गया।
तभी तीसरे मित्र के पास एक खत पहुंचा। वह दोनों मित्रों ने लिखा था। तीसरे ने खत पढ़ा और फाड़कर चबा गया। कुछ ही देर में दोनों मित्र भी आ पहुंचे। ज्यों ही जल्लाद आगे बढ़ा। पहला मित्र राजा के चरणों में गिरकर बोला, ‘महाराज, मेरे मित्र को छोड़ दें। इसके बाल-बच्चे बहुत छोटे हैं।’
तीसरा मित्र वहीं से चिल्लाया, ‘नहीं महाराज, मुझे मरने दें। भला मरने से कैसा डरना?’ उसकी बात काटकर दूसरा मित्र बोला, ‘तुम दोनों सौ साल जीओ। महाराज तो मुझे ही फांसी चढ़ाएंगे।’ बस फिर क्या था! एक नौटंकी शुरू हो गई। तीनों मित्र एक-दूसरे से पहले मरना चाहते थे। राजा अजूबामल चक्कर खा गया।
वह कभी एक मित्र की ओर देखता तो कभी दूसरी की ओर। नगरवासी इस तमाशे को देखकर हैरान थे। अजूबामल ने तीनों मित्र को अपने पास बुलाकर पूछा, ‘मुझे सच-सच बता दो कि तुम मरने के लिए इतने उत्सुक क्यों हो? वरना मैं सबको जेल में डाल दूंगा।’
तीसरे मित्र ने योजना के मुताबिक हिचकिचाते हुए उत्तर दिया, ‘महाराज, आज मरने की बहुत शुभ घड़ी है। इस घड़ी में मरने वाला सीधा स्वर्गलोक जाएगा, इसलिए हम लड़ रहे हैं?’ यह सुनते ही अजूबामल का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कड़कर बोला, ‘प्यारे मंत्रियों, शुभ घड़ी में मरने का सबसे पहला हक राजा को मिलना चाहिए। भला मेरे होते कोई और स्वर्ग में क्यों जाएगा? मुझे शीघ्र ही फांसी पर चढ़ा दो।’
मंत्रियों ने सोचा कि राजा के मरते ही हम राज्य पर कब्जा कर लेंगे। उन्होंने एक क्षण भी विलंब नहीं किया और अजूबामल को फांसी पर चढ़ा दिया। प्रजा मंत्रियों की चाल भांप गई थी। उसने पत्थर मार-मारकर मंत्रियों को अधमरा कर दिया।
जानते हो नया राजा कौन बना? पहले मित्र को राजा बनाया गया क्योंकि उसकी बुद्धिमानी से ही अजूबामल का अंत हुआ था। बाकी दो मित्र मंत्री बने। नगर में उचित कायदे-कानून बने और सभी सुख से रहने लगे।