निकलो न घर से, तुम महफूज़ नहीं हो
इन चंद दीवारों में अब, तुम महफूज़ नहीं हो
छु कर तेरे तन को, कुरेदते हैं मन को
सांस भी न लो, के तुम महफूज़ नहीं हो
बचपन के खेल , गलियों के मेल
रहने दो दिल में ही, के तुम महफूज़ नहीं हो
छुपा लो ये मासूमियत , आहट नहो जीने की
घूमते हैं भेडिये, तुम अब, महफूज़ नहीं हो
न कर सवाल कोई, बेआबरू हैं खुदा भी
क्या कहू, दोज़ख के किस्से
जब जन्नत में तुम महफूज़ नहीं हो
डरी सहमी अस्मते, बिखरी हुई हसरते
कैसे करे यकीन
बाप का साया, राखी का धागा
दागदार हैं हर कोई यहाँ
माँ की कोख में भी तुम महफूज़ नहीं हो,
रूह के धागे थे, जिस्म से बंधे थे
छोड़ दो अब ये बंदिशें,
जाने दो ज़िन्दगी की कश-म-कश,
अब तुम महफूज़ नहीं हो
ले चलूँ, पर कहाँ छुपाऊँ तुम्हे
अब इस खुदाई में तुम महफूज़ नहीं हो.
No comments:
Post a Comment