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A Lady's Simple Questions & Surely It Will
Touch A Man's heart...
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देह मेरी ,
हल्दी तुम्हारे नाम की ।
हथेली मेरी ,
मेहंदी तुम्हारे नाम की ।
सिर मेरा ,
चुनरी तुम्हारे नाम की ।
मांग मेरी ,
सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।
माथा मेरा ,
बिंदिया तुम्हारे नाम की ।
नाक मेरी ,
नथनी तुम्हारे नाम की ।
गला मेरा ,
मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।
कलाई मेरी ,
चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।
पाँव मेरे ,
महावर तुम्हारे नाम की ।
उंगलियाँ मेरी ,
बिछुए तुम्हारे नाम के ।
बड़ों की चरण-वंदना
मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष
तुम्हारे नाम का ।
और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।
घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।
और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।
सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का...
Namrata se puchti hu?
आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?
एक लड़की ससुराल चली गई।
कल की लड़की आज बहु बन गई.
कल तक मौज करती लड़की,
अब ससुराल की सेवा करना सीख गई.
कल तक तो टीशर्ट और जीन्स
पहनती लड़की,
आज साड़ी पहनना सीख गई.
पिहर में जैसे बहती नदी,
आज ससुराल की नीर बन गई.
रोज मजे से पैसे खर्च करती लड़की,
आज साग-सब्जी का भाव करना सीख गई.
कल तक FULL SPEED स्कुटी चलाती लड़की,
आज BIKE के पीछे बैठना सीख गई.
कल तक तो तीन वक्त
पूरा खाना खाती लड़की,
आज ससुराल में तीन वक्त
का खाना बनाना सीख गई.
हमेशा जिद करती लड़की,
आज पति को पूछना सीख गई.
कल तक तो मम्मी से काम करवाती लड़की,
आज सासुमां के काम करना सीख गई.
कल तक भाई-बहन के साथ
झगड़ा करती लड़की,
आज ननद का मान करना सीख गई.
कल तक तो भाभी के साथ मजाक
करती लड़की,
आज जेठानी का आदर करना सीख गई.
पिता की आँख का पानी,
ससुर के ग्लास का पानी बन गई.
फिर लोग कहते हैं कि बेटी ससुराल
जाना सीख
गई.
(यह बलिदान केवल लड़की ही कर
सकती है, इसिलिए
हमेशा लड़की की झोली
वात्सल्य से भरी रखना...)
बात निकली है तो दूर तक जानी चाहिये!!!
शेयर जरुर करें और लड़कियो को सम्मान दे!
Thursday, October 30, 2014
स्त्री
Wednesday, October 29, 2014
आप
मेरे कुछ सवाल है केजरीवाल से...
आप अपनी ईमानदारी अपने पास
ही क्यो नही रखते?
जब बेईमान ही देश चलाने का ठेका रखते है...
तो आपको क्या हक है बार बार उन पर ऊँगली उठाने
का
भाजपा 32 लोगो के साथ संख्या कम के कारण सरकार
नही बना पाई
अब 29 के कारण बनाना चाहती है
क्योंकि मोदी सरकार के नियम मे 29 नम्बर 32 से
ज्यादा है
आज भाजपा गरीबी खत्म करने के लिये
कुछ लोगो को पैसे देकर खरीदना चाहती है
तो आप उनकी अमीरी मे
क्यों रुकावट बन रहे है आपको क्या हक है?
अगर आपके कारण भाजपा कांग्रेस एक हो रहे है तो आपको उस
एकता मे बाधक नही बनना चाहिये आखिरकार देश
को चलाने का अधिकार केवल इन 2 पार्टीयो का है..
राब्रट वाड्रा देश के जीजा है अगर उनका सम्मान
भाजपा भी करती है ओर कोई
कार्यवाही नही कर
रही तो आप का फर्ज
नही बनता कि आप भी ऊनका सम्मान
करे..
जब हर राजनीतक दुसरे राजनीतक के
साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खडा है ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर
देश
की अखण्डता को तोडना नही चाहता तो आप
को क्या हक है?
ऐसे देशभक्त जिनको देश की अत्यंत समझदार
जनता ने वोटों से चुना है उनको लोकपाल से जेल
भिजवाना क्यो चाहते है? और आपको सोई हुई
जनता की नींद खराब करने का हक किसने
दिया?
जो लोग पैसे लेकर बाहर के देशो मे भाग गये
और आप सरकार से भाग गये पर आपका पाप उन लोगो से बडा है
पर आप समझते ही नही..
एक पर्सनल बात
आप अपने बच्चो को इतना पढा क्यूं रहे है जबकि देश के
लोगो का विशवास मोदी ओर समृति ईरानी मे
है जो कम पढे लिखे है आप इस बात का ख्याल रखे और
बच्चो का राजनीतक भविष्य पढाई मे खराब मत करें..
लोगो की याददाशत बहुत कमजोर होती है
आपके अच्छे दिन हम भुल चुके है ओर अब हमे एक बात हर
चैनल के जरीये याद कराई जाती है
कि अच्छे दिन आने वाले है...
पर आपके पास पैसे ही नही है कोई
चैनल खरीदने के लिए
जब आप पैसे खाते ही नही तो हमे
क्या खिलायोगे सो अपनी सोच बदलो...
आपने 84 पर SIT बना दी पर लोग सज्जन कुमार से
ज्यादा जूडे है
लोगो मे डर पैदा करो प्यार
नहीं क्योंकि भारतीय
उन्ही के आगे झुकते है जो झुकाना जानता है
सो केजरी जी आप
लोगो की भलाई नही बेडा गर्क कर रहे
है..
आप जैसा आपका एक मूर्ख समर्थक
Friday, October 24, 2014
मन की आवाज़
Very lovely message.... must read
बहुत साल बाद दो दोस्त रास्ते में मिले .
धनवान दोस्त ने उसकी आलिशान
गाड़ी पार्क की और
गरीब मित्र से बोला चल इस गार्डन में बेठकर
बात करते है .
चलते चलते अमीर दोस्त ने गरीब दोस्त से
कहा
तेरे में और मेरे में बहुत फर्क है .
हम दोनों साथ में पढ़े साथ में बड़े हुए
मै कहा पहुच गया और तू कहा रह गया ?
चलते चलते गरीब दोस्त अचानक रुक गया .
अमीर दोस्त ने पूछा क्या हुआ ?
गरीब दोस्त ने कहा तुझे कुछ आवाज सुनाई
दी?
अमीर दोस्त पीछे मुड़ा और पांच
का सिक्का उठाकर बोला
ये तो मेरी जेब से गिरा पांच के सिक्के
की आवाज़ थी।
गरीब दोस्त एक कांटे के छोटे से पोधे
की तरफ गया
जिसमे एक तितली पंख फडफडा रही थी .
गरीब दोस्त ने उस तितली को धीरे से बाहर
निकला और
आकाश में आज़ाद कर दिया .
अमीर दोस्त ने आतुरता से पुछा
तुझे तितली की आवाज़ केसे सुनाई दी?
गरीब दोस्त ने नम्रता से कहा
" तेरे में और मुझ में यही फर्क है
तुझे "धन" की सुनाई दी और मुझे "मन"
की आवाज़ सुनाई दी .
"यही सच है "
.इतनी ऊँचाई न देना प्रभु कि,
धरती पराई लगने लगे l
इनती खुशियाँ भी न देना कि,
दुःख पर किसी के हंसी आने लगे ।
नहीं चाहिए ऐसी शक्ति जिसका,
निर्बल पर प्रयोग करूँ l
नहीं चाहिए ऐसा भाव कि,
किसी को देख जल-जल मरूँ
ऐसा ज्ञान मुझे न देना,
अभिमान जिसका होने लगे I
ऐसी चतुराई भी न देना जो,
लोगों को छलने लगे ।
: खवाहिश नही मुझे
मशहुर होने की।
आप मुझे पहचानते हो
बस इतना ही काफी है।
अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा जाना मुझे।
क्यों की जीसकी जीतनी
जरुरत थी उसने उतना ही
पहचाना मुझे।
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा
भी कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं, और साल
गुज़रते चले जा रहे हैं....!
एक अजीब सी
दौड़ है ये ज़िन्दगी,
जीत जाओ तो कई
अपने पीछे छूट जाते हैं,
और हार जाओ तो अपने
ही पीछे छोड़ जाते हैं।.....
Tuesday, October 21, 2014
विकी डोनर
युवराज की खुराक किसी बड़े
बॉडीबिल्डर की तरह है.
चंडीगढ़ का यह बांका जवान मानो मिस्टर यूनिवर्स
का खिताब जीतने की तैयारी कर
रहा है. हर रोज 20 लीटर दूध पीता है,
5 किलो सेब खाता है और 15 किलो पोषक खाना खाता है.
उसकी लंबाई 14 फुट और ऊंचाई 5 फुट 9 इंच है.
गठे हुए शरीर वाला युवराज सीना तानकर
चलता है और उसकी चाल में गजब का रौब दिखता है.
देशभर के अमीर किसान चाहते हैं कि युवराज उनके
यहां आकर रहे. उसे बड़े लाड-प्यार से पालने वाले
चंडीगढ़ किसान करमवीर सिंह
का कहना है कि एक व्यक्ति ने 7 करोड़ रुपये का ऑफर दिया था,
लेकिन वे अपने बेटे का सौदा नहीं कर सकते.
पढ़िए: दूध बेचकर करोड़पति बनने वालों के बारे में
जिस मुल्क में 60
फीसदी ग्रामीण हर रोज मात्र
35 रुपये कमाते हैं, वहां युवराज के पिता उसके खाने-
पीने पर हर रोज करीब 900 रुपये कैसे
खर्च कर देते हैं? दरअसल, युवराज बहुत कमाऊ पूत है.
करमवीर सिंह का कहना है कि वे
उसकी बदौलत साल में करीब 50 लाख
रुपये कमा लेते हैं.
यानी करमवीर हर रोज करीब
14,000 रुपये युवराज से कमाते हैं. लेकिन इसके लिए उनके बेटे
को खास मेहनत
नहीं करनी होती. वह
इतनी बढिय़ा खुराक की बदौलत हर रोज
3.5 से 5 एमएल
बढिय़ा क्वालिटी का सीमेन तैयार करता है,
जिसे डायल्यूट करके 35 एमएल सीमेन तैयार
किया जाता है. गर्भाधान के लिए 0.25 एमएल सीमेन
की जरूरत होती है और इसके लिए कोई
भी किसान 1,500 रुपये हंसी-
खुशी देने को तैयार रहता है.
इस तरह अगर युवराज के कुल सीमेन
का सौदा किया जाए तो हर रोज करमवीर को 2,10,000
रुपये मिल सकते हैं. ऐसे में इस दूसरे 'विकी डोनर'
को करमवीर मात्र 7 करोड़ रुपये में भला क्यों बचेंगे.
वैसे, यह बता दें कि 'विकी डोनर' युवराज 1,400
किलो का मुर्रा भैंसा है, जिसकी मां हर रोज 25
किलो दूध देती थी और
इसकी वजह से उसके सीमेन
की जबरदस्त मांग है.
आप
" काश ………………… "
काश आज़ादी के बाद, "अरविन्द" जैसे
निस्वार्थी देशभक्त नेता होते और "आम
आदमी पार्टी" जैसे ईमानदार दल।
जनता को एक
साफ़-सुथरी पारदर्शी जवाबदेह
वयवस्था मिलती।
अँग्रेज़ों के कानून की जगह अपने कानून बनते।
जनता को जनलोकपाल, स्वराज, नापसन्दी,
भ्रष्टों को हटाने जैसे बुनियादी अधिकार तुरन्त
मिलते। चुनाव, पुलिस, न्यायिक, प्रशासनिक सुधार
होते। जांच और अन्य संस्थायें स्वतन्त्र
होती तो आज हर भारतीय सुरक्षित,
स्वस्थ,
शिक्षित, कार्यरत और सुख-संपन्न होता। वस्तुएं
आधे से भी कम मूल्य पर मिलती। भारत
दुनिया का सबसे खुशहाल देश होता।
पर हुआ इसका बिलकुल उल्टा। जिस जिस नेता और
दल के हाथ सत्ता आई, वो अपना स्वार्थ साधने के
लिए, देश और जनता को भूल गया। मानवता,
नैतिकता, देशसेवा की भावना कहीं बहुत
पीछे छूट
गयी। बिकाउओं ने देश के संसाधन - ज़मीन,
प्राकृतिक सम्पदा, स्पेक्ट्रम, ठेके, लाइसेंस
आदि भाई-भतीजों, बाहुबलियों और घनिष्टमित्र
पूँजीवादीयों में बाँट दिए। और अब वो इन
किर्या-
कलापों पर पर्दा डालने के लिए ना सिर्फ कानून
बल्कि जांच से लेकर न्यायधीश तक सब
अपनी मनमर्ज़ी के चाहते हैं। ये
कैसी न्याय-
वयवस्था, ये कैसा जनतंत्र।
पंगु बनाई गई, भोली-भाली अनपढ़
गरीब जनता के
हिस्से तो आजतक वोट-बैंक, असुरक्षा, अशिक्षा,
अन्याय, बलात्कार, कमरतोड़ महंगाई और
बेरोज़गारी ही आई है। बेहद
लम्बी और
खर्चीली न्याय प्रक्रिया आम
आदमी की पहुँच से
बाहर है। जनता बेचारी तो फिर भी, इन के
झूठे
वादों पर अंधविश्वास कर कभी एक को,
कभी दूसरे
को सत्ता की कुर्सी पर
बैठाती रही। इस बार
दागी सांसद, 162 से बढ़कर, 182 हो गए हैं।
ऐसों से देश और जनहित की कोई उम्मीद
करना बिलकुल व्यर्थ है।
अब एक ही आशा -> "अरविन्द
केजरीवाल", अब
एक ही विकल्प -> "आम
आदमी पार्टी"
जय हिन्द !
E. V. M.
भारतीय वोटिंग मशीन (EVM)प्रतिबंध
लगाने के 10 ठोस कारण
.
यहाँ पर हम उन बातों का ज़िक्र कर रहे है जिनके कारण
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर बैन लगना चाहिए
1 ) सम्पूर्ण विश्व ने एक जैसी EVM
मशीन को एक सिरे से नकार दिया
जो मशीन भारत में evm के नाम से
जानी जाती है उसे
ही अंतर्राष्ट्रीय तौर पर (DRE)
यानी डायरेक्ट रिकॉर्डिंग इलेक्ट्रोनिक वोटिंग
मशीन कहा जाता है ,जो की वोट
को डायरेक्ट इलेक्ट्रॉनिक मेमोरी में सेव कर
लेती है इसी से
मिलती जुलती सब मशीन बहुत
देशो में बैन की जा चुकी है जिनमे
जर्मनी,नीदरलैंड, आयरलैंड,.लेकिन
यूनाइटेड स्टेट्स के कुछ प्रान्तों में इस मशीन
का उपयोग होता है लेकिन
वो भी कागज़ी बैकअप के साथ.
विकसित देशो जैसे यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जापान और सिंगापुर
अभी भी अपने पेपर बैलट पर
ही टिका हुआ है जिससे
की मतदाता का भरोसा बरक़रार रखा जा सके | लेकिन
भारत अपने इलाके में एकमात्र ऐसा देश है जिसने इलेक्ट्रॉनिक
वोटिंग मशीन के इस्तेमाल
को प्राथमिकता दी है |
2) ईवीएम मशीनों का उपयोग
भी असंवैधानिक और अवैध है !
इवीएम मशीन को असंवैधानिक
ठहराया जा सकता है क्यूंकि इसके द्वारा मतदाता के मौलिक
अधिकारों का हनन होता है . भारत में मतदान का अधिकार एक
कानूनी अधिकार है, लेकिन है कि मतदान एक
मतदाता द्वारा प्रयोग किया जाना चाहिए कि कैसे नागरिकों को मौलिक
अधिकार की गारंटी देता है जो,आर्टिकल
19(1)(a) में कवर किया गया है जोकि बताता है की वोट
देना उसका निजी मामला है और जो नागरिको को मूलभूत
अधिकारों की गारंटी देता है |
पारंपरिक कागज़ी प्रणाली ,नागरिको के
मूलभूत अधिकारों को सुरक्षित रखती है
क्योंकि मतदाता को पता रहता है की उसने किसे वोट
दिया था! 1984 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावों में
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग अवैध करार दे
दिया था क्यूंकी रेप्रेज़ेंटेशन ऑफ पीपल
(आ) एक्ट 1951
इसकी अनुमति नहीं देता!
आरपी अधिनियम की धारा 61आ को शामिल
करके 1989 में इसी क़ानून मे संशोधन किया गया था!
हालांकि, संशोधन मे यह सॉफ तौर पर
था की ईवीएम मशीन
का इस्तेमाल उन्ही निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन
क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है जहाँ चुनाव आयोग प्रत्येक मामले
की खास परिस्थितियों को ध्यान मे रखते हुए, आदेश इस
संबंध मे आदेश जारी करता है
चुनाव आयोग ने 2004 और 2009 के आम चुनाव मे इलेक्ट्रॉनिक
वोटिंग मशीनों का आम उपयोग जिस तरह किया, क्या वह
सुप्रीम कोर्ट के 1984 के फैसले और रेप्रेज़ेंटेशन
ऑफ पीपल (आ) एक्ट 1951 का खुला उलंघन
नहीं है ?
3) EVM का सॉफ्टवेर सुरक्षित नही है
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन सिर्फ और सिर्फ तब
ही सुरक्षित है जब तक इसमें वास्तविक कोड
प्रणाली इस्तेमाल की जाती है
| लेकिन चौकाने वाला तथ्य ये है की EVM
मशीन निर्माता कंपनी BEL एंड ECIL ने
ये टॉप सीक्रेट (EVM मशीन के सॉफ्टवेर
कोड ) को दो विदेशी कंपनियो के साथ साझा किया गया है
विदेशी कंपनियों को दिया सॉफ्टवेयर
भी जाहिरा तौर पर सुरक्षा कारणों से, निर्वाचन आयोग के
पास उपलब्ध नहीं है.
4) ईवीएम का हार्डवेयर भी सुरक्षित
नहीं है
ईवीएम का खतरा सिर्फ उसके सॉफ्टवेर में
छेड़खानी से
ही नही होता यहाँ तक
की उसका हार्डवेयर भी सुरक्षित
नहीं है डॉ अलेक्स हैल्दरमैन मिशिगन
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के मुताबिक ”
ईवीएम में जो सॉफ्टवेर इस्तेमाल किया जाता है वो वोटिंग
मशीन के लिए बनाया गया है अगर
वो किसी सॉफ्टवेर हमले से नष्ट होता है
तो नया सॉफ्टवेर तैयार किया जा सकता है और यही बात
इसके हार्डवेयर पर भी लागू होती है ”
संछेप में भारतीय ईवीएम का कोई
सा भी पार्ट आसानी से बदला जा सकता है
बंगलौर स्थित सॉफ्टवेर
कंपनी जो की ईवीएम
की निर्माता है , इसमें एक ऑथेंटिकेशन यूनिट लगाई है
जो की सिक्योर स्पिन
की सेवा को जारी रखती है यह
यूनिट 2006 में बनाई और टेस्ट
की गयी थी लेकिन जब
इसका इम्प्लीमेंटेशन करना था तो अंतिम समय पर
रहस्यमी तौर इस यूनिट को हटा लिया गया | चुनाव
आयोग के इस निर्णय को लेकर कई प्रश्न खड़े हुए थे लेकिन
किसी का भी जवाब
नही दिया गया |
5) EVMs को छुपाया जा सकता है
भारतीय evm को इलेक्शन से पहले या बाद में हैक्ड
किया जा सकता है ,जैसा की उपर उल्लेख
किया जा चूका है की evm में आसानी से
सॉफ्टवेर या हार्डवेयर चिप को बदला जा सकता है कुछ सूत्रों के
मुताबिक भारतीय evm को हैक करने के कई
तरीके है यहाँ हम 2 तरीको का उल्लेख
कर रहे है |
हर एक ईवीएम के कण्ट्रोल यूनिट में दो EEPROMs
होते हिया जो मतदान को सुरक्षित रखते है | यह
पूरी तरह से असुरक्षित है और EEPROMs में
संरक्षित किया गया डाटा बाहरी सोर्स से
बदला जा सकता है | EEPROMs से डाटा पढना और उसे
बदलना बहुत आसान है
दूसरा तरीका और भी अधिक खतरनाक है ,
इसमें कण्ट्रोल यूनिट के डिस्प्ले सेक्शन में ट्रोजन लिप्त एक चिप
लगाकर हैक किया जा सकता है इसे बदलने में सिर्फ 2 मिनट लगते
है और सिर्फ 500-600 रुपए में पूरी तरह से यूनिट
चिप (हार्डवेयर) बदलने का खर्चा आ जाता | इस तरह से
नयी लगाई हुई चिप
पुरानी सभी आंतरिक सुरक्षा को बाईपास कर
देती है ,यह चिप नतीजो को बदल
सकता है और स्क्रीन पर फिक्स्ड रिजल्ट
दिखाया जा सकता है चुनाव आयोग ने इस तरह
की संभावनाओं को पूरी तरह से बेखबर है.
6) ‘आंतरिक’ घपलेबाजी होने का खतरा
अच्छी तरह से जमे हुए कुछ राजनितिक सूत्रों के
मुताबिक, अगर ‘आंतरिक’ अच्छी सांठगांठ हो तो चुनाव के
नतीजे पर असर पड़ सकता है लेकिन यहाँ सवाल ये
पैदा होता है की ये आंतरिक कौन होते है |
जैसा की पारंपरिक बैलट प्रणाली में
‘आंतरिक ‘ चुनाव अधिकारी होते थे लेकिन evm इन
आंतरिक लोगो की एक श्रंखला बना देती है
जो की भारत निर्वाचन आयोग के दायरे और नियंत्रण से
बाहर हैं
इन “अंदरूनी सूत्रों” के कुछ चुनावों फिक्सिंग में संदिग्ध
गतिविधियों में शामिल होने
की पूरी संभावना हो सकती है .
सम्पूर्ण विश्व को छोड़ सिर्फ भारत में ही चुनाव आयोग
ने इस ‘आंतरिक सूत्र ‘ के खतरे को जिंदा किया हुआ है |ये आंतरिक
सूत्र इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन बनाने
वाली कंपनी ,भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड
(BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन ऑफ़ इन्डिया (ECIL),
विदेशी कंपनियां जो EVM के लिए चिप सप्लाई
करती है ,
निजी कंपनियां जो की evm का रखरखाव
और जाँच पड़ताल करती है (जिसमे से कुछ
कंपनियां राजनेता ही चला रहे है ) इनमे से कोई
भी हो सकती है |
7) संग्रहण और मतगणना चिंता का विषय
ईवीएम जिला मुख्यालय पर जमा होती है .
ईवीएम की सुरक्षा के लिए चुनाव आयोग
की चिंता , केवल चुनाव के दौरान
ही की जाती है
जहां सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार वोटिंग मशीनों,
जीवन चक्र के दौरान एक सुरक्षित वातावरण में
रहना चाहिए. बेव हैरिस , एक
अमेरिकी कार्यकर्ता कहते हैं. “इलेक्ट्रॉनिक
गिनती के साथ जुड़े कई कदाचार हो सकते है. “हर कोई
बारीकी से मतदान देखता है. लेकिन कोई
भी मतगणना को नजदीकी से
नही देखता .”
हमारे चुनाव आयोग को संसदीय चुनाव का संचालन करने
के लिए तीन महीने लग जाते हैं लेकिन
सिर्फ तीन घंटे में मतगणना का खेल खत्म हो जाता है!
परिणाम और विजेताओं की घोषणा करने के लिए
भीड़ में, कई गंभीर
खामियों मतगणना की प्रक्रिया में
अनदेखी की जाती है .
नतीजतन,पार्टियों यह इस गतिविधि के हकदार हैं
कि किस तरह डाले गये वोट और मतगणना के वोट में अंतर आता है
अगर यही अंतर राष्ट्रीय स्तर पर जोड़
कर चले तो सिर्फ अंतर से ही कई सांसद चुने
जा सकते है |
8) अविश्वासी मतदान
सिर्फ कुछ पार्टियाँ evm के विरोध में
नही बल्कि लगभग सभी पार्टियाँ ,
भाजपा सहित कांग्रेस, वामपंथी दलों, आदि तेलुगू देशम
पार्टी (तेदेपा), अन्नाद्रमुक,
समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक
दल (रालोद), जनता दल (यूनाइटेड) जैसे क्षेत्रीय
दलों 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद ईवीएम को सबने
अरक्षित बताया था.
कथित तौर पर उड़ीसा के चुनाव के बाद ये
कहा गया था की कांग्रेस ने evm में
गड़बड़ी करके ये चुनाव जीता है.
9) चुनाव आयोग evm की टेक्नोलॉजी के
बारे में क्लूलेस है
चुनाव आयोग ने
बिना इसकी प्रयोगी तकनीक
जांचे ,evm का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया ,
नतीजतन , चुनाव आयोग की अपेक्षा के
विपरीत चुनावी परक्रिया पर बहुत कम
नियंत्रण है | न तो चुनाव आयोग , ना वर्तमान आयोग और
ना ही उनके पहले वालो को evm
टेक्नोलॉजी की समझ थी
तकनिकी सलाहकार के तौर पर एक
कमिटी जिसके
मुखिया प्रोफ.पी वी इन्दिर्सन है ,मिशिगन
में कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर हल्दरमेन ने ”
डेमोक्रेसी अट रिस्क – कैन वी ट्रस्ट
आवर ईवीम्स ” नमक एक किताब सिर्फ evm के
खतरों को केन्द्रित करते हुए लिखी है
10) भरोसा बरकरार रखना मुश्किल
उदाहरण के तौर पर
पुराने ईवीएम
अपनी ही विशेषज्ञ
समिति की सिफारिशों के विपरीत
लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल किये गये , क्यों यह स्पष्ट
नहीं होता.?
यह भी स्पष्ट
नही होता की क्यों 4.48 लाख
नयी evm ( एक्सपर्ट कमिटी के अनुसार
नयी मशीन अधिक सुरक्षित है ) कांग्रेस
शासित राज्यों में इस्तेमाल
नही की गयी ?
क्यों वहां राज्य सरकार के स्वामित्व
वाली ईवीएम मशीनों के उपयोग
की अनुमति दी थी ?
Thursday, October 16, 2014
अफसोसनाक
“मैं 29 साल की हूं और
मेरी शादी को केवल एक साल
ही हुआ है. मेरे पति और मैं परिवार
को बढ़ाने के बारे में सोच रहे हैं, लेकिन
ऐसा हो नहीं सकता”.
ब्रिटनी मेनार्ड नाम की यह
महिला ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित हैं. वह
मरना नहीं चाहती, इसके
बावजूद वह आत्महत्या के जरिए
अपनी जिंदगी को खत्म
करना चाहती हैं. उन्होंने
अपनी मौत की तारीख
01 नवंबर निश्चित कर रखी है.
अजीब सी लगने
वाली यह खबर आज विश्व में हर
किसी को हैरान कर रही है.
ब्रिटनी की स्टोरी बहुत
बड़ा बहस का मुद्दा बन चुका है. मुद्दा यह
कि क्या ‘मरने का अधिकार’
किसी मिलना चाहिए.
Read: वह 9 महीने तक अपने
पति की लाश के साथ रहकर उसके सड़ने
का इंतजार करती रही… यह
मजबूरी थी या पागलपन!!
दरअसल इस साल के शुरुआत में ब्रिटनी सिर में
हो रहे दर्द के लिए जब डॉक्टर से
मिली तब उसे पता चला की उसे
ब्रेन ट्यूमर है. उन्हें ग्लियोब्लासटोमा हुआ
था जो एक तरह का घातक ब्रेन कैंसर है. डॉक्टरों ने
कहा कि वह ज्यादा से ज्यादा दस साल तक
जीवित रह सकती हैं. लेकिन
तीन महीने के बाद
ही उनके सिर का दर्द और बढ़ने लगा और
उधर ट्यूमर भी लगातार
बढ़ता ही जा रहा था.
अपनी शरीर
की बढ़ती पीड़ाओं
को देखते हुए ब्रिटनी ने आखिरकार निर्णय
लिया कि उनके लिए मौत
को चुनना ही बेहतर विकल्प रहेगा.
उन्होंने कहा कि मेरे इस निर्णय का मेरे परिवार वालो ने
समर्थन किया है, हालांकि उन्हें समझाने में
काफी समय भी लगा.
यही नहीं, मेरे आसपास
रहने वाले लोग भी मेरे इस निर्णय
का समर्थन कर रहे हैं.
क्षमता
मेंढक को अगर पानी से भरे बर्तन में रख दें और
पानी गरम करने लगें तो क्या होगा?
मेंढक फौरन मर जाएगा? ना... ऐसा बहुत देर के बाद होगा...
दरअसल होता ये है कि जैसे जैसे पानी का तापमान
बढता है, मेढक उस तापमान के हिसाब से अपने शरीर
को Adjust करने लगता है। पानी का तापमान, खौलने
लायक पहुंचने तक, वो ऐसा ही करता रहता है।
अपनी पूरी उर्जा वो पानी के
तापमान से तालमेल बनाने में खर्च करता रहता है।
लेकिन जब पानी खौलने को होता है और वो अपने
Boiling Point तक पहुंच जाता है, तब मेढक अपने
शरीर को उसके अनुसार समायोजित नहीं कर
पाता है, और अब वो पानी से बाहर आने के लिए, छलांग
लगाने की कोशिश करता है। लेकिन अब ये मुमकिन
नहीं है। क्योंकि अपनी छलाँग लगाने
की क्षमता के बावजूद, मेंढक ने
अपनी सारी ऊर्जा वातावरण के साथ खुद
को Adjust करने में खर्च कर दी है। अब
पानी से बाहर आने केलिए छलांग लगाने
की शक्ति, उसमें
बची ही नहींI
वो पानी से बाहर नहीं आ पायेगा, और
मारा जायेगाI
मेढक क्यों मर जाएगा? कौन मारता है उसको?
पानी का तापमान? गरमी? या उसका स्वभाव?
मेढक को मार देती है,
उसकी असमर्थता सही वक्त पर
सही फैसला ले सकने की अयोग्यता। ये
तय करने की उसकी अक्षमता कि कब
पानी से बाहर आने के लिये छलांग
लगा देनी है।
इसी तरह हम भी अपने वातावरण और
लोगो के साथ सामंजस्य बनाए रखने की तबतक कोशिश
करते हैं, जब तक की छलांग लगा सकने
की हमारी सारी ताकत खत्म
नहीं हो जाती।
लोग हमारे तालमेल बनाए रखने
की काबीलियत
को कमजोरी समझ लेते हैं। वो इसे
हमारी आदत और स्वभाव समझते हैं। उन्हें ये
भरोसा होता है कि वो कुछ भी करें, हम तो Adjust कर
ही लेंगे और वो तापमान बढ़ाते जाते हैं।
हमारे सारे इंसानी रिश्ते, राजनीतिक और
सामाजिक भी, ऐसे ही होते हैं,
पानी, तापमान और मेंढक जैसे। ये तय हमें
ही करना होता है कि हम जल मरें
या सही वक्त पर कूद निकलें।