Friday, April 19, 2013

बस अब तो चीखें भी ठंडी पड़ने लगीं मेरी,

बस अब तो चीखें भी ठंडी पड़ने लगीं मेरी,
पर ये रूह तेरी क्यूँ मचलती नहीं,
पल-पल लुटती है आबरू मेरी यहाँ,
ऐ-ख़ुदा, ये सब देखकर भी तेरी आँख क्यूँ खुलती नहीं .... !!

जब भी लड़कियों के लिए कोई आर्टिकल लिखो, या उनके साथ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ कोई बात कहो तो लोग बोलते हैं ... करदी नेतागिरी शुरू ... क्या कोई और विषय नहीं बचा ... क्या देश में और कोई समस्या नहीं बची ... लेकिन जब हर 2 दिन में कभी 5 साल कि बच्ची के साथ तो कभी हॉस्पिटल में इलाज़ करने आई माँ से साथ बलात्कार होता है तो सब बस उसे एक नई सुर्खी समझकर अख़बारों के पन्ने पलटते या टीवी पर न्यूज़ चैनल बदलते नज़र आते हैं .... !! ज्यादा से ज्यादा अपनी बेटी कि सुरक्षा उसे घर से ना निकलने देकर और बड़ा देते हैं ... !! लेकिन क्या आपको सच में लगता है कि यही सही तरीका है ??

ओहह तब शायद वो सभी लोग देश कि बाकि समस्यायों से जूझने में व्यस्त होते होंगे .... क्योंकि अपनी बेटी के साथ थोड़ी हुआ है .... और दूसरे का दर्द देखना अब हम भारतीयों कि आदत नहीं (महज़ चंद लोगों को छोड़कर)!!

दामिनी के लिए कितने लोग सड़कों पर आये थे लेकिन आखिर में क्या हुआ मुजरिम नाबालिक है कह कर किस्सा लगभग ख़त्म .... और आज जो हुआ एक मासूम 5 साल की बच्ची के साथ ... ?? उससे भी ज्यादा बेशर्मी की बात तो ये है कि पुलिस उस केस को मात्र 2000 रुपये देकर बंद कराना चाहती थी। जब बात बढ़ी और जनता भड़की और कुछ लड़कियों ने पुलिस पर उंगली उठाकर चिल्ला चोंट की तो एक पुलिस वाले ने उसे थप्पड़ जड़ दिया ... ?? क्या यही काम है हमारी सो कॉल्ड सेवा करने वाली पुलिस का ... ??

और इस तरह के केस सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में सामने आ रहे हैं .... लेकिन ध्यान देकर देखा जाए तो क्या किसी भी केस का अंत वैसा होता है जैसा होना चाहिए ??? क्या किसी भी आरोपी को एसी सजा मिलती है जिससे डर कर कोई नया आरोपी खड़ा ना हो ??

अफ़सोस कि हमारे देश में सज़ा का मतलब सिर्फ आरोपी को मुलजिम बनाकर उसके खिलाफ 376 धारा लगाकर एक नयी फाइल बनाने तक ही सीमित रह गया है .... !! काश WednesDay Film में जो रोल नशरुद्दीन शाह ने निभाया है असल ज़िन्दगी में भी कोई इन नामर्दों के खिलाफ ऐसा ही किरदार निभाये ....!!

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