" काश ………………… "
काश आज़ादी के बाद, "अरविन्द" जैसे
निस्वार्थी देशभक्त नेता होते और "आम
आदमी पार्टी" जैसे ईमानदार दल।
जनता को एक
साफ़-सुथरी पारदर्शी जवाबदेह
वयवस्था मिलती।
अँग्रेज़ों के कानून की जगह अपने कानून बनते।
जनता को जनलोकपाल, स्वराज, नापसन्दी,
भ्रष्टों को हटाने जैसे बुनियादी अधिकार तुरन्त
मिलते। चुनाव, पुलिस, न्यायिक, प्रशासनिक सुधार
होते। जांच और अन्य संस्थायें स्वतन्त्र
होती तो आज हर भारतीय सुरक्षित,
स्वस्थ,
शिक्षित, कार्यरत और सुख-संपन्न होता। वस्तुएं
आधे से भी कम मूल्य पर मिलती। भारत
दुनिया का सबसे खुशहाल देश होता।
पर हुआ इसका बिलकुल उल्टा। जिस जिस नेता और
दल के हाथ सत्ता आई, वो अपना स्वार्थ साधने के
लिए, देश और जनता को भूल गया। मानवता,
नैतिकता, देशसेवा की भावना कहीं बहुत
पीछे छूट
गयी। बिकाउओं ने देश के संसाधन - ज़मीन,
प्राकृतिक सम्पदा, स्पेक्ट्रम, ठेके, लाइसेंस
आदि भाई-भतीजों, बाहुबलियों और घनिष्टमित्र
पूँजीवादीयों में बाँट दिए। और अब वो इन
किर्या-
कलापों पर पर्दा डालने के लिए ना सिर्फ कानून
बल्कि जांच से लेकर न्यायधीश तक सब
अपनी मनमर्ज़ी के चाहते हैं। ये
कैसी न्याय-
वयवस्था, ये कैसा जनतंत्र।
पंगु बनाई गई, भोली-भाली अनपढ़
गरीब जनता के
हिस्से तो आजतक वोट-बैंक, असुरक्षा, अशिक्षा,
अन्याय, बलात्कार, कमरतोड़ महंगाई और
बेरोज़गारी ही आई है। बेहद
लम्बी और
खर्चीली न्याय प्रक्रिया आम
आदमी की पहुँच से
बाहर है। जनता बेचारी तो फिर भी, इन के
झूठे
वादों पर अंधविश्वास कर कभी एक को,
कभी दूसरे
को सत्ता की कुर्सी पर
बैठाती रही। इस बार
दागी सांसद, 162 से बढ़कर, 182 हो गए हैं।
ऐसों से देश और जनहित की कोई उम्मीद
करना बिलकुल व्यर्थ है।
अब एक ही आशा -> "अरविन्द
केजरीवाल", अब
एक ही विकल्प -> "आम
आदमी पार्टी"
जय हिन्द !
Tuesday, October 21, 2014
आप
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