व्यस्त शहर का एक चौराहा,सिग्नल पर
रुकी गाडियों के शीशों के अन्दर उम्मीद
भरी नज़रों से झाँकने की कोशिश में कुछ
मुफलिस ऑंखें,मैले कुचैले कपड़ों में पंद्रह सोलह
साल की एक छोटी सी बच्ची हाथ फैलाये
एक कार के सामने पैसे मांगने जाती है,कार के
अन्दर से एक हाथ निकलता है और बच्ची के
सीने की माप लेने की कोशिश
करता है,बच्ची सहम के पीछे हट जाती है,हाथ
वापस गाडी के अन्दर चला जाता है और
फिर दोबारा एक पचास के नोट के साथ
बाहर आता है,
बच्ची को शायद उस पचास के नोट में
अपना दो वक़्त का खाना दिखाई
पड़ता है,पहले वो कुछ झिझकती है,लेकिन
फिर नोट लेने को हाथ फैलाये आगे
बढती ही है की इतने में पीछे से
मोटरसाइकिल पर बैठा एक जोड़ा जोर
जोर से गुस्साते हुए कार मालिक को बातें
सुनाना शुरू कर देता है....,वो जोड़ा बाइक
से उतरता या उतर के कार तक पहुच
पाता कि इतनी देर में सिग्नल
हरा हो जाता है,
कार वाला भी मौके
की गभीरता को ताड़ते हुए फुर्र
हो जाता है,वो छोटी बच्ची भावशून्य चेहरे
से अपने दो वक़्त के खाने (पचास के नोट)
को खुद से दूर जाता देख पीछे पलटती है और
मोटरसाइकिल पर बैठे जोड़े की तरफ
सवालिया नज़रों से ताकने
लगती है,मानो आँखों ही आँखों में कह
रही हो,-यह क्या किया तुम लोगों ने,अब मैं
खाना कैसे खाऊँगी...?"
बाइक पर पीछे बैठी लड़की जल्दी से
अपनी जींस की जेब से एक सौ का नोट
निकाल कर बच्ची को देती है,उससे यह कहते
हुए की आइन्दा अगर कोई ऐसी हरकत करे
तो उसके मुंह पर जोर से जो भी हाथ आये
खीच के मार देना....बच्ची हौले से हंस
देती है...
लेकिन यह नहीं मालूम
हो पाया कि उसकी वो प्यारी सी मासूम
हंसी थी किस बात पर?
जो भी हाथ आये खीच के मार देने
वाली बात पर या उसके साथ अक्सर होने
वाली ऐसी "आम" घटनाओं पर
"इतनी बड़ी प्रतिक्रिया" देने की उस
बाइक वाली लड़की की सलाह
पर.क्यूंकि सिग्नल हो चूका था,
कार का नम्बर नोट ना कर पाने
की अपनी गलती पर अफ़सोस करते हुए बाइक
आगे बढ़ा दी,...उफ़्फ़्फ़ रे ज़िन्दगी....थू है
तुझपे!
Wednesday, October 15, 2014
.उफ़्फ़्फ़ रे ज़िन्दगी..
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