Thursday, April 4, 2013

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चूल्हे-चौके में व्यस्त और पाठशाला सेदूर रही माँ नहीं बता सकती कि ”नौ-बाई-चार” की कितनी ईंटें लगेंगी दस फीट ऊँची दीवार में…लेकिन अच्छी तरह जानती है कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है एक हँसते-खेलते परिवार में ।
त्रिभुज का क्षेत्रफल और घन का घनत्व निकालना उसके शब्दों में ‘स्यापा’ है .. क्योंकि उसने मेरी छाती को ऊनी धागे के फन्दों और सिलाइयों की मोटाई सेनापा है।
वह नहीं समझ सकती कि ‘ए’को ‘सी’ बनाने के लिए क्या जोड़ना या घटानाहोता है .. लेकिन अच्छी तरह समझती है कि सब्जी वाले से आलू के दाम कम करवाने के लिए कौन सा फॉर्मूला अपनाना होता है।
मुददतों से खाना बनाती आई माँ ने कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा तरकारी के लिए सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं और नाप-तौल कर ईंधन नहीं झोंका चूल्हे या सिगड़ी मे .. उसने तो केवल ख़ुश्बूसूंघकर बता दिया है कि कितनी क़सर बाकी है बाजरे की खिचड़ी में।
घर की कुल आमदनी के हिसाब से उसने हर महीने राशन की लिस्ट बनाई है ख़र्च और बचत के अनुपात निकाले हैंरसोईघर के डिब्बों घरकी आमदनी और पन्सारी की रेट-लिस्ट में हमेशा सामन्जस्य बैठाया है .. लेकिन अर्थशास्त्र का एक भीसिद्धान्त कभी उसकी समझ में नहीं आया है।
वह नहीं जानती सुर-ताल का संगम कर्कश, मृदु और पंचम सरगम के सात स्वर स्थाई और अन्तरे का अन्तर .. स्वर साधना के लिए वह संगीत का कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी .. लेकिन फिर भी मुझे उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर बड़ी मीठी नींद आती थी।

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