वो आई थी.. कल रात.. अस्पताल के गलियारे में उसके कमरे के पास टहलती रही देर तलक.. पसीने की कुछ बूँदें छलक आई थीं माथे पे.. अंदर झाँकने में भी डर लग रहा था... हिम्मत जुटाते हुए उसने धीरे से पर्दा बाँयी तरफ सरकाया और अंदर खिड़की के पास आ के खड़ी हो गयी.. उस बेड के सफेद चादर पे खून की कुछ बूँदें सूख चुकी थीं जिसपर वो लेटी थी.. सूजी हुई बंद आखें, नाक में नली, बाईं कलाई से पानी चढ़ाया जा रहा था और पता नही कौन कौन सी मशीनें लगी थीं.. और.. पैरों के पास बैठी थी उसकी माँ.. बेटी का सारा दर्द समेटे.. सुखी खाली उसकी आँखों की तरह आधा बिस्तर भी खाली ही था.. अभी पाँच साल की बच्ची ही तो थी वो.. उसका कलेजा भर आया.. जी में आया की चीख चीख के रो दे वहीं.. पर सोती हुई उस नन्ही सी जान का ख़याल आ गया शायद... बस प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा और भर आई आँखों को हाथों से पोंछते हुए वो कमरे के बाहर निकल आई.. दुपट्टा उसका आज भी उसी सफेद बस में होगा कहीं.. बाहर कई गाड़ियाँ.. टीवी चैनेल वाली.. पुलिस की गाड़ियाँ.. उसने दौड़ना शुरू किया.. दौड़ती रही.. जबतक अदालत के उस कमरे में ना पहुँची वो.. उखड़ी हुई साँसें.. पसीने से तरबतर... टाँगों के साथ पेट में.. और नीचे.. फिर से दर्द उठ रहा था.. पर इसका अब कोई इलाज नहीं शायद.. अदालत के उस अंधेरे कमरे के कोने में वो धीरे से लेट गयी.. कल फिर जज साहब आएँगे.. तारीख है कल.. सिसकते हुए.. दर्द में.. ये रात भी कट जाएगी.. उसकी.. निर्भया की...
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