Monday, April 22, 2013

(एक स्कूल की बच्ची के मासूम से सवाल अपनी माँ से )

मम्मी ...मम्मी, अब मुझे डर लगने लगा है...

मुझे डर लगने लगा है अब पड़ोस के हर अंकल और हर भैया से जब भी वो मुझे गोद में उठाते हैं, मेरे गाल सहलाते हैं, मेरा हाथ पकड़ते हैं...

अब मुझे डर लगने लगा है स्कूल बस के ड्राईवर से, हेल्पर से..

अब मुझे डर लगने लगा है पड़ोस के किराना दूकान वाले अंकल से, धोबी चाचा से, चौकीदार से...

अब मुझे डर लगने लगा है अपने स्कूल के टीचर से, प्रिंसिपल से..

अब तो डर लगने लगा है अपने स्कूल/ कॉलेज के दोस्त से भी..

अब मुझे डर लगने लगा है कभी कभी मामा से, चाचा से, फूफा से और...

और कभी कभी तो अब डर लगने लगा से पापा से भी...

अब तो डर लगने लगा है पार्क में खेलने से, स्कूल जाने से, बाज़ार में घुमने से, शाम को सहेली की जन्मदिन की पार्टी में जाने से...

मम्मी ...मम्मी, अब मुझे डर लगता है...

मम्मी , मेरी वो एक सहेली है ना, वो कुछ दिनों से स्कूल नहीं आ रही...

स्कूल में बाकि सहेलियां बता रही थी की ना वो बोलती है, ना खाती है, ना पीती है, ना खेलती है....बस रोती है और बस रोती ही रहती है ....सभी बोलते हैं की उसके साथ बहुत बुरा हुआ....

मम्मी, क्या मेरे साथ भी इतना बुरा हो सकता है ?

मम्मी ...मम्मी, अब मुझे डर लगने लगा है...

(एक स्कूल की बच्ची के मासूम से सवाल अपनी माँ से )

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