Wednesday, September 2, 2020

परवाज़ भाग १

परवाज़ भाग १

                  वह अपना कैरियर बनाना चाहती थी लेकिन उसका पति पुराने विचारों का था उसकी सोच थी कि औरत सिर्फ बच्चे जनने और घर संभालने की मशीन है।

संध्या नाम था उसका साधारण खूबसुरत गठीला बदन गोरा रंग लंबा क़द कोई कमी नहीं थी उसमें पढ़ने में भी तेज़। डाॅ. बनने का सपना था पर उसका ग़रीब परिवार से थी बाप मिल मजदुर था चार बच्चों में सबसे छोटी थी और वो भी लड़की ज़ात। उसका पालन पोषण वैसे ही हुआ जैसे आम भारतीय परिवारों में होता है तीन तीन भाइयों के होते हुए उसको कोई प्यार नहीं करता था। और न मां बाप ज़्यादा परवाह करते थे।

             सरकारी स्कूल में हाईस्कूल तक ही पढ़ पायी थी मां बाप शादी करके घर से निकाल फुर्सत होना चाहते थे। तीनों बड़े भाई बमुश्किल इंटर पास करके मज़दूरी करने लगे थे। बहन की शादी के लिए बड़ी मुश्किल से थोड़ा धन जुटा पाये थे।

             अंततः नियति के आगे किसी की नहीं चलती सपनों के राजकुमार के सपने मन संजोये हुए संध्या की शादी एक ग़रीब घर में हो गयी। रमेश उसका पति सामान्य क़द काठी सांवला और दुबला पतला लड़का था। सुहागरात वाले दिन ही रमेश को देखकर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। परंतु धीरे-धीरे उसने हालात से समझौता कर रमेश को अपना पति मानना ही पड़ा।
              समय धीरे-धीरे पंख लगाकर उड़ता रहा ग़रीबी और तंगी के चलते संध्या परेशान रहने लगी। बड़ा परिवार और कमाने वाले दो पति की तरह ससुरजी भी मज़दूरी करते थे। तब जाकर परिवार की गाड़ी चलती थी। दो ननदों की शादी की भी टेंशन थी इंहीं सब परेशानियों को देखते हुए वो अपना  मां बनना टालती जा रही थी। घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए संध्या ने नौकरी करने की इच्छा ज़ाहिर की। परंतु रमेश और उसके परिवारवाले राज़ी नहीं थे। एक समय का लेंगे पर बहुत बेटी से नौकरी नहीं करायेंगे।
              इस बात को लेकर कइ बार घर में झगड़े होने लगे, समय का चक्र चला और संध्या ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया और वो दो प्यारे प्यारे बच्चों की मां बन गयी। घर ख़र्चे बढ़े तो रमेश देर रात तक मज़दूरी करने लगा, देर रात घर से बाहर रहने की वजह से रमेश को शराब की लत लग गई। इधर रमेश की दोनों बहनें शादी की उम्र पार कर गयीं। बड़ी बहन रेखा का पड़ोस के लड़के से चक्कर चला और वो गर्भवती हो गयी। पिताजी ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके और खाट पकड़ ली। बड़े-बड़े डाॅक्टरों को दिखाया पर कुछ नहीं हुआ। कमाने वाला एक कम हुआ तो घर में खाने के लाले पड़ गए उस पर बहन की बदनामी संध्या जीवन नर्क बन गया  बच्चों को भी भूखा सुलाना पड़ रहा था।
             रमेश नौकरी के पक्ष में अभी भी नहीं था थक-हारकर संध्या घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का विचार किया तो कोई भी अभिभावक संध्या के घर ट्यूशन पढ़ने अपने बच्चों को भेजने को तैयार नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में ससुरजी चल बसे। हालात सुधर नहीं रहे थे। बदनामी और लोगों के तानों से परेशान रेखा घर छोड़कर भाग गई।
            एक रोज़ रमेश के काम से घर लौटते समय एक्सिडेंट हो गया रमेश ने खटिया पकड़ी तो अब संध्या के पास परिवार का पेट पालने और पति के इलाज के लिए घर से बाहर निकलकर नौकरी करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।
            थोड़ी दौड़ धूप करने पर नौकरी मिल गई तनख्वाह तो ज़्यादा नहीं थी पर इसके सिवा कोई रास्ता नहीं था। दफ्तर भी घर से बहुत दूर था लेकिन क्या करती। परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी करनी पड़ी।
क्रमश:

Sunday, June 21, 2020

गलवान घाटी

वो #मुसलमान, जिसकी वजह से घाटी का नाम #गलवान पड़ा।
जिस #गलवान_घाटी को चाईना अपनी जमीन बताकर खून-खराबा कर रहा है। उस गलवान घाटी का नाम एक
मुसलमान "#गुलाम_रसूल_गलवान" के नाम पर रखा गया था। #गुलाम_रसूल_गलवान अपनी लिखी हुई किताब में बताते हैं कि जब 1892 में #चार्ल्स_मरे वहां आए, तो गलवान उनके साथ सफ़र पर निकले थे। चार्ल्स डनमोर के सातवें थे। डनमोर आयरलैंड में एक जगह का नाम है। इन्हीं के साथ जब गुलाम रसूल गलवान निकले, तब उनकी उम्र बमुश्किल 14 साल की थी। इस सफ़र के दौरान उनका काफिला एक जगह अटक गया। वहां सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और खड़ी खाइयां थीं। उनके बीच से नदी बह रही थी। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यहां से कैसे निकला जाए! तब 14 साल के #गलवान ने एक आसान रास्ता ढूंढ निकाला, और वहां से #काफिले को निकाल के ले गए।
लद्दाखी इतिहासकार #अब्दुल_गनी_शेख के मुताबिक़, गलवान की ये चतुराई देखकर #चार्ल्स बहुत मूतासिर हुए और उस जगह का नाम #गलवान_नाला रख दिया। गलवान के नाम पर अब वो जगह #गलवान_घाटी कहलाती है।
#सर्वेन्ट_ऑफ़_साहिब्स किताब की खासियत ये है कि ये #गुलाम_रसूल_गलवान की टूटी-फूटी अंग्रेजी में उनके सफ़र नामा को बताती है. गुलाम रसूल गलवान ने अपनी 35 साल के सफरों में #अंग्रेजी, #लद्दाखी, #उर्दू, और #तुर्की ज़बान का बोलना सीख लिया था। बाद में वो लेह में ब्रिटिश कमिश्नर के चीफ असिस्टेंट के ओहदे पर पहुंचे।
उन की पैदाइश 1878 में हुई और 1925 में इंतकाल कर गए।
जिस गलवान घाटी के लिये #चीन और #हिन्दुंस्तान मैं झगड़ा हो रहा है जिसमें हमारे 20 जवान शहीद हो गए। हिन्दुंस्तान कहेता है #गुलाम_रसुल_गलवान हिन्दुंस्तानी था इसलिये वो घाटी भी हमारी है लेकिन चाइना कहे रहा है अगर ये जमीन तुम्हारी है तो कागज़ दिखाओ और ये साबित करो कि #गुलाम_रसुल_गलवान हिन्दुंस्तानी है।
जो लोग कुछ दिन पहेले 20 करोड़ #मुसलमानों से कागज ढुंढने को कह रहे थे, आज वो एक #मुसलमान के #कागज खुद तलाश रहे है।
#अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती है और वो तुम्हारी #साजिशों को तुम्हारे ही मुँह पर मार देता है। वो हर सय पे #कादिर है।

Wednesday, June 10, 2020

शास्त्रीजी और मोदी

शास्त्री और मोदी जी :- #एक_तुलना

अब जब गृहमंत्री #अमित_शाह ने स्वर्गीय #लाल_बहादुर_शास्त्री और #नरेन्द्र_दामोदर_दास_मोदी की तुलना कर ही दी तो आईए कुछ तुलना और हो जाए।

तुलना नंबर -1 शास्त्री जी के 1964 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उनको सरकारी आवास के साथ ही "इंपाला शेवरले" कार मिली थी। जिसका उपयोग वह बिल्कुल ना के बराबर ही करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अथवा विशिष्ट अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी। 

एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। 

शास्त्री जी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई ? और जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया कि लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज। 

शास्त्री जी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा कर दें।

मोदी जी , ₹6880 करोड़ के जनता के पैसे से शानदार लक्जरियस 2 बोईंग विमान खरीद चुके हैं।

तुलना नंबर 2 :- जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे और बम्‍बई जा रहे थे। रेलमंत्री के नाते उनके लिए प्रथम श्रेणी का डिब्बा लगा था। 

गाड़ी चलने पर शास्त्री जी बोले- डिब्बे में काफ़ी ठंडक है, वैसे बाहर गर्मी है। उनके पीए कैलाश बाबू ने कहा- जी, इसमें कूलर लग गया है। 

शास्त्री जी ने पैनी निगाह से उन्हें देखा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा- कूलर लग गया है?… बिना मुझे बताए? 

आप लोग कोई काम करने से पहले मुझसे पूछते क्यों नहीं? 

क्या और सारे लोग जो गाड़ी में चल रहे हैं, उन्हें गरमी नहीं लगती होगी ? शास्त्री जी ने कहा- कायदा तो यह है कि मुझे भी थर्ड क्लास में चलना चाहिए, लेकिन उतना तो नहीं हो सकता, पर जितना हो सकता है उतना तो करना चाहिए। 

उन्होंने आगे कहा- बड़ा गलत काम हुआ है। आगे गाड़ी जहाँ भी रुके, पहले कूलर निकलवाइए। 

मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रुकी और कूलर निकलवाने के बाद ही गाड़ी आगे बढ़ी। आज भी फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे में जहां कूलर लगा था, लकड़ी जड़ी है।

1956 में महबूबनगर के अरियालपुर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत हुई थी। इस पर शास्त्री जी ने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।

मोदी जी के शासन में कितनी जाने गयीं ? इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती , गुजरात से लेकर दिल्ली तक लाशों का अंबार लगा हुआ है पर यह शख्स अपने कुर्ते पर एक शिकन आने नहीं देता।

तुलना नंबर 3- आज़ादी से पहले की बात है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपतराय ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाना था। 

आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री भी थे। उनको घर का खर्चा चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ से 50 रुपए हर महीने दिए जाते थे। 

एक बार उन्होंने जेल से अपनी पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा कि क्या उन्हें ये 50 रुपए समय से मिल रहे हैं और क्या ये घर का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त हैं ? 

ललिता शास्त्री ने जवाब दिया कि- ये राशि उनके लिए काफी है। वो तो सिर्फ 40 रुपये ख़र्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपये बचा रही हैं। 

लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा कि- उनके परिवार का गुज़ारा 40 रुपये में हो जा रहा है, इसलिए उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपए कर दी जाए और बाकी के 10 रुपए किसी और जरूरतमंद को दे दिए जाएँ।

मोदी जी के खर्च की तुलना कर लीजिए ? एक अनुमान के अनुसार केवल उनके शरीर पर कपड़े , घड़ी , पेन , चश्मे और जूते की लागत ₹10 लाख से अधिक होगी।

तुलना नंबर 4 - शास्त्री जी जब रेलमंत्री थे उस वक्त उन्होंने अपनी माँ को नहीं बताया था कि वो रेलमंत्री हैं, बल्कि ये बताया कि वे रेलवे में नौकर हैं। इसी दौरान मुगलसराय में एक रेलवे का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें शास्त्री जी को ढूंढते-ढूंढते उनकी मां पहुंच गईं।

उनकी माँ ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा कि उनका बेटा भी रेलवे में नौकरी करता है , लोगों ने नाम पूछा , माँ ने कहा "लाल बहादुर शास्त्री"।

लोग हैरान रह गये कि शास्त्री जी की माँ को यह ही नहीं पता कि उनका बेटा रेलवे में नौकरी नसीं करता बल्कि रेलमंत्री है।

मोदी जी , प्रधानमंत्री के रुतबे के साथ हर साल कैमरों के साथ माँ हीराबेन से मिलने पहुचते हैं और पूरे देश की मीडिया उनका यह कार्यक्रम लाईव दिखाती है।

तुलना नंबर 5- एक बार शास्त्री जी कपड़े की एक दुकान में साडि़यां खरीदने गए। दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख कर बहुत खुश हो गया। 

उसने उनके आने को अपना सौभाग्य माना और उनका स्वागत-सत्कार किया। शास्त्री जी ने उससे कहा कि वे जल्दी में हैं और उन्हें चार-पांच साड़ियां चाहिए। 

दुकान का मैनेजर शास्त्री जी को एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखाने लगा। सभी साड़ियां काफी कीमती थीं। शास्त्री जी बोले- भाई, मुझे इतनी महंगी साड़ियां नहीं चाहिए। कम कीमत वाली दिखाओ। 

इस पर मैनेजर ने कहा- सर… आप इन्हें अपना ही समझिए, दाम की तो कोई बात ही नहीं है। यह तो हम सबका सौभाग्य है कि आप पधारे। 

शास्त्री जी उसका मतलब समझ गए। उन्होंने कहा- मैं तो दाम देकर ही लूंगा। मैं जो तुम से कह रहा हूं उस पर ध्यान दो और मुझे कम कीमत की साडि़यां ही दिखाओ और उनकी कीमत बताते जाओ। 

तब मैनेजर ने शास्त्री जी को थोड़ी सस्ती साडि़यां दिखानी शुरू कीं। शास्त्री जी ने कहा- ये भी मेरे लिए महंगी ही हैं। और कम कीमत की दिखाओ। 

मैनेजर को एकदम सस्ती साड़ी दिखाने में संकोच हो रहा था। शास्त्री जी इसे भांप गए। उन्होंने कहा- दुकान में जो सबसे सस्ती साडि़यां हों, वो दिखाओ। मुझे वही चाहिए। 

आखिरकार मैनेजर ने उनके मनमुताबिक साडि़यां निकालीं। शास्त्री जी ने उनमें से कुछ चुन लीं और उनकी कीमत अदा कर चले गए।

मोदी जी के ₹10 लखिया सूट के बारे में आपको पता ही 

इक़बाल अहमद के वाल से

Corona fight

बीमार हो जाना अपराध नहीं है. मीडिया ने और नेताओं ने सिर्फ अपनी नाकामी छिपाने के लिए कभी जमाती तो कभी कुछ और बता कर कोरोना पीड़ित को अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया है.  ये मानवता के विरुद्ध अपराध है. 

मैं आज  समाज के सभी लोगों से एक अपील करना चाहता हूं कि जब भी कभी आपके आसपास या पड़ोसी को कोराना के लक्षण मिलें या व्यक्ति या पड़ोसी को क्वारोटाइन या आइसोलेशन के लिए ले जाया जा रहा हो तो उसकी वीडियोग्राफी करके उसे आपराधिक बोध जैसा अनुभव कराने का प्रयास ना करें बल्कि अपने घर के दरवाजे से, बालकनी से या छत से आवाज लगाकर, हाथ उठाकर, हाथ हिलाकर उनका उत्साह बढ़ाएं,हर प्रकार से मदद करें और कहें कि आप जल्द ही ठीक होकर हमारे बीच में फिर से पहले जैसी जिंदगी शुरू करेंगे। उनके जल्द ठीक होकर घर वापसी के लिए शुभकामनाएं दें।
1. उनकी इज़्ज़त करें। नफ़रत नहीं
2. उनके लिए प्रार्थना करें।
3. उन्हें अच्छा पड़ोसी व मित्र होने का एहसास कराएं।
4. Get Well Soon  कहें
जिससे वह अंदर से मज़बूत होकर सबके साथ फिर से जुड़े।
ऐसा करने से उन्हें अच्छा लगेगा साथ ही आपको भी शांति प्राप्त होगी क्योंकि इस स्थान पर हम में से कोई भी हो सकता है।
बीमारी दवा से कम और मनोबल से ज़्यादा ठीक होती है। 
एक-दूसरे का मनोबल बढ़ाएं। ईश्वर से प्रार्थना करें सभी का मंगल हो। सभी स्वस्थ रहें। सबके जीवन में प्रेम और शांति की स्थापना हो। ❤️❤️❤️❤️

धन्यवाद। 🙏🙏

lock down

एक जैसिंडा अर्डर्न है और एक नरेंद्र मोदी है......
आज न्यूजीलैंड कोरोना वायरस से पूरी तरह छुटकारा पा चुका है। वहां की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डन ने बताया कि देश में संक्रमित आखिरी व्यक्ति स्वस्थ हो गया है न्यूजीलैंड की खबर इसलिए भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है क्योकि भारत और न्यूजीलैंड ने एक ही दिन कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में लॉकडाउन का ऐलान किया था।.....आज न्यूजीलैंड ने एक तरह से कोरोना वायरस पर काबू पा लिया है तो इसका श्रेय न्यूजीलैंड की प्राइम मिनिस्टर जैसिंडा अर्डर्न की नीतियों को दिया जा रहा है.और एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री है जो खुद अपने मुँह मिया मिठ्ठू बन कर कोरोना से लड़ने वाले वर्ल्ड के बेस्ट प्रधानमंत्री का अवार्ड अपने गले में डलवा रहे थे जबकि केस लगाता बढ़ते जा रहे थे 

जब इटली की खबर आई तो जैसिंडा अर्डर्न ने कहा था कि जो इटली में हुआ वैसा वह अपने देश में नहीं होने देंगी आज हम भारत में इटली को कही पीछे छोड़ चुके है हमारे यहाँ लॉक डाउन तब खोला गया है जब कम्युनिटी स्प्रेड की सिचुयशन है लेकिन आज हम न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री की बात कर रहे है जिन्होंने सतर्कता और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर कोरोना को हरा कर दिखाया.है  

जैसिंडा अर्डर्न ने मेडिकल एक्सपर्ट्स के साथ 4 सू्त्रीय कार्यक्रम बनाया, जिसमें 43 प्वॉइंट थे। 7 हफ्ते का लॉकडाउन भी रहा लेकिन हर हफ्ते समीक्षा की गई। जैसिंडा अर्डर्न इस पूरे अभियान में कोरोना से लड़ने के लिए फ्रंट लाइन में खड़ी रहीं, न्यूजीलैंड ने कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए अलर्ट के चार लेवल बनाए। पहले चरण में खतरे का अनुमान लगाना और उसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई करना था। जिसके तहत देश की सीमाओं को बंद कर दिया गया। टेस्टिंग पर फोकस किया गया और संक्रमितों की कांट्रेक्ट ट्रेसिंग शुरू की गई। वहीं दूसरे चरण में परिस्थितियों के हिसाब से प्रतिबंधों में छूट दी गई। 7 हफ्ते के सख्त लॉकडाउन की हर हफ्ते समीक्षा की गई। तीसरे चरण में वायरस के रोकधाम के लिए व्यापक स्तर पर प्रबंध किए गए। फिजिकल डिस्टेंसिंग पर जोर दिया गया वहीं, आइसोलेट और क्वारंटीन लोगों की जांच और देखभाल की गई। चौथे चरण में इमरजेंसी सर्विसेज को छोड़कर लोगों को घर में रहने की हिदायत दी गई। सभी सार्वजनिक स्थलों को बंद कर दिया गया और सभी तरह की यात्राओं पर रोक लगा दी गई।

न्यूजीलैंड में कुल 1154 मामले सामने आए। 22 लोगों की मौत हुई। करीब तीन लाख लोगों का टेस्ट हुआ। और आज न्यूजीलैंड ने अपने आपको कोरोना से मुक्त देश घोषित किया है ..........

Wednesday, June 3, 2020

नाजायज़

बिन ब्याही माँ :-

भारतीय क्रिकेटर हार्दिक पांड्या अपनी गर्लफ्रेन्ड नताशा स्तांकोविक के साथ एक चित्र पोस्ट करके सुर्खियों में हैं जिसमें उन्होंने सूचित किया है कि उन दोनों के जीवन में एक तीसरा मेहमान आने वाला है।

यह अद्भुत है।

लोग हार्दिक पांड्या और नताशा स्तांकोविक को बधाई दे रहे हैं , तब जबकि इन दोनों ने अभी तक विवाह नहीं किया है।

पूर्व में ऐसे संबन्धों से जन्में बच्चों को ही "हरामी" या "हराम की औलाद" कहा जाता रहा है , ऐसी माँ को कुलटा कुलक्षिणी और चरित्रहीन कहा जाता रहा है पर अब आज के समय में यह सब बधाई के पात्र हैं।

निंदनीय है "सफूरा जरगर" जो 2018 में अपने विवाह के बाद जनवरी में गर्भवती हो गयी है , और वह अब आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद है।

आप यह मत समझिए कि संघ ने केवल भारतीय समाज का विभाजन ही किया है बल्कि उसने अपने समर्थकों को बुद्धीविहीन करके "जोम्बी" बना दिया है।

यही कारण है कि बिनब्याहे "नताशा-हार्दिक" को गर्भवती होने की बधाई देने वाले ऐसे ज़हरीले पिस्सू "सफूरा जरगर" के चरित्र पर सवाल उठा रहे थे।

हकीकत यह है कि यह सभी एक तरह के "राजनैतिक कीड़े" बन चुके हैं जिनका हर आकलन , हर नैतिक और अनैतिक , हर हलाल और हराम कामों के आकलन का आधार केवल और केवल अपने आका के राजनैतिक हानि और लाभ के आधार पर होता है।

इनको ना नैतिकता से कोई मतलब होता है ना देश से ना अपने देश की संस्कृत से , यह इसमें ही खुश हैं कि सीएए के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रहा "शाहीन बाग" बिना किसी परिणाम को हासिल किए खत्म हो गया।

यह इसमें ही खुश हैं कि सीएए विरोध से जुड़े सभी क्रांतिकारी एक एक करके दिल्ली दंगों में आरोपित करके यूएपीए में अंदर किए जा रहे हैं , तब जबकि देश एक महामारी की चपेट में है।

यह ज़ोम्बी इशरत जहां , आसिफ इकबाल तन्हा, गुलफिशा खातून, सफूरा जरगर, मीरां हैदर, शिफा उर रहमान, ताहिर हुसैन,खालिद सैफी, नताशा नरवाल ,उमर खालिद , डाक्टर कफील और शरजिल इमाम को जेल में देख के खुश होता है तब तो और जबकि उसे पता है कि असली अपराधी कौन है ?

ऐसे ज़ोंबी , दिल्ली दंगों के सुत्रधार कपिल मिश्रा , अनुराग ठाकुर , परवेश वर्मा , रागिनी तिवारी , रामभक्त गोपाल , कपिल गुर्जर को सरकार द्वारा सुरक्षा और संरक्षण देने से ही खुश हो जाते हैं।

इनको देश से भी मतलब नहीं जिसकी अर्थव्यस्था की बर्बादी की कहानी "मूडीज़" बयान कर रहा है और पिछले 21 वर्ष की सबसे बर्बाद अर्थव्यवस्था बता रहा है। इनको इससे खुशी है कि इस बर्बाद अर्थव्यवस्था में मुसलमान परेशान है कि नहीं।

भारतीय परंपरा , सभ्यता और संस्कृत बिन ब्याही माँ और बच्चे को कभी स्विकार नहीं करती रही है। उदाहरण के तौर पर आप अभिनेत्री नीना गुप्ता से पूछ लें और उनके दुखों को सुन लें जो ऐसी ही बिनब्याही माँ बनकर क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स की बेटी "मसाबा रिचर्ड्स" को जन्म दे चुकी हैं।

दरअसल बिन ब्याही औलाद पैदा करना एक अधूरे रिश्ते की कहानी है जिसमें होता सबकुछ वही है जो विवाह के पश्चात होता है पर केवल विवाह नहीं होता।

विवाह एक वैद्धता का प्रमाणपत्र है , विवाह के पश्चात जन्में बच्चों को आप "व्हाईट मनी" कह सकते हैं जो व्यवस्था की तमाम प्रक्रिया से गुज़रकर आपकी गोद में आते हैं। ऐसे ही बिनब्यही माँ के बच्चों को "ब्लैक मनी" कह सकते हैं।

दरअसल , बिनब्याही माँ का यह कान्सेप्ट मर्दों के लिए सुविधाजनक है , जो सबकुछ बिना किसी बंधन और ज़िम्मेदारी के पा लेते हैं , और जब चाहा बिन ब्याही माँ को छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। 

विवाह महिलाओं को सुरक्षा देता है जो बिनब्याहे बाप देने से बचते हैं और भुगतती औरते हैं क्युँकि फिर उनको कोई नहीं पूछता। मर्द चाहे जितना बूढा हो जाए , चाहे जितने बच्चे का बाप हो उसकी अगली पसंद कुँवारी वर्जिन टीनएजर ही होती है।

लिव इन रिलेशनशिप के बाद बिनब्याही माँ के इस प्रमोशन के लिए हार्दिक पांड्या और नताशा इस देश की संस्कृत के गुनहगार हैं जिनको भारतीय सभ्यता कभी क्षमा नहीं कर पाएगी। 

ह्रदय विदारक घटना

लोगो ने अनानास में पटाख़े मिला कर खिला दिया..
गर्भवती हथिनी के मुँह में फट गए पटाखे..

पानी मे खड़े तीन दिन तक मौत का इंतज़ार करती रही यह हथिनी.. 😢😢

जब जानवर कोई इंसान को मारे.. 
कहते है दुनिया मे वहसी उसे सारे.. 

इस जानवर की जान आज इंसानो ने ली है..
चुप क्यों है संसार.. 😢😢

इंसान की सोच कितनी गिर सकती है यह खबर जरूर पढ़ें.. 😢😢

केरल के मलप्पुरम से क्रूरता की ऐसी ख़बर आई है जिसपर एकबारगी यक़ीन नहीं होता है. गांव की तरफ़ खाना ढूंढने आई एक गर्भवती हथिनी को लोगों ने मार डाला. लेकिन जिस हैवानियत से मारा वो तरीका यक़ीन से परे है. गर्भवती हथिनी को लोकल लोगों ने अनानास खिलाया, लेकिन पटाखों से भरा हुआ अनानास. हथिनी के मुंह में ही ये बारूदी पटाखे फट गए. इसकी वजह से उसका मुंह बुरी तरह जल गया और इससे राहत पाने के लिए वो तालाब में मुंह डुबाकर खड़ी रही. वहीं तालाब में ही खड़े-खड़े हथिनी की मौत हो गई. मामला सामने तब आया जब एक फ़ॉरेस्ट ऑफिसर ने अपनी फ़ेसबुक वॉल पर इस अनहोनी घटना का ज़िक्र किया.

केरल के नीलंबुर फॉरेस्ट के ऑफिसर द्वारा फेसबुक यह सूचना दी गई . उन्होंने लिखा -

 'वन विभाग के अधिकारियों को यह हथिनी 25 मई को मिली थी जब यह भटक कर पास के खेत में पहुंच गई थी, शायद वो अपने गर्भस्थ शिशु के लिए कुछ खाना चाह रही थी.'
वो हथिनी गांव में खाने की तलाश में आई थी. लेकिन वो वहां रहने वालों की शैतानी से अनजान थी. शायद उसने सोचा होगा कि गर्भवती होने की वजह से लोग उसपर दया करेंगे. उसने सभी पर भरोसा किया. जब उसने लोगों का दिया हुआ अनानास खाया और वो उसके मुंह में ही विस्फोट कर गया तब उसे शायद ही यक़ीन हुआ हो कि कोई ऐसा भी सोच सकता है .. 

मुँह जलने के बाद भी उस गर्भवती हथिनी ने तोड़फोड़ नही की शांति से पानी मे खड़ी रही अपने घाव को भरने.. और वही खड़ी खड़ी अपने प्राण त्याग दिए।

उसका पोस्टमार्टम करने आये डॉ भी खुदको रोने से नही रोक पाया.. शैतान लोगो ने हथिनी के साथ उसके पेट मे पल रहे बच्चे को भी मार दिया ।

Sunday, May 31, 2020

नेहरूजी

9 साल से ज़्यादा अंग्रेजी जेलों में तप के निकला महात्मा गांधी का वह चेला पंडित जवाहरलाल जी नेहरू, जिसने आज़ादी के बाद देश की कमान संभाली❗
▪नेहरू : 
जिसे उसकी पत्नी के टीबी से मर रहे होने की खबर पर भी अंग्रेजों ने जेल से रिहा नहीं किया और यह सुन के तब विएना में मौजूद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्विट्ज़रलैंड में कमला नेहरू का इलाज करवाया....।
▪नेहरू : 
नेताजी बोस ने अपनी आज़ाद हिन्द फौज की चार ब्रिगेडों में एक जिसके नाम पर रखा, वह भी अरसे पहले कांग्रेस छोड़ चुके होने के बावजूद.....। 
▪नेहरू : 
जिसने अंग्रेजों से लुटे भारत में बांध बनवाये, सड़कें बनवाईं, फैक्ट्रियां बनवाईं और जल्द ही भारत को विश्व की बड़ी शक्तियों में से एक बनाया। ऐसी शक्ति जो फ़्रांस-वियतनाम युद्ध में संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से युद्ध विराम की निगरानी करती थी......! 
▪नेहरू : 
जिसने किसी बात पर अंग्रेजों के 200 साल तक देश लूटने का बहाना नहीं बनाया । जहाँ भी असफल हुआ ज़िम्मेदारी खुद पर ली...। 
▪नेहरू : 
जिसने पुर्तगालियों से गोवा और उसके भी पहले पाकिस्तान में शामिल हो गए जूनागढ़ को सैन्य कार्रवाई कर वापस जोड़ा और हैदराबाद भी बचाया....।
▪नेहरू : 
जिसने सरदार पटेल के पूरा कश्मीर पाकिस्तान को दे देने पर सहमति से इंकार किया और अंत समय तक आज़ादी/पाकिस्तान में शामिल होने के ख्वाब देख रहे महाराजा हरी सिंह के बावजूद कश्मीर बचाया....।
▪नेहरू : 
जो इन सब कुछ के बावजूद कभी महामानव नहीं बना । जिसने गलतियां कीं और मानीं । जिसने पंचशील के सिद्धांत के बाद चीन का धोखा भी देखा । जिसके भारत के नए मंदिरों, माने बांधों की वजह से करोड़ों आदिवासी विस्थापित हुए । जिसकी अति लोकतांत्रिकता ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसों को अपनी कैबिनेट में जगह दी, बावजूद इसके कि मुखर्जी भारत छोड़ो आंदोलन के वक़्त मुस्लिम लीग के साथ बंगाल में साझा सरकार चला रहे थे....। 
▪नेहरू : 
वे जिनके निधन पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि भारत माँ ने अपना सबसे प्यारा लाल खो दिया है, सूरज ढल चुका है, अब तीन मूर्ति मार्ग (तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास) में इस तरह का आदमी कभी नहीं आएगा । "आज भारत माता दुखी हैं, उन्होंने अपने सबसे कीमती सपूत खो दिया । मानवता आज दुखी है, उसने अपना सेवक खो दिया । शांति बेचैन है, उसने अपना संरक्षक खो दिया । आम आदमी ने अपनी आंखों की रौशनी खो दी है, पर्दा नीचे गिर गया है । मुख्य किरदार ने दुनिया के रंगमंच से अपनी आखिरी विदाई ले ली है" ! ! 
(गूगल करें वाजपेयी जी का पूरा शोक सन्देश पढ़ने के लिए, समझ आएगा कि आज के मसीहा दरअसल कितने झूठे हैं,  नीच भी)

Unlock - 1

पिछले सवा दो महीने से पूरा देश Locked डाउन है! शुरु शुरू में तो सबको मजा आ रहा था.... जैसा कि हम भारतीयों को आदत है! हमें भी लगा (या हमें ये लगाया गया?) कि बस कुछ ही दिनों की बात है! इधर बियर का मग खाली हुआ और उधर सब नार्मल हो जायेगा!

जबकि हमारे ही बगल में हमारा एक पडोसी देश पिछले चार महीनों से इस आफत से जूझ रहा था! लेकिन हम निश्चिन्त थे! ....कि देश सुरक्षित हाथों में है!

जब तक हमारे पास सामान वगैरह मौजूद थे तो हम रोज नया नया उत्पात मचा रहे थे! Innovations की तो भरमार लगी हुई थी! कोई गुलाबजामुन तल रहा था तो कोई पूडी! सबके दिन मजे में कट रहे थे!

इस दौरान सरकार को भी खूब मनोरंजन सूझ रहा था! रामायण चलवा दो! महाभारत चलवा दो! ताली बजवा दो! दीया जलवा दो! ये करवा दो! वो पकवा दो!

समय बीतता गया और धीरे धीरे सबके पकोड़े लगते गये! जब (राशन, सब्जी, मसाले, रूपये, दारू वगैरह का) स्टॉक खतम होने लगा तब हमारी आंख खुली! ...और सरकार की भी!

...कि ये बालाकोट से दूर होने वाली कोई ऐसी वैसी शार्ट टर्म प्रॉब्लम नहीं लग रही! इसके लिए "कुछ बड़ा" करना पड़ेगा!

...तो सरकार ने हमारे डॉक्टरों की साइज से दुगने साइज के PPE किट मंगा लिए! दवाओं का ठेका फेसबुकिया हकीमों को दे दिया गया!

राज्य से लेकर केंद्र तक सब जगह दबाव बढ़ रहा था!इनकी सारी तैयारियों की पोल खोली दिहाड़ी कारीगरों और मजदूरों ने! पहले उनके मालिकों ने उनका साथ छोड़ा! फिर पड़ोसियों ने! ...और सबसे आखिर में स्थानीय प्रशासन ने भी इनका साथ छोड़ दिया! जाओ मरो!

ऐसे में रामायण देखना भी महाभारत से कम नहीं था!

इक्का दुक्का समाजसेवी लोग सहायता के लिए सामने आये! लेकिन वह सहायता ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी! करोड़ों की आबादी और सहायता करने वाले मुठ्ठीभर! कैसे पार पाते?

इसी दरम्यान तब्लीगी वाला मामला सामने आ गया! सरकार थोड़ी खुश हुई कि चलो बला टली! लेकिन ये ख़ुशी भी ज्यादा देर नहीं टिकी!

गोमूत्र, शंख, ताली, थाली, सब हो गया! लेकिन मामला रुकने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है! मृतकों की संख्या में कोई कमी नहीं हो रही है! ये सब देखकर एक दिन सरकार बहादुर के बाहुबली सामने आये!

पहले तो उन्होंने शराब की दुकानें खुलवायीं! पी पाकर अर्थव्यवस्था थोड़ी सम्हली तो उन्होंने अगला पिछला सबकुछ जोड़ जाड़ कर एक पैकेज घोषित कर दिया! बाद में पता चला कि इसमें से आधा तो पहले ही खर्च हो चुका है!

घर में बैठे लोगों की समझ में न पैकेज आया और ना ही इनकी बातें! ....तो जो जहाँ था वहीं से पैदल चल पड़ा!

किधर? अपने गांवों की ओर!

देश के इतिहास में शायद पहली दफ़ा ऐसा हुआ होगा जब आम जनता शहरों की बजाय गाँवो का रुख कर रही थी! वो भी सम्पूर्ण लॉक डाउन में!

जैसे तैसे लोग घर पहुंचे! कुछ रास्ते में ही मर गए! कुछ को ट्रेन ने काट दिया! ...और कुछ को ट्रकों ने उड़ा दिया!

अब जाकर सरकार बहादुर के मंत्री (जो शुरू शुरू में रामायण का लुत्फ़ ले रहे थे) बाहर निकले हैं और टीवी चैनलों पर घूम घूम कर सरकार के एक साल की उपलब्धियां गिना रहे हैं!

वे उपलब्धियां....जो exist ही नहीं करती हैं!

....और हमारे माननीय!!  चिट्ठियां लिखते हुए अफ़सोस जता रहे हैं कि सामान्य स्थिति होती तो मैं आपके बीच होता!

अब मालिक को कौन बताये कि आपको इसीलिये भेजा गया है कि जब स्थिति असामान्य हो तो आप कुछ करें! लेकिन आप तो सामान्य स्थिति में भी जनता को प्याज और तेल के आंसू रुला रहे थे!

...और इस स्थिति को सामान्य करेगा कौन? आप ही न?

महामारी की वजह से जो लोग मारे गए वे ये सब देखने नहीं आने वाले! लेकिन जो लोग जिन्दा हैं वे न सिर्फ देख सकते हैं...बल्कि सुन भी सकते हैं...और महसूस भी कर सकते हैं!

...तो देखो और महसूस करो सरकार की उस नाकामी को, जिसने समय रहते भारतीय वायुसीमा को सील नहीं किया और देश में कोरोना जैसी महामारी पसरती चली गयी!

सुन सकते हो तो सुनो....उस मासूम बच्चे की चीत्कार को, जिसकी माँ रेलवे स्टेशन पर दम तोड़ चुकी है!

महसूस कर सकते हो तो उस तंत्र की असंवेदनशीलता को  महसूस करो जिसने तुम्हे बिहार की बजाय ओडिसा पहुंचा दिया है!

फिर भी आंख न खुल रही हो तो..."एक साल बेमिसाल" के उस जश्न में शामिल जो जाओ जहाँ भूखे प्यासे पैदल घर पहुंचे मजदूरों को ये एहसास दिलाया जा रहा है कि तुम पैदल नहीं बल्कि पुष्पक विमान द्वारा घर पहुंचे हो!

लेकिन ध्यान रहे....जिस जगह तुम जश्न मना रहे होगे वहां पांच हजार लाशें दफन हैं!

(Unlock - 1 के स्वागत का संकल्प लेते हुए अब दूब अक्षत छोड़ दीजिए)

कपिल देव कहिन

अंतर्जातीय विवाह

समाज की नियमावली पढ़ रहा था 

समाज को सबसे अधिक आपत्ति अंतरजातीय विवाह से होती है 

समाज किसी बलात्कारी हत्यारे डकैत दंगाई बेवड़े को बर्दाश्त कर सकता है 
लेकिन 
अंतरजातीय विवाह समाज को बर्दाश्त नहीं !!!
धन्य हो !

ये समाज के रखवाले हैं !!!
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प्रायः प्रायः सभी समाज में विवाह को लेकर गंभीर चिंताएँ हैं 

खासकर तब 

जब लड़की पढ़ी लिखी हो, अच्छी नौकरी करती हो 

उसके लिए योग्य लड़का समाज के भीतर खोजना जटिल कार्य होता है 

हमारे समाज के ग्रुप में आज चर्चा चल रही थी 

तो एक "बुद्धिजीवी" ने कहा कि आखिर क्यूँ एक उच्च ओहदे वाली लड़की एक कम पढ़े लिखे लड़के के साथ विवाह नहीं कर सकती 
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ये बात जितनी आसानी वो बोल गए 

यदि उनकी खुद की पुत्री के विवाह की बात होती तो उन्हें कैसी कठिनाई होती 
यह समझा जा सकता है 
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एक तो सामाजिक ढांचा ही ऐसा है 

जहां पुरुष को स्त्री से ऊपर माना जाता है 

एक लड़की "बेचारी" इतनी मेहनत से ऊंचाई पर पहुँचती है 

लेकिन 

उसे अपने से निचले स्तर के लड़के को खुद से श्रेष्ठ मानना पड़े 

भई आपने ही समाज का सिस्टम ऐसा बनाया है 

पुरुष तो घर के कार्य करेगा नहीं 

उस पर से 

यही समाज वाले ताना मार मार कर चिढ़ा चिढ़ा कर 

उस दंपति का जीना हराम करेंगे 
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और ये पूरी तरह से अव्यवहारिक है कि आप एक पढ़ी लिखी लड़की को अपने से कम पढ़े लिखे लड़के से विवाह के लिए बाध्य करें 

यह विवाह के नियमों के विपरीत है 

वैसे तो 

एक पढ़े लिखे लड़के को भी किसी कम योग्य लड़की से विवाह नहीं करना चाहिए 

लेकिन 

ये लोग धन के लालच में अथवा स्त्री की सुंदरता देखकर ऐसे विवाह कर लेते हैं 

अब पढ़ी-लिखी लड़की को ऐसा क्या कारण मिल रहा है जो वो एक कम पढ़े लिखे लड़के से विवाह कर ले
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लेकिन 

अंतरजातीय विवाह के नाम से सब डर घबरा जाते हैं 

धीरे धीरे जैसे-जैसे आर्थिक संपन्नता बढ़ रही है 

लोगों के मन से समाज का भय जा रहा है 

और ये लोग समाज से छिटकते जा रहे हैं 

इसका परिणाम यह होगा 

कि 

समाज को बचाने के जो मूर्खतापूर्ण प्रयास ये लोग कर रहे हैं 

कल को वो समाज ही नहीं बचेगा 
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बदलते सामाजिक परिवेश में 

समाजों को अब अंतरजातीय विवाह को स्वीकार करना ही एक मात्र उपाय है 

और यही सही भी होगा

Friday, May 29, 2020

#Menstrual_Hygiene_Day

______समय निकालकर एक बार पूरा पोस्ट अवश्य पढ़े #28मई_विश्व_मासिक_धर्म_दिवस
 #Menstrual_Hygiene_Day
_________ऐसे विषयों पर कभी कोई बात नहीं करना चाहता हैं क्यों सभी कतराते हैं लेकिन मैं पूछना चाहती हूँ कि जब परिवार के साथ बैठकर टीवी पर गर्भनिरोधक गोली, कंडोम, डियो, यहाँ तक की बनिया और अंडर वियर इत्यादि के एड मे महिलाओं को उपभोग की वस्तु बताकर दिखाते हैं तो क्या महिला का स्तर इतना नीचे हैं कि इस सबके उपयोग करने से आकर गले पड़ जाएगी औरत.. 
#वाहीयात वेबसीरीज सिनेमा फिल्मे एलबम फिल्में बन रही हैं उसके सीन तो पूछना ही नहीं सिनेमा के नाम पर अश्लीलता, दिखाते हैं उसे जब हम देख रहे हैं तो पीरियडस पर दो बाते कर ही सकते हैं ना? 

#जर्मनी देश ने मासिकधर्म स्वच्छता दिवस मनाने का अधिकार पूरी दुनिया को  दिया है तो अपने घर की माँ बहन बेटी भाभी चाची के बारे में भी एक बार सोचिए और अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का बोझ उठाए आप इतना तो कर ही सकते हैं कि पिरियड्स के 4-5 दिन जिस दर्द से गुजरती हैं महिला उसमें उसका हमदर्द बनिए कुछ काम खुद से भी कर लीजिए 2 ही 4 दिनों की तो बात हैं, , 

#दर्द कम तो नहीं होता लेकिन खुशी जरूर मिलती हैं ये जानकर की कोई तो हैं ख्याल रखने वाला जब आप उनके दर्द को बाटने की कोशिश करते हैं उन्हें उनकी जरूरी चीजों(वाईपस कॉटन, सेनेटरी नैपकिन, टिश्यू पेपर)की याद दिलाते हैं तो सच मानिए सही मायनों मे आप एक अच्छे हमदर्द बनते हैं

#माहवारी_क्या_हैं_ये_भी_जान_लेते_हैं
एक नजर 
#माहवारी_(पीरियड्स)चक्र
10 से 15 साल की आयु की लड़की के अंडाशय हर महीने एक विकसित डिम्ब (अण्डा) उत्पन्न करना शुरू कर देते हैं। वह अण्डा अण्डवाहिका नली (फैलोपियन ट्यूव) के द्वारा नीचे जाता है जो कि अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसका अस्तर रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि यदि अण्डा उर्वरित हो जाए, तो वह बढ़ सके और शिशु के जन्म के लिए उसके स्तर में विकसित हो सके। यदि उस डिम्ब का पुरूष के शुक्राणु से सम्मिलन न हो तो वह स्राव बन जाता है जो कि योनि से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को मासिक धर्म, पीरियड्स या रजोधर्म या माहवारी (Menstural Cycle or MC) कहते हैं।

#पीरियड्स_सम्बन्धी_समस्याए.

ज्यादातर महिलाएं माहवारी (पीरियड्स) की समस्याओं से परेशान रहती है लेकिन अज्ञानतावश या फिर शर्म या झिझक के कारण लगातार इस समस्या से जूझती रहती है।[2] दरअसल दस से पन्द्रह साल की लड़की के अण्डाशय हर महीने एक परिपक्व अण्डा या अण्डाणु पैदा करने लगता है। वह अण्डा डिम्बवाही थैली (फेलोपियन ट्यूब) में संचरण करता है जो कि अण्डाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है तो रक्त एवं तरल पदाथॅ से मिलकर उसका अस्तर गाढ़ा होने लगता है। यह तभी होता है जब कि अण्डा उपजाऊ हो, वह बढ़ता है, अस्तर के अन्दर विकसित होकर बच्चा बन जाता है। गाढ़ा अस्तर उतर जाता है और वह माहवारी का रूधिर स्राव बन जाता है, जो कि योनि द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। जिस दौरान रूधिर स्राव होता रहता है उसे माहवारी अवधि/पीरियड कहते हैं। औरत के प्रजनन अंगों में होने वाले बदलावों के आवर्तन चक्र को माहवारी चक्र कहते हैं। यह हॉरमोन तन्त्र के नियन्त्रण में रहता है एवं प्रजनन के लिए जरूरी है। माहवारी चक्र की गिनती रूधिर स्राव के पहले दिन से की जाती है क्योंकि रजोधर्म प्रारम्भ का हॉरमोन चक्र से घनिष्ट तालमेल रहता है। माहवारी का रूधिर स्राव हर महीने में एक बार 28 से 32 दिनों के अन्तराल पर होता है। परन्तु महिलाओं को यह याद करना चाहिए कि माहवारी चक्र के किसी भी समय गर्भ होने की सम्भावना है।

#पीड़ा_दायक_पीरियड्सक्या_होती_है?

पीड़ा दायक पीरियड्स में निचले उदर में ऐंठनभरी पीड़ा होती है। किसी औरत को तेज दर्द हो सकता है जो आता और जाता है या मन्द चुभने वाला दर्द हो सकता है। इन से पीठ में दर्द हो सकता है। दर्द कई दिन पहले भी शुरू हो सकता है और माहवारी के एकदम पहले भी हो सकता है। माहवारी का रक्त स्राव कम होते ही सामान्यतः यह खत्म हो जाता है।

#पीड़ादायक_पीरियड्स_का_आप_घर_पर_क्या_उपचारकर_सकते_हैं?

निम्नलिखित उपचार हो सकता है कि आपको पर्चे पर लिखी दवाओं से बचा सकें। (1) अपने उदर के निचले भाग (नाभि से नीचे) गर्म सेक करें। ध्यान रखें कि सेंकने वाले पैड को रखे-रखे सो मत जाएं। (2) गर्म जल से स्नान करें। (3) गर्म पेय ही पियें। (4) निचले उदर के आसपास अपनी अंगुलियों के पोरों से गोल गोल हल्की मालिश करें। (5) सैर करें या नियमित रूप से व्यायाम करें और उसमें श्रोणी को घुमाने वाले व्यायाम भी करें। (6) साबुत अनाज, फल और सब्जियों जैसे मिश्रित कार्बोहाइड्रेटस से भरपूर आहार लें पर उसमें नमक, चीनी, मदिरा एवं कैफीन की मात्रा कम हो। (7) हल्के परन्तु थोड़े-थोड़े अन्तराल पर भोजन करें। (8) ध्यान अथवा योग जैसी विश्राम परक तकनीकों का प्रयोग करें। (9) नीचे लेटने पर अपनी टांगे ऊंची करके रखें या घुटनों को मोड़कर किसी एक ओर सोयें।

#पीड़ादायक_पीरियड्स_के_लिए_डाक्टर_से_कबपरामर्श_लेना_चाहिए?

यदि स्व-उपचार से लगातार तीन महीने में दर्द ठीक न हो या रक्त के बड़े-बड़े थक्के निकलते हों तो डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए। यदि माहवारी होने के पांच से अधिक दिन पहले से दर्द होने लगे और माहवारी के बाद भी होती रहे तब भी डाक्टर के पास जाना जाहिए।

#पीरियड्स_से_पहले_की_स्थिति_के_क्या_लक्षण_हैं?

माहवारी होने से पहले (पीएमएस) के लक्षणों का नाता माहवारी चक्र से ही होता है। सामान्यतः ये लक्षण माहवारी शुरू होने के 5 से 11 दिन पहले शुरू हो जाते हैं। माहवारी शुरू हो जाने पर सामान्यतः लक्षण बन्द हो जाते हैं या फिर कुछ समय बाद बन्द हो जाते हैं। इन लक्षणों में सिर दर्द, पैरों में सूजन, पीठ दर्द, पेट में मरोड़, आदि होते हैं..
#धन्यवाद_सभी_क़ा.🙏 

✍प्रियंका गौतम

Thursday, May 28, 2020

व्यंग्य

*व्यंग्य*

*हंसना बिल्कुल भी मना है, वरना बहुत बड़ा पाप सर पर चढ़ेगा!*

*एक बार की बात है, एक बच्चा स्कूल से पढ़ कर कॉलेज में गया, वहां उसने सब के पास बाइक देखी तो उसका भी मन मचल गया, अपने पिताजी को बोला कि बाइक दिलवाओ। पिताजी अपने जमाने के मशहूर गोलीबाज थे, उन्होंने उसको कई दिन तक टरकाया, लेकिन अंततः बालहठ के आगे मजबूर होकर, उन्होंने एक दिन जब वो बच्चा डिनर नहीं कर रहा था, तब उसको बहलाने के लिए शाम को 8 बज कर 20 मिनट पर उसके लिए एक 20 लाख रुपये के पैकेज की घोषणा की, जिस पैकेज से वो बच्चा जो मन आए वो कर सकता था।*

*बच्चा खुश! तुरंत बालहठ खत्म, उसने भोजन किया और खूब तारीफ की पिताजी की! मसलन आप वर्ल्ड के बेस्ट पापा है वगैरह वगैरह।*

*अब बात आई 20 लाख रुपये की, तो गोलीबाज बाप ने कहा कि बेटा इस पैकेज की घोषणा कल तुम्हारी माताश्री, जो इस घर की वित्तमंत्री भी है, वो करेंगी।*

*बच्चा बहुत खुश हुआ रात भर खुशी के मारे पिताजी के चरण दबाता रहा और व्हाट्सएप्प फ़ेसबुक पर सब दोस्तो को बताया, कल उसको 20 लाख का पैकेज मिलने जा रहा है।*

*दूसरे दिन शाम को 4 बजे चाय के टाइम उस बच्चे की माताजी ने पैकेज की घोषणा की! करते टाइम बोली बेटा मैं तेरी मां हूँ, इसलिए मेरा पैकेज तेरे पापा से भी ज्यादा बड़ा होगा, बच्चा बहुत गदगद हुआ।*

*अब पैकेज समझिए? क्या क्या दिया गया :*

1. *उन्होंने कहा कि बेटा तेरे जन्म लेते समय हॉस्पिटल का बिल आया था, 40 हजार का, नोट कर इसको,*

2. *फिर बोली तेरे को जन्म देने से पहले हम दोनों अर्थात मम्मी पापा की शादी तो करनी पड़ती न, तो हमारी शादी में कुल खर्चा हुआ था, 2 लाख!नोट कर इसको,*

3. *फिर बोली तेरे जन्म से अब तक तेरी पढ़ाई में खर्चा हुआ 5 लाख! नोट कर इसको,*

4. *फिर बोली तेरे खाने-पीने, रहने, कपड़े, मेडिकल, गिफ्ट, खिलौने, वगैरह में अब तक ख़र्चा हुआ है 7 लाख! नोट कर इसको,*

*बच्चा कुछ समझ नहीं पा रहा था, झुंझला भी रहा था, अब तक वो 14 लाख 40 हजार का जोड़ लगा चुका था।*

5. *फिर बोली तेरे ग्रेजुएशन और आगे की पढ़ाई में करीब 10 लाख का खर्चा और होगा, उसके लिए हम किसी बैंक से लोन ले लेंगे।*

*अब जोड़ कितना हुआ? बच्चा बोला 24 लाख 40 हजार रुपए।*

*तो ये तेरा पैकेज, जो तेरे पापा ने दिया था न, उससे भी ज्यादा दे दिया है मैंने! अब 24 लाख 40 हजार में से बाइक का इंतजाम तुझे कैसे करना है, कोनसी बाइक, किस रंग, डिज़ाइन, कंपनी की लेनी है? तू खुद, अपनी पसंद से ले लेना।*

*बच्चा कई बार टोटल जोड़ बाकी सब लगा चुका है, गिनती बराबर 24 लाख चालीस हजार की बैठ रही है, वो खुश भी है कि मम्मी का पैकेज पापा से भी 20% ज्यादा है लेकिन बाइक कहाँ से आए, यह सवाल अभी भी अनुत्तरित ही है?*

*उधर बच्चे के दोस्त उसका मजाक उड़ा रहे है कि तेरे को बेवकूफ बना दिया गया है, पैकेज के नाम पर लाखों का हिसाब समझने की बजाय यदि तुझे 5-7 हजार भी नकद दे दिए होते तो कोई न कोई सेकंड हैंड बाइक ले आता इतने में! बेशक नई न आती लेकिन काम तो चल जाता।*

Wednesday, May 27, 2020

भारतीय मीडिया

मीडिया यह तो छापता है कि फलाने कोरंटाइन सेंटर में कौन लोग मटन मांग रहे थे, कौन बिरयानी मांग रहे थे, लेकिन उसी उत्साह और सनसनी के साथ यह नहीं छापता कि कोरंटाइन में अखबार पर खाना परोसा गया और दाल बह गई, क्योंकि इसमें उन्माद नहीं है. मीडिया उन्माद बेचता है.
मीडिया यह नहीं पूछता कि अखबार पर परोसा गया खाना खतम होने से पहले अखबार तो गल गया होगा, क्या इस व्यक्ति के खाने में मिट्टी नहीं आई होगी? क्या अखबार में दाल चावल खाने को देना, जानवरों को जमीन पर चारा डाल देने जैसा नहीं है?
लेकिन हमारे दिमाग में डाला जा रहा है कि सवाल पूछना देशद्रोही काम है. हमें सिखाया जा रहा है कि जिनसे सवाल करना चाहिए, उनकी पूजा करते रहना ही हमारा धर्म है. इसलिए हम एक दूसरे से भी कहने लगे हैं कि सवाल क्यों करते हो?
इसलिए हम यह नहीं पूछ पाते कि जिस सरकार ने कुंभ मेले के समय सबसे बड़े बसों के काफिले का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था, जिस राज्य के पास बसों का सबसे बड़ा परिवहन बेड़ा है, उस राज्य में दो महीने तक कामगार भूखे प्यासे पैदल क्यों चलते रहे?
भारत का समाज मूलत: परसंतापी समाज है. हम लोग अगर यह सुन लें कि कोई सुखी है तो हमें दुख होता है, षडयंत्र सूझता है. दूसरे के दुख से हम सुखी होते हैं. नोटबंदी में हम सिर्फ इसलिए सुखी थे कि अमीरों का दिमाग सही हो गया. उस सच्चाई से हमने आंख मूंद ली कि पौने चार करोड़ लोग बेरोजगार हो गए.
हम परसंतापी हैं, लेकिन असल अत्याचारी को भगवान मान लेते हैं. इसलिए यह सवाल नहीं करते कि जब देश की आर्थिकी डूब गई तो तीन चार लोगों की संपत्ति दोगुनी कैसे हो गई? हम सब लूट और भ्रष्टाचार को आदर्श मानते हैं. कॉरपोरेट और राजनीति की लूट को मौन समर्थन देते हैं.
मीडिया भी इसी परसंतापी समाज का हिस्सा है. वह भी परसंतापी लोगों से भरा है. इसलिए मीडिया का चरित्र गरीब विरोधी और धनपशुओं का समर्थक है.
पिछले दो महीने में गरीब जनता पर जिस तरह का ऐतिहासिक अत्याचार हुआ है, मीडिया की भी उसमें सहभागिता है. भागते हुए लोगों की खबर छाप देना एक बात है, लेकिन सरकार को उसकी करतूतों के लिए असहज कर देना दूसरी बात है. मीडिया ने यह काम छोड़ दिया है, क्योंकि उसकी लगाम सरकार और कॉरपोरेट के हाथ में है.
यह भी कम हैरानी की बात नहीं है कि जनता हर उस कारनामे से खुश है, जो उसके विरोध में रचा जा रहा है.

भारतीय मीडिया

एक बादशाह ने रफूगर रखा हुआ था, जिसका काम कपड़ा रफू करना नहीं, बातें रफू करना था.!!

एक दिन बादशाह दरबार लगाकर शिकार की कहानी सुना रहे थे, जोश में आकर बोले - एकबार तो ऐसा हुआ मैंने आधे किलोमीटर से निशाना लगाकर जो एक हिरन को तीर मारा तो तीर सनसनाता हुआ हिरन की बाईं आंख में लगकर दाएं कान से होता हुआ पिछले पैर के दाएं खुर में जा लगा. 

जनता  ने कोई दाद नहीं दी, वो इस बात पर यकीन करने को तैयार ही नहीं थे. 

इधर बादशाह भी समझ गया ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी छोड़ दी.. और अपने रफूगर की तरफ देखने लगा, 

रफूगर उठा और कहने लगा.. हज़रात मैं इस वाक़ये का चश्मदीद गवाह हूँ, दरसल बादशाह सलामत एक पहाड़ी के ऊपर खड़े थे हिरन काफी नीचे था, हवा भी मुआफ़िक चल रही थी वरना तीर आधा किलोमीटर कहाँ जाता है... जहां तक बात है 'आंख' , 'कान' और 'खुर' की, तो अर्ज़ करदूँ जिस वक्त तीर लगा था उस वक़्त हिरन दाएं खुर से दायाँ कान खुजला रहा था, इतना सुनते ही जनता जनार्दन ने दाद के लिए तालियां बजाना शुरू कर दीं

अगले दिन रफूगर बोरिया बिस्तरा उठाकर जाने लगा... बादशाह ने परेशान होकर पूछा कहाँ चले?

रफूगर बोला बादशाह सलामत मैं छोटी मोटी तुरपाई कर लेता हूँ, शामियाना सिलवाना हो तो *भारतीय मीडिया* को रख लीजिए !!
😂😂🤣🤣😜

चाचा नेहरू

पं. जवाहर लाल नेहरू : पुण्य तिथि- 27  मई ....

मित्रों आज 27 मई है, आज ही के दिन 1964 में पं. नेहरू  का देहावसान हुआ था। पं. नेहरू ने आजादी के बाद एक  ऐसे देश का सपना देखा था जो भय और भूख से रहित होगा । इसी सपने को पूरा करने के लिये  वे ताजिंदगी विना रूके गरीबी, अशिक्छा , बेरोजगारी  से लड़ते लड़ते एक दिन वे निर्वाण को प्राप्त हो गये । इसी के साथ हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गयी । दलितों, मजलूमों का सहारा सदैव के लिये छूट गया । गांधी के देश  में वे शांति  और अहिंसा के पुजारी थे, किंतु स्वाधीनता  और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के भी  हिमायती थे। व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक होने के साथ साथ आर्थिक असमानता  दूर करने  के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने देशहित में समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता  भी नहीं किया। उदारता व दृढ़ता उनके जन्मजात गुण थे, यह दुर्भाग्य है कि पाकिस्तान और चीन के संदर्भ में उनके इसी गुणों को दुर्बलता  समझा गया , जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा। बात इतनी सी है कि  दबाब में आकर  वे बात चीत करने के खिलाफ रहते थे। 
 जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदा ग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं।  उन्होंने  बहुत पहले कहा था कि इस देश में फासिज्म आ सकता है और उसके वाहक मिडिल क्लास के लोग होंगे,  वे दूरद्रष्टा थे ।
आज लोकतंत्र का मंदिर देश की संसदअपराधियों,गुंडो, मवालियों , नचनियां ,गवनियां, आतंकियों की पनाहगाह बनकर रह गयी हैं ,  हर दल के नेता के नाम पर जाति धर्म के गिरोहों के सरगना महिमामंडित हो रहे हैं।
सूर्य तो कब का अस्त हो गया ,हम तारों की रोशनी में अपना रास्ता ढूढने के लिये बाध्य कर दिये गये हैं । यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल हों। 

संसद मे उनका अभाव कभी नही भरेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद ही अब  भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। 

गांधी, नेहरू, अंबेडकर रोज रोज पैदा नही होते , पंडित नेहरू को समझना हो तो उनकी लिखि किताब ...
"भारत एक खोज"  पंडित जवाहर लाल नेहरू ।..जरूर पढ़े । 

( आजकल एक फैशन बन गया है पं नेहरू को गाली देने का और सत्ता मे बैठे लोग जो अपनी सरस्वती विहिन, प्रतिभाहीन लगनशीलता के बल के द्वारा या किसी दैविक आसुरी शक्ति से या लोगों की मूर्खता के कारण आज दिल्ली की कुर्सी पर बैठ गये हैं , वे इसको प्रोत्साहन दे रहे हैं जबकि नेहरू के आगे इनकी हैसियत क्या है वही जानते हैं। पूरी दूनियाॅ घूम कर देख लिये कि मुंजे , परमानंद , सावरकर , हेडगवार और गोलवरकर को कोई नही जानता। और इनके नये भगवान मालवीय,  जो कांग्रेसी थे, उनको को भी कोई नहीं जानता है. वे नेहरू के ईर्ष्या मे  दीनदयाल और सावरकर  को भूलकर मालवीय को भारत रत्न दिये हैं । क्या ये नेहरू की बराबरी कर सकते है। नेहरू का अधिकतर समय जेल मे ही बीता और जेल मे रहते हुये उन्होनें बहुत कुछ लिखा । "भारत की खोज" उसी मे से एक है। आप भी अगर नेहरू को जानना चाहते हैं थो एक बार जरूर पढे बिना किसी को पढे , समझे , 

दूसरों की बात सुनकर राय बनाना मूर्खता की पहली सीढी होती है उस पर झूठ का किला ही बनता है ) ।
पं. नेहरू कहते हैं...

" मेरी बहुप्रशंसित शैली आखिर है क्या ? एक खास तरह की सरलता और छोटे वाक्यों की प्रांजलता । कुछ तो स्पष्ट चिंतन के कारण और इस कारण कि मेरे पास कहने को कुछ है। लेकिन कुछ इस वजह से भी कि उसमे एक प्रकार की लय है और शब्दों की ध्वनियों का प्रेम भी ।मुझे असंतुलित वाक्य से चिढ है । यह लय क्यों ? यह कोई बाहरी चीज नहीं , जिसे कि सुनने के लिये कान हो और संतुलन के लिये आॅखें ।आखिरकार इसका रिश्ता दिमागी लय से है या शायद उससे भी गहरी किसी चीज से ।" 
12 जून 1941 को अपनी बेटी इंदिरा को लिखे पत्र मे जवाहर लाल नेहरू कहते हैं इस लय के कारण ही उन्हें जिंदगी की रस्साकशी मे भी शांत रहने मे मदद मिलती है । चीख -पुकार , गाली गलौज मूर्खतापूर्ण मालूम होने लगती है । हमारे चारों तरफ के फूहड़पन का हम पर असर भी कम हो जाता है। 

पं नेहरू ने कहा कि " इस लय की खोज करने के लिये सोचना बहुत आवश्यक है। यूरोप ने फासिज्म के अनुभव से सीखा कि जन - संहार के लिये सामाजिक स्वीकृति या औचित्य का कारण है समाज मे ठहर कर सोचने की ईच्छा या क्षमता का अभाव । नेहरू ने कहा कि वे किसी नैतिकता के पक्ष मे धर्मयुद्ध का रवैया अपनाने के हक मे नहीं। इसलिये वे किसी निश्चयात्मक या निष्कर्षात्मक ढंग से नारेबाजी के भाषा के खिलाफ हैं। मुझे नारे नापसंद हैं वे व्यक्ति को सोचने से रोकते हैं । अधिकतर नारे भ्रम उत्पन्न करते हैं ।"
पं नेहरू के जीवन और उनकी राजनीति को देखें तो वह इस लय की एक अंतहीन तलाश या यात्रा जान पड़ती है।
ताज्जुब नहीं कि वे लेखकों के प्रिय थे। अज्ञेय ने ऊनके अभिनंदन ग्रंथ का संपादन किया था। जन राजनीति करते हुए परिष्कार के प्रति इस आग्रह ने उनके साथ अभिजात्य को एक आरोप की तरह कुछ वैसे ही नत्थी कर दिया गया जैसे मोदी चाय बेचते थे । कहा गया पं नेहरू का कपड़ा पेरिस मे धुलता है।ये सही है पं नेहरू अपने घर से रूपया चुराकर नही भागे थे। पं नेहरू ने गांधी के आग्रह पर अपने घर पर आनंद भवन इलाहाबाद मे पूरे परिवार सहित विदेशी वस्त्र की होली जलायी और पूरे जीवन हाथ से काते गये सूत का कपड़ा पहने। आजाद भारत मे 5 करोड़ का सूट नहीं नीलाम किये। देश के आजादी के लिये लाठी खायी और जेल गये। 
" नेहरू के लिये जनतंत्र का मतलब , प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपनी लय की खोज करने की आजादी उपलब्ध कराने मे ही चरितार्थ हो सकता है। सिर्फ हिंदू और गाय गोबर , गणेश सर्जरी उनकी सोच और लक्ष्य नही था। आंतरिक लय , परिष्कार और भीतरी इत्मीनान की खोज मे नेहरू लेकिन हमेशा साधारण जन, उनमें भी किसान के साथ अधिक सहज महसूस करते थे। किसान या खेतिहर मे वे जमीन से रिश्ते के कारण एक ठहराव व जीवट पाते थे जो शहरी जीवन मे प्राय: नही था । नेहरू के लिये यह ठहराव एक पहेली था । अक्सर भारत और चीन की सभ्यताओं की चर्चा करते हुए वे उनकी इस क्षमता का जिक्र करते थे कि इसमें इंसानी रिश्तों में एक ठहराव दिखाई देता है ।तो क्या ठहराव प्रगति का विरोधी है ?
भारत की खोज मे वे स्वभावगत स्थिरता पर मानवीय संबन्धों के प्रसंग मे बिचार करते हैं और कहते हैं कि राजनीति और अर्थशास्त्र के कोलाहल मे प्राय: मानवीय संबन्धों का प्रश्न दब ही जाता है जबकि वह कितना बुनियादी मसला है! राजनीति नेहरू के लिये इनसानी रिश्तों मे खो गये इस ठहराव को वापस हासिल करने के लिहाज से ही सार्थक हो सकती थी । प्राय: वे व्यक्ति शब्द का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उतना ही अधिक
रिश्ते शब्द का भी ।व्यक्ति बिना रिश्तों के बेमानी है। उसी तरह उनका दूसरा प्रिय शब्द प्रगति और परिवर्तन है ।लेकिन वैसा ही लगाव उन्हें निरंतरता शब्द से भी है।वैसै ही एकांत और सार्वजनिकता उनके लिये विरोधी युग्म नहीं थे। सार्वजनिक दिनचर्या के बीच अपने लिये एकांत की खोज नेहरू के लिये दूसरों से कटना या पलायन नहीं।
राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी उन्हें वास्तविक समस्या संबन्धों की ही लगती रही, मानवीय संबन्ध, राष्ट्रों के संबन्ध , आदमी - आदमी के संबन्ध, पुरूष - स्त्री का संबन्ध या बच्चों के प्रति वयस्कों का रूख इन सबको साथ देखें तो एक राष्ट्र के अंतर्गत लोगों के बीच के रिश्ते किस किस्म के होंगे ? अधिकतम परस्पर सहयोग किस तरह किया जा सकेगा और आखिरकार , राष्ट्रों के बीच संबन्ध कैसे होने चाहिये? बुद्धिमान लोग इन प्रश्नों के बारे मे सोचते हैं उन पर विचार- विमर्श करते हैंऔर समाधान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नेहरू के अधैर्य का, जो उनकी तरह ही प्रसिद्ध है, कारण यह था कि अक्सर वे लोगों के सोचने और विचार- विमर्श करने के कठिन कार्य से परहेज करते देखते थे । आसान रास्ते के लोभ में चिंतन सतही और जल्दबाज हो जाता है और भाषा भी उथली हो जाती है। आखिरकार नेहरू क्यों स्पष्टता के साथ देख पाये कि अगर भारत को पराधीनता से मुक्ति हासिल करनी है तो इसलिये कि अधीनता का संबन्ध मानवीय गरिमा के अनुकूल नहीं है । इस अधीनता से मुक्ति हासिल करके एक नयी अधीरता पर आधारित समाज कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?

धर्मनिरपेक्षता को, इस प्रकार अधीनता के हर प्रकार से मुक्त नये मानवीय संबन्ध की भाषा व मुहावरे की खोज का नतीजा माना जा सकता है । यह एक साझा खोज थी जिसमें गांधी और नेहरू का योगदान बराबर का था ।गांधी ने जब कहा कि ऊनके मरने के बाद नेहरू उनकी भाषा बोलेंगे तो संभवत: इसी भाषा की सोच रहे थे । धर्म की भाषा का अभ्यास मानव- समाज ने एक लम्बे समय तक किया था और वह सुकून देता था लेकिन नेहरू को शक था कि यह सुकून आलस का है । मनुष्य का स्वभाव अपनी सुरक्षा के अतिक्रमण का है अगर बीसवीं सदी के मनुष्य ने विरासत मे मिली इस धर्मकी भाषा में कोई प्रयोग नही किया और नया कुछ नहीं सृजित किया तो उसका धरती पर आना व्यर्थ रहा। धर्मनिरपेक्षता इस प्रकार मात्र राज्य का संचालक सिद्धांत न था जिस रूप मे उसके ब्याख्या व आलोचना होती रही है ।धार्मिक रूख नेहरू के लिए अधिक महत्वपूर्ण था । मुमकिन है कि यह रूख या रवैया संगठित या सांस्थानिक धर्म मे न रह गया हो । जैसे आज आर एस एस ने अपने को हिंदू धर्म का संस्थान मानता है परिणाम आप देख रहे हैं बहुमत की सांप्रदायिकता का हाल है कि आप क्या खायेंगे, आप क्या बोलेंगे , आप क्या पहनेंगे , ये संस्थान तय करेंगे। यहां तक कि आप क्या पढ़ेंगे , क्या नहीं पढ़ेंगे सरकार तय करेगी ।
" भारत की खोज " में आइंस्टीन को दुनियाॅ का सबसे बड़ा वैज्ञानिक बताते हुए वे उन्हें इस प्रकार ऊद्ध्रित करते हैं , हमारे इस भौतिकवादी युग मे वैज्ञानिक ही सबसे गहराई मे धार्मिक लोग हैं। इसके साथ नेहरू की अपनी टिप्पणी है , कि विवेकानन्द आधुनिक विज्ञान को वास्तविक धार्मिक भावना की अभिब्यक्ति मानते थे क्योंकि यह सत्य को समझने का एक ईमानदार प्रयास था।
ईमानदारी को परिभाषित करना आसान नही ।इसे नितांत मनोगत भाव भी कहा जा सकता है।यह भी दिलचस्प है कि मार्क्सवादी मुक्तिबोध के लिये सबसे बड़ी चुनौती ईमानदारी हासिल करने की थी । उनके दो प्रिय शब्द थे , सत्य और ईमानदारी । धर्म निरपेक्षता इस रूप मे धर्म का नकार नहीं बल्कि धार्मिक भावना का आधुनिकता मे पूनर्वास है।
क्या नेहरू धर्म की जगह विज्ञान को स्वीकार करने का प्रस्ताव दे रहे थे?
आइंस्टीन और विवेकानंद के बारे मे उनके कमेंट्स से यह बात ठीक नहीं लगती । धर्म उन्हें आकर्षित नही करता था लेकिन उन्हें यह भी पता था कि जीवन सिर्फ वह नही है जिसे हम देख , सुन और छू सकते हैं। यह दृश्य विश्व है जो दिक् और काल मे निरंतर परिवर्तनशील है। इसका संबन्ध भिन्न प्रकार के अदृश्य विश्व से है जो शायद अधिक स्थिर है या उतने ही परिवर्तनशील तत्वों से बना है । कोई भी विचारशील व्यक्ति इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता ।नेहरू के लिये सबसे महत्वपूर्ण मानवीय जीवन था । वह काफी जटिल है और अबतक के मानवीय ज्ञान लिहाज से अत्यंत अतार्किक भी और इसलिये किसी एक विचारधारा के लोहपाश मे उसे बाॅधा नही जा सकता ।
धर्मनिरपेक्षता नेहरू को दुनियावी मसलों मे साथ रहने का एक रास्ता प्रदान करती थी । गांधी के साथ नेहरू का सामंजस्य आधिकतर विचारकों के लिये पहेली रहा है । गांधीवादियों के लिए सबसे अधिक । वे इसे गांधी का नेहरू के पार्टी मोह का परिणाम मानते थे। लेकिन वह यह नही देख पाये कि गांधी और नेहरू की तलाश एक ही थी " साथ रहने को नयी भाषा का आविष्कार " । गांधी की प्रार्थना किसी के धर्म विशेष की भाषा मे समझी नहीं जा सकती । वह कोई धार्मिक क्रियोल भी नही है।

गांधी ने जब नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया , तो क्या उनके दिमाग मे यह बात थी कि धर्मनिरपेक्षता मे ,उनके बाकी सहयोगियों से कहीं ज्यादा विश्वास नेहरू का था। पटेल हों या राजेन्द्र प्रसाद या कोई और , इस बिषय किसी ने इतना नहीं सोचा था जितना नेहरू ने। अगर गांधी और नेहरू का या नेहरू का दूसरे नेताओं से संवाद पढा जाये तो यह साफ हो जाता है कि गांधी के अलावा नेहरू ही इस प्रश्न पर सबसे गहराई से विचार कर रहे थे कि भारत मे हिंदू- मुसलमान और अन्य धर्मावलंबी किस आधार पर एक नयी सामूहिकता की भाषा बिकसित कर सकेंगे।
पं नेहरू ने धर्मनिरपेक्ष राज्य को परिभाषित करते हुए लिखा , कि कुछ लोगों का खयाल है कि यह धर्म का बिरोधी है । स्पष्टत: यह सही नही है। इसका मतलब एक ऐसा राज्य जो हर धर्म को समान आदर देता है और उन्हें बराबरी के मौके भी मुहैया करता है। हाॅ , राज्य के तौर पर यह खुद को किसी एक धर्म या मत से नहीं संबद्ध करता, जो तब राजकीय धर्म बन जाता है । 
इसी राज धर्म को अटल ने मोदी को पालन करने के लिये कहा था । लेकिन अडवानी ने नही पालन करने दिया। परिणाम सामने है। शाह जहाॅ की याद ताजा हो गयी। 
नेहरू के सामने साफ है कि भले ही भारत मे धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा रही हो, धर्मनिरपेक्षता उसका दूसरा नाम नहीं है ।एक तो , यह एक आधुनिक परिकल्पना है , दूसरे यह एक नयी प्रकार की राष्ट्रीयता का आधार है ।इसका अर्थ यह हुआ की यह परंपरा प्रदत्त नही है । इसी कारण भले ही संविधान ने इसे सिद्धांत रूप मे स्वीकार कर लिया हो, समाज को इसका अभ्यास करना बाकी है।
नेहरू इस क्रम मे बिनोवा भावे को उदाहरण देते हैं कि उनके हिसाब से राजनीति और धर्म पुराने पड़ चुके हैं ।उनके मुताबिक विश्व को अब संकीर्ण अर्थ मे धर्म या तुच्छ राजनीति की जगह विज्ञान और आधुनिकता की जरूरत है । नेहरू मानते हैं कि दोनों ही विविध स्तरों पर लोगों को एक दूसरे के करीब लाने और उनकी दृष्टि को व्यापक करने का काम करते है ।
नेहरू के लिये किसी भी बिचार की जाॅच की कसौटी यह है कि वह संकीर्णता की ओर ले जाता है या हमारी समझ और संवेदना का दायरा बढाता है । धर्मनिरपेक्षता इस दृष्टि से , जिस रूप मे गांधी और नेहरू ने उसे विकसित किया , मनुष्य और समाज की आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा किये बगैर सांसारिक स्तर पर सहजीवन के सिद्धांत के रूप मे ऊपयुक्त है । यह मनुष्य को सामूहिकता के भाव से बंचित किये बिना उसे उसकी अपेक्षित स्वायत्तता भी प्रदान करती है। धर्मनिरपेक्षता के साथ भारतीय जनतंत्र का प्रश्न जुड़ा हुआ था। नेहरू जैसे पहले को सामाजिक अभ्यास के बिना असंभव मानते थे , जिसका मतलब यही था कि वह राजकीय उपायों से अपना मकसद नही पा सकती, 
ठीक उसी तरह वे जनतंत्र को भी सामाजिक स्वभाव से अभिन्न करने के लिये गहन और दीर्घ अभ्यास पर बल देते हैं।
धर्मनिरपेक्षता की तरह ही जनतंत्र के बारे में उनका खयाल है कि वह मात्र राजनीतिक या आर्थिक अवधारणा नहीं है, वह कुछ है जो मन- मस्तिष्क से जूड़ा है । वह आर्थिक समानता और अवसरों की बराबरी तो है ही, लेकिन उससे कहीं अधिक एक ऐसे मनुष्य की कल्पना है जो विचारशील है, जो सोचने का श्रम करता है ।एक समाज जो सोचने का काम किसी महापुरूष को सुपुर्द कर दे और खुद उससे लाभ उठाना चाहे , जनतांत्रिक नहीं हो सकता । 
अपने शासन के 10 साल के बाद आर के करंजिया को दिये इंटरव्यू मे नेहरू ने खुद को " स्टेट्समैन " कहे जाने पर ऐतराज किया । उनके मुताबिक उनके जमाने में यह विशेषण सिर्फ गांधी के लिये ऊपयुक्त था । खुद को उन्होंने गांधी- युग की संतान मात्र कहा। पूछे जाने पर कि इनकी उपलब्धि क्या है तो नेहरू ने कहा कि बंटवारे के भयंकर खून - खराबे के बाद मुसलमानों और हिंदुओं के बीच एक सौहार्दपूर्ण रिश्ता बहाल कर पाने की तसल्ली उन्हें है। नेहरू एक अत्यंत विनम्र व्यक्ति थे जिन्हें इसका बोध था कि वे इतिहास के प्रवाह में एक कण मात्र हैं।
ऐतिहासिकता की इस तीव्र संवेदना के कारण हमेशा के लिए सामाजिक जीवन का कोई प्रारूप प्रस्तावित करने मे उन्हें संकोच था ।लेकिन जिस क्षण की वे पैदाइश थे , ऊसके प्रति अपने उत्तरदायित्व का अहसास भी उन्हें था और ऊससे भागना वे कायरता मानते थे ।सांप्रदायिकता , युद्धोन्माद या राष्ट्रवाद से अगर उन्हें विरक्ति थी तो इसलिए कि ये सोचने की संकीर्ण और अपरिष्कृत कोटियाॅ थी। ये हमारे दायरे को संकरा करते हैं । असल बात है अपनी क्षुद्रताओं से उठ पाने की ताकत। अपनी श्रेष्ठता के अभिमान की जगह समानता का रिश्ता बनाने का यत्न ।
आजकल कुछ बेवकूफ़ लोगों के द्वारा कहा जा रहा है कि नेहरू युग का अंत हो गया है,  तो क्या हम मान ले कि नेहरू ने जो लक्ष्य भारत के सामने रखा था , वह अप्रासंगिक हो गया है ? यह सम्भव ही नहीं है..... 

जय राम जी की

कोविंद एक व्यंग

भारत में कोरोना पर  रिसर्च से जानकारी में आये निम्नलिखित तथ्य:-

1- कार में अधिकतम 3 लोग सफर कर सकते हैं, चौथा व्यक्ति, covid को आकर्षित करता है।

2- दुपहिया वाहन पर पीछे बैठा हुआ व्यक्ति covid को आकर्षित करता है।

3- बस में केवल 30 लोग covid से सुरक्षित हैं, 31वां व्यक्ति covid को आकर्षित करता है।

4- शाम 7 से सुबह 7 तक covid अपने शिकार पर निकलता है।

5- अगर आप दुकान से शराब लेते हैं तो covid को कोई आपत्ति नही, अगर आप दुकान या बार मे ही शराब पीते हैं तो covid आकर्षित होता है।

6- अगर आप duty pass या अन्य किसी जरूरी काम के लिए pass या बिना pass के भी निकलते हैं, तो covid आपसे कुछ नही कहेगा, लेकिन बिना पास के निकलने वाले covid को आकर्षित करते हैं।

7- अगर आप कोई भी वस्तु, किसी दुकान से खरीदते हैं तो covid से बचे रहेंगे, लेकिन शॉपिंग कॉम्प्लेक्स या मॉल से खरीदेंगे तो covid को आकर्षित करेंगे।

8- अगर आप मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारा में जाते हैं तो आप covid को आकर्षित करते हैं, लेकिन किसी कार्यालय या फैक्टरी में जाते हैं तो covid आपको कुछ नही कहेगा।

9- covid आपको जकड़ लेगा अगर आप किसी होटल में बैठ कर खाएंगे, लेकिन अगर आप खाना पैक कराने के लिए होटल में बैठे रहते हैं तो covid को कोई आपत्ति नही होती है।

10- अमीरों या नेताओं के विवाह समारोह में 250 या 500 लोग भी हों तो covid उनको कुछ नही कहेगा, लेकिन आम आदमी के घर किसी भी समारोह में 50 के बाद, इक्यावनवें मेहमान को covid बिल्कुल बर्दाश्त नही करेगा।

अतः आप सबको सूचित किया जाता है कि covid पर हुई इस नवीनतम रिसर्च से सावधान रहें, सुरक्षित रहें।
धन्यवाद🙏🏻

Tiddi Dal

#टिड्डा सारी हरियाली चट कर जाएगा...

बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत पड़ती है, ये बात भगत सिंह ने कही थी।
चूंकि, 
       पर्यावरण संकट की शुरुआती चेतावनियां नजरअंदाज कर दी गईं, इसलिए शायद कुदरत ने भी अपनी आवाज ऊंची कर ली है। 

कोरोना महामारी, अम्फान तूफान के बाद अब टिड्डी दलों का हमला भी लोगों की मुसीबत बढ़ाने के लिए तैयार बैठा है। 
अम्फान तूफान ने ओडीशा और बंगाल में लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। लाखों पेड़ टूट कर गिर पड़े हैं और बहुत सारे लोगों की जान चली गई है। लाखों लोगों से पहले ही उनके घर खाली करा लिए गए थे। चक्रवाती तूफान अम्फान के दौरान 190 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार वाली हवाएं चलने की बात कही जा रही है। तूफान से हुए पूरे नुकसान का आकलन करने में अभी कुछ समय लगेगा। लेकिन, इस बीच भारत में एक और मुसीबत तैयार खड़ी हो रही है। 

भारत के कई हिस्सों में टिट्डी दलों की मौजूदगी देखी जा रही है।पिछले दिनों आई कुछ मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि पाकिस्तान की तरफ से टिड्डियों का एक दल उड़कर राजस्थान के पार गया है। चूंकि इस समय राजस्थान के बड़े हिस्से में खेत खाली पड़े हैं। इसलिए उन्हें बैठने और खाने के लिए खास कुछ नहीं मिला। इसलिए वे उड़कर आगे निकल गए। राजस्थान के बूंदी, सीकर, प्रतापगढ़ और चित्तौड़गढ़ आदि जिलों में टिड्डी दलों के दिखने की सूचना हैं। लगभग छब्बीस सालों बाद पिछले साल राजस्थान में लोगों ने टिड्डी दलों का हमला देखा था। पिछले साल मई में शुरू हुआ यह हमला इस वर्ष फरवरी तक चला था। इस दौरान राजस्थान के बारह जिलों में 6 लाख 70 हजार हेक्टेयर के लगभग फसल तबाह हो गई। टिड्डी दलों के हमले से कुल मिलाकर एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। राजस्थान के बाद अब खबर मध्यप्रदेश से आई है। मध्यप्रदेश के 15 जिलों में टिड्डी दलों के हमले की बात कही जा रही है। इसमें मंदसौर, नीमच, आगर-मालवा व अन्य जिले शामिल हैं। टिड्डी दलों से मुकाबले के लिए यहां पर अग्निशमन वाहनों में कीटनाशक दवाएं भरकर छिड़काव किया जा रहा है। 

#टिड्डी दलों के बारे में हमें कुछ बेसिक बातों को जान लेन  चाहिए। टिड्डी एक छोटा सा कीड़ा होता है। जिसे कहीं-कहीं टिड्डा भी कहा जाता है,जब कीट लाखों-करोड़ों की संख्या में होता है तो यह किसी विशालकाय भूखे दैत्य जैसा साबित होता है। जो सबकुछ को कुछ ही घंटों में तहस-नहस कर देता है। एक टिड्डी दल में अस्सी लाख से ज्यादा कीट हो सकते हैं। हवा के साथ वे एक दिन में 150 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी उड़कर पूरी कर सकते हैं। जब वे उड़ते हैं तो कीटों के किसी बादल जैसे लगते हैं। अगर आपको याद हो कि पिछले साल टिड्डी दलों के बादल में फंसे एक विमान की आपात लैंडिंग केन्या में करानी पड़ी थी। इसके हमले को देखते हुए पाकिस्तान में एमरजेंसी तक घोषित करनी पड़ी थी। 

आपको शायद यकीन नहीं होगा कि यह कीट कितनी तेजी से बढ़ता है। इसके एक झुंड में अस्सी लाख तक कीट हो सकते हैं। जो कि एक दिन में ही ढाई हजार लोगों के बराबर या दस हाथियों के बराबर खाना खा सकता है। अपने पहले प्रजनन काल में यह कीट बीस गुना बढ़ता है, दूसरे प्रजनन काल में 400 गुना और तीसरे प्रजनन काल में 16 हजार गुना बढ़ जाता है।

पूरी दुनिया में पर्यावरण संकट अलग-अलग रूपों में प्रगट हो रहा है। कोरोना वायरस उसी पर्यावरण संकट का एक हिस्सा है। तो अम्फान तूफान उसका दूसरा हिस्सा है। आस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग पर्यावरण संकट का एक और रूप है। इसी तरह से टिड्डी दलों का हमला भी पर्यावरण संकट का एक अलग रूप है। जलवायु संकट के चलते मौसम चक्र मे बदलाव हुआ है। इसके चलते अरब सागर में असमय चक्रवाती तूफान आए हैं। इनके चलते अफ्रीका और अरब में असमय बारिश हुई। जिससे इन टिड्डी दलों को पनपने का भरपूर मौका मिला। अब ये कीट अरब सागर के तीनों किनारों यानी भारत, पाकिस्तान, अरब और अफ्रीका के देशों पर अपना कहर बरपा रहे हैं। 

लोकस्ट वार्निंग आर्गनाइजेशन (एलडब्लूओ) का अनुमान है कि मई के बचे हुए हिस्से और जून के महीने में यह टिड्डी दल कई जगहों पर अपना कहर बरपाएगा। वो जहां भी फसल और हरियाली देखेगा उसे चट कर जाएगा। 

उससे बचने का एक ही तरीका है कि हम पृथ्वी की चेतावनियों को ध्यान से सुनें। जानें कि वो क्या कह रही है। पर जिन पर इसका जिम्मा है, क्या वो इसके लिए तैयार हैं?

(टिड्डी दलों के हमले का चित्र इंटरनेट से लिया गया है)

जंगल कथा ✍️

Tuesday, May 26, 2020

mazdoron ka dard

#रेल_का_खेल !

★ भारतीय रेल तो पहले ऐसी नहीं थी ! 🤔

कोई तो है ही, जो इस भयानक साजिश को अंजाम दे रहा है...? 🕵️

◆कोई है, जो नहीं चाहता कि मजदूर वापस जाए। 
कोई है जो अपने घर वापस जाने वाले मजदूरों में हर प्रकार का खौफ भर देना चाहता है। 
यात्रा का खौफ !
 
◆कोई है, जो साजिश कर रहा है कि यात्रा के बदहाल व्यवस्था की खौफ से बाकी बचे मजदूर वापस घर की ओर ना जाये।

◆ये कोई जो भी है ? 
एक व्यक्ति नहीं, पूरी गिरोह है जो सरकार के इस साज़िश को विचार दे रहा है।

वरना भारतीय रेल कभी इतनी नाकारा या अक्षम नहीं थी कि ट्रेन 9 दिन बाद गंतव्य तक पहूंचे। 🤔

◆सामाजिक सत्य है कि आपदा में कोई खुद का आशियाना छोड़ना नहीं चाहता। 
जो जहाँ रहता है वहीं रहकर महफूज रहना चाहता है। 

◆असुरक्षा की मजबूरी ही आपदा के समय लोगो को इधर-उधर भागकर सुरक्षित स्थान पर चले जाने को विवश करता है और सुरक्षित स्थान का मंजिल होता है उसका खुद का घर।

◆इसलिए मजदूर अपने कार्यस्थल से वापस घर की तरफ जा रहे हैं।

◆क्योंकि यही एक निम्न वर्ग है जिसे कोई संसाधन उपलब्ध नहीं है इस भीषण आपदा में अपने कार्यस्थल पर कुछ महीने बिना काम किये और बिन पैसे प्राप्त किये जीवन यापन करने का।

◆किसी ने इनकी सुध नहीं ली, उल्टे इनके जेहन में खौफ बिठाया गया। 
#मौत का खौफ !☠️
#कोरोना से मौत, भूख से मौत !💀👺☠️

इसलिए ट्रैन साज़िशन भटकाई जा रही है। 
*देर की जा रही है।*
कैंसिल की जा रही है, ताकि मजदूर वापस ना जाये। 
*गहरी साजिश खम्बानियो की.....!*

◆प्रशासनिक लापरवाही या प्रशासनिक साज़िश...?

जो भी हो रहा #शर्मनाक है !

#वक्त.....'वक्त' आने पर बहुत बड़ा हिसाब लेगी, जिसका जवाब हमसब को देना होगा।

◆सरकार अभी भी संभल जाए... ! मैं बार-बार सरकार को इसलिए कह रहा हूँ कि आपके बस में सबकुछ है लेकिन आप बिना #राजनीतिकरण के कुछ करना नहीं चाहते।

दोस्तों ये वही सरकार है जिनकी संवेदना मर चुकी है।
कारण- ये अपनी सरकार की वर्षगांठ मनाने या यूं कहें कि जश्न मनाने की तैयारी कर रही है।

इनको देश की कोई चिंता नहीं।
लिंक कमेंट बॉक्स में डाल दूँगा देख लीजिएगा आपलोग।

दुःखद ! बहुत ही दुःखद !!!.....🖋️

BJP नेता होने के फ़ायदे

*अगर आपको आम आदमी हैं तो आप पर सब नियम लागू होंगे और यदि आप बीजेपी नेता हैं तब  होंगे क्या?  बेहतर जानकारी के लिए पढ़िए क्विंट हिंदी न्यूज़ की ये रिपोर्ट*

*बीजेपी नेता सदानंद गौड़ा बोले- ‘क्वॉरंटीन नियम मेरे लिए नहीं’*

सदानंद गौड़ा ने नहीं किया क्वॉरंटीन नियमों का पालन, मंत्री होने का दिया हवाला 

*एक तरफ जहां सरकार लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग और क्वॉरंटीन में रहने की सलाह दे रही है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं पर इन नियमों को तोड़ने के आरोप लग रहे हैं. दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी का क्रिकेट खेलने वाला विवाद थमा भी नहीं था कि केंद्रीय मंत्री सदानंद गौड़ा ने कुछ ऐसा कर दिया, जिसकी अब खूब चर्चा हो रही है. दिल्ली से फ्लाइट लेकर बेंगलुरु पहुंचे गौड़ा ने क्वॉरंटीन होने को लेकर पूछे गए सवाल पर कहा कि हम पर ये नियम लागू नहीं होते हैं.*

सदानंद गौड़ा को ठीक उसी तरह क्वॉरंटीन नियमों का पालन करने को लेकर सवाल किया गया था, जैसा कि देशभर में अन्य लोग कर रहे हैं. इसके लिए केंद्र की तरफ से बकायदा गाइडलाइंस भी जारी हुई हैं. लेकिन मंत्री जी ने कहा कि ये नियम उन पर लागू होता ही नहीं है. इसके बाद मंत्री जी बैठक में भी शामिल हुए.

*कर्नाटक सरकार की गाइडलाइंस का क्या?*

अब सवाल ये उठाए जा रहे हैं कि जब कर्नाटक सरकार ने अपनी गाइडलाइन में साफ कहा है कि दिल्ली से आने वाले लोगों को 7 दिन का क्वॉरंटीन पीरियड पूरा करना जरूरी है तो ऐसे में मंत्री जी को क्वॉरंटीन क्यों नहीं होना पड़ा? कर्नाटक सरकार ने हाल ही में अपनी गाइडलाइन जारी की हैं, जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि,
महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली से आने वाले लोगों के लिए एक हफ्ते का इंस्टीट्यूशनल (स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल आदि) क्वॉरंटीन जरूरी है. इस गाइडलाइन में गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और 10 साल से कम उम्र के बच्चों को घर पर ही क्वॉरंटीन होने की छूट दी गई है.

*सामने आकर दी सफाई*

केंद्रीय मंत्री सदानंद गौड़ा का एयरपोर्ट का  वीडियो काफी वायरल हुआ. लोगों ने इसे लेकर उन पर जमकर हमला बोला. मामला बढ़ने के बाद मंत्री मीडिया के सामने आए और बताया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया. उन्होंने इसके लिए कुछ अजीब उदाहरण भी दिए. जिसमें उन्होंने कहा कि अगर डॉक्टर को क्वॉरंटीन कर देंगे तो इलाज कौन करेगा. गौड़ा ने अपनी सफाई में कहा,

*"कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें क्वॉरंटीन नियमों में छूट दी गई है. जब उनके पास कोई जिम्मेदारी वाला पद होता है. अगर किसी डॉक्टर या नर्स को हॉस्पिटल में नहीं आने दिया जाए तो क्या हम कोरोना से लड़ सकते हैं? अगर सप्लाई ठीक से नहीं होगी तो काम कैसा चलेगा. मैं फार्मेटिकल मिनिस्ट्री का मंत्री हूं. मैं चार्टड फ्लाइट से भी बेंगलुरु आ सकता था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया."*

केंद्रीय मंत्री ने एक और तर्क दिया कि उनके फोन में जो आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड है, उसमें उनका स्टेटस ग्रीन दिख रहा है यानी वो पूरी तरह से सेफ हैं.

*मनोज तिवारी पहुंचे सोनीपत*

इससे पहले बीजेपी के सांसद और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को लेकर काफी विवाद खड़ा हो गया था. तिवारी दिल्ली से क्रिकेट मैच खेलने के लिए हरियाणा के सोनीपत जा पहुंचे. जहां उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन नहीं किया. तिवारी कई लोगों के करीब बैठे दिखे और उन्होंने फेस मास्क भी नहीं पहना हुआ था. जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी जमकर आलोचना हुई.

Monday, May 25, 2020

राम राज्य

बड़े बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले....

*कहाँ तो हमारे चक्रवती सम्राट ने सोचा था, कि नेपाल के हिंदू राष्ट्र घोषित होते हि जगत गुरु योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज के सानिध्य में पूरे ब्रह्मांड को हिंदू राष्ट्र बनाने और जम्बूद्वीप का भगवा झंडा पहराने के लिये अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर विजयी रथ छोड़ा जायेगा...*

*हमारे जलील-ए-ईलाही ने तो इस महायज्ञ के लिये जम्बूद्वीप का सम्राट बनते ही 40 टन चंदन कि लकड़ियां पहले हि नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में पहुँचा दी थी और साथ में 10,000 करोड़ रुपए की खैरात भी दे आये, ताकि ब्रम्हांड का पहला हिंदू शासक जब नेपाल की धरती पर कदम रखे तो उसके स्वागत में कोई कमी ना रहे*

*साथ ही नेपाल वालों को ये भरोसा दिलवाने में भी कोई कसर नहीँ छोड़ी कि हिंदू राष्ट्र घोषित होते हि यहां रामराज्य आ जायेगा..*

*लेकिन करोड़ो रूपए का मुफ्त चंदन घिसने और दस हजार करोड़ रूपए डकारने के बाद नेपाल वालो ने सबसे पहले तो नेपाल में भारतीय न्यूज चैनलो के प्रसारण पर रोक लगायी, फिर भारतीय मुद्रा को बैन किया, और फिर लाल झंडे वालों की सरकार बनवा दी*

चलो यहां तक तो ठीक था, लेकिन अब तो सीधे जम्बूद्वीप के कई इलाको पर अधिकार जता दिया, और तो और कोरोना वायरस का जिम्मेदार भी अब जम्बूद्वीप को बता रहा है ।

ये कमबख्त नेपाली चाहते हि नहीं कि वो रामराज्य में रहे, शायद रामराज्य की कुख्यात शोहरत रामराज्य से पहले ही नेपाल पहुँच गयी ।

और उनको पता लग गया कि -
*रामराज्य वो होगा जहाँ, महिलाओ को डायन बता कर मारा जाऐगा तो दलितों को मंदिर प्रवेश से रोकने के लिए मारा जायेगा*

*सती प्रथा, बाल विवाह, मृत्यु भोज, भ्रूण हत्या और जातिवाद गर्व कि बात होगी, जहाँ इंसान की जिंदगी की कीमत पशुओ से बदतर होगी*

*इक्कीसवी सदी में भी अपने घर तक पहुँचने के लिए करोड़ो लोगो को हजारो किलोमीटर का सफ़र नंगे पैर, भूखे, प्यासे रहकर पैदल ही तय करना होगा*

*हजारो लाखों लोग भूख प्यास से घर पहुँचने से पहले ही सडको पर दम तोड़ चुके होंगे. सैंकड़ो किलोमीटर पैदल चलने के बाद गर्भवती स्त्रियाँ सड़क पर बच्चे पैदा करेंगी और दो घंटे बाद फिर से पैदल ही दुख और दर्द की अंतहीन यात्रा पर निकल लेंगी*

*रामराज्य वो होगा जहाँ बलात्कार करने, धोका देने वाले, दलितों आदिवासियों कि गर्दन काटने वाले को देवता बनाया जायेगा*

*बाकी ऐसी बात भी नहीं है की नेपाल की इस हरकत से हमारे सवा 56 इंची वाले को गुस्सा नहीं आया ? गुस्सा आया है और वो नेपाल को गरियाना भी चाहते है, लेकिन छप्पनिया को पता है की नेपाल की तरफ आँख भी उठायी तो उसका नया दोस्त शी जिनपिंग अहमदाबाद में झूला नहीं झूलने नहीं आयेगा, बल्कि हमारे छप्पनिया साहब को हि घोड़ी बनाकर जीन कस देगा*

*तो भगतों अब एक ही रास्ता बचा है.... बजाओ ताली .. वही 6 नंबर वाली ... और, ताली पीटते हुए जोर से बोलो... नेपाल ! हाय ! हाय ! हाय !*

Sunday, May 24, 2020

Admission

कल मुंबई के एक मित्र, जो मेरे छोटे भाई समान हैं, उन्होंने फोन किया व पूछा - 'भैया, बेटा MBA करना चाहता है, पुणे के एक कॉलेज से एडमिशन ऑफर आया है, क्या करना चाहिए,  मार्गदर्शन करिए, ज्ञान दीजिए' 😊 

मैंने कहा कि मार्गदर्शन चाहिए या ज्ञान ? 

वो हँसते हुए बोले कि मार्गदर्शन देने वाले उस मार्ग का दर्शन करा सकते जो हमारे लिए बना ही न हो, परंतु गुरु कभी गलत ज्ञान नही दे सकता, इसलिए भैया जी, आप ज्ञान ही दीजिए, जिससे जीवन में सुख व शांति बनी रहे, जो इस कोरोना काल मे बहुत जरूरी है 😊

ऐसा है, तो हे मेरे भाई, ज्ञान की बात सुनो 🙂

कोरोना काल लंबा है, कम से कम एक बरस चलेगा, दवा या टीका खोज लेने का बाद भी एक बरस चलेगा. 

कोरोना काल मे भले ही इंडस्ट्री, बिजनेस, दूकान खुल जाएं, पर काम कम होगा, प्रोडक्शन कम होगा, सेल्स कम होगा, बिजनेस कम होगा, इस कारण लोगों को नई नौकरियाँ नही मिलेंगी, उलटे लोगों की नौकरियां जाएंगी. 

कोरोना के कारण स्कूल कॉलेज नही खुलेंगे, खुलेंगे तो भी नही चलेंगे, माता पिता अभिभावक को अपने बच्चे की जान जादा जरूरी है, पढ़ाई लिखाई वो डिस्टेंस से कर लेगा या ऑनलाइन कर लेगा या अगले बरस कर लेगा. 

मूल बात यही है कि 'जान जादा जरूरी है'. इसके लिए बड़ा कॉलेज, ब्रान्डेड कॉलेज, नामी कॉलेज आदि देखने की जरूरत नही है, जो कॉलेज घर से 5 km के अंदर है, जहाँ से बच्चा अप्रत्याशित लॉक डाउन के समय पैदल आ सकता है, वही अच्छा है. 

वो स्कूल या कॉलेज अच्छा है, जो गाँव या छोटे शहर में हो, जहाँ जनसंख्या घनत्व कम हो, जो कोरोना से सेफ हो, जो आपके बच्चे के जीवन की सुरक्षा की गारेंटी ले सके, वहां एडमिशन कराएं, वहाँ पढ़ने भेजें. अगर ऐसी जगह या ऐसा कॉलेज न मिले तो सरकारी डिस्टेंस एजुकेशन या सरकारी  ऑनलाइन व्यवस्था में पढ़ाएं. 

सरकारी इसलिए कि वही स्थाई रहेगा. प्राइवेट स्कूल या कॉलेज के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नही हैं, उन्होंने पिछले तीन महीने से अपने अध्यापकों को सैलरी नही दी है, उनके पास डिस्टेंस या ऑनलाइन स्टडी के लिए जरूरी लैब नही है, हाई बैंडविथ वाला इंटरनेट नही है, ऑनलाइन text books, वीडियो क्लिप्स नही हैं, ऑनलाइन पढ़ाने वाले टीचर नही हैं, मतलब डिस्टेंस व ऑनलाइन के लिए उनके पास जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर नही हैं, इसलिए वो बहुत भरोसे के नही हैं, उनका सिस्टम कभी भी क्रैश हो सकता है. 

जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तो सरकारी स्कूल कॉलेज के पास भी नही हैं, पर सरकार के पास पैसा है, इसलिए उसके पास इंफ्रास्ट्रक्चर develop करने की ताकत है, डेवेलप कर सकती है, और वो आज नही तो कल. सरकार का सिस्टम लगातार कई वर्षों तक loss में चलने के बाद भी क्रैश नही होता, क्योंकि सरकार के पास पैसा व पॉलिसी होती है. और आखिरी बात हर एक को समझना चाहिए कि सरकार का दिया हुआ रिजल्ट, सर्टिफिकेट, डिप्लोमा या डिग्री ही सब जगह valid होता है, मान्य होता है. 

अगर आस पास सरकारी विद्यालय या कॉलेज नही है तो अर्ध सरकारी या ट्रस्ट या संस्था या सामुदायिक स्कूल कॉलेज में पढ़ें. ध्यान रखें कि स्कूल या कॉलेज सरकार से मान्य हो. 

पैरेंट्स फीस पर भी ध्यान रखें. कोरोना काल मे एजुकेशन लोन या कोई दूसरा लोन कत्तई न लें. आपके पास जितना पैसा हो, उसका दो तिहाई परिवार के जीवन यापन के लिए रख लें, बचे हुए एक तिहाई में सभी बच्चों की पढ़ाई करवाएं. अगर आप के पास 1 करोड़ जमा हैं तो 33 लाख तक खर्च कर दें, अगर 1 लाख जमा है तो 33 हजार तक ही खर्च करें, अगर  1 हजार ही जमा है तो 300 ₹ ही खर्च करें. ऐसा क्यों ? यह बात मैं कभी बाद में बताऊँगा, आज इसे आप केवल ज्ञान की तरह ग्रहण करें. 

यदि अभी भी मन में संशय है तो केवल तीन सूत्र पर चलें. 

पहला - बच्चे का सुरक्षित जीवन सबसे जादा जरूरी है 

दूसरा - सरकारी संस्थाएं दीर्घकालिक होती हैं, उनका प्रमाणपत्र, रिजल्ट, सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री हर जगह valid होता है, सर्वमान्य होता है. अगर सरकारी संस्था न मिले तो सरकार मान्य संस्था देखें.

तीसरा - उधारी या लोन न लें, आप के पास जितना है उसी में करें, पहले परिवार के जीवन यापन की व्यवस्था करें, उसके बाद दूसरा काम करें। 

Saturday, May 23, 2020

ऐसे थे श्री राजीव गांधी

अटल बिहारी वाजपेयी विदेश यात्रा पर जा रहे थे । एक युवक ने उन्हें नमस्ते की उन्होंने गौर नहीं किया फिर बाद में किसी ने अटल जी को बताया कि युवक इन्दिरा गाँधी का पुत्र राजीव गाँधी था जो उस हवाई जहाज पर पायलट था❗ 
▪समय बदला और इन्दिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बने, अटल जी विपक्ष में थे और किडनी की ऐसी बीमारी से ग्रसित थे, जिसका इलाज केवल अमरीका में ही हो सकता था और पैसे की तंगी की वजह से अटल जी अपना इलाज नहीं करवा पा रहे थे । 
▪यह बात किसी तरह राजीव गाँधी को पता चल गई, एक दिन उन्होंने अटल जी को ऑफिस बुलाया और कहा कि आपको उस दल में शामिल किया जा रहा है अटल जी जो संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रहा है, अटल जी बोले लेकिन मैं तो विपक्ष में हूँ, राजीव गाँधी ने कहा मैं जानता हूँ और इसीलिये आपको भेज रहा हूँ कि अमरीका से अपना पूरा इलाज करवा कर आयें । 
▪सन 1991 में राजीव गाँधी की हत्या हो गई और जब अटल जी प्रधानमन्त्री बने तो एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने साक्षात्कार में जब अटल जी से राजीव गाँधी के व्यक्तित्व के विषय में पूछा तब अटल जी ने कहा कि “आज मैं राजीव गाँधी की बदौलत ही ज़िन्दा हूँ” और ये सारा वाक़या बताया और बताया कि राजीव गाँधी ने इस बात का ज़िक्र किसी से भी करने के लिये मना किया था । लेकिन आज वो दुनिया में नहीं हैं इसलिये ये बात बता रहा हूँ और अटल जी बताया कि अमरीका से इलाज करवा कर लौटने ने बाद अटल जी ने एक पत्र लिखकर राजीव गाँधी का धन्यवाद किया....!!

BJP IT cell

          पिछले एक महीने से आईटी सेल को सांप सूंघा हुआ है! सोशियल मीडिया पर गुर्राने वाले अपनी पिंजरे में लेटे हैं, करवट बदल रहे हैं, लेकिन किसी करवट उन्हें चैन नहीं मिल रहा है। परेशान हैं, दिल बैचेन हो रहा है कि सारे किये धरे पर पानी फिर गया है।  ये गुर्राने वाले वैसे भी पूंजीपतियों के पाले हैं, इसलिए मजदूरों पर इन्हें और भी ज्यादा गुस्सा आ रहा है कि ये मुएँ सड़कों पर क्यों निकल आये!  हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया! न ये निकलते न इनके पांव में छाले पड़ते न ये भूख से तड़पते न ये निढाल होकर मर रहे होते न इन्हें चिलचिलाती धूप और आग उगलती सड़क बेहोश करती और न रहमतुललील आलमनीन यानी पूरी दुनिया के लिए राहत(सल्लाहुअलेही व सल्लम) के मानने वाले रोज़े की हालत में खुद भूखे प्यासे रहकर इन बेबस मजदूरों को खाना खिलाने, पानी पिलाने, दवा और वाहन का इंतज़ाम करवाने निकलते और न इन लाखों मजदूरों को पता चलता कि जिन्हें हम जाहिल-जालिम, आतंकवादी-कट्टर, अनपढ़ और क्रूर समझते थे,वो तो इंसानियत के पैरोकार निकले, वो जान लेने  नहीं जान बचाने आए, वे हाथ में पत्थर नहीं खाने की थाली,नाश्ते ही प्याली, एनर्जी ड्रिंक की बोतल, दवाई के रैपर लाए। मजदूरों को अब पता चला कि न्यू रूम से उन्हें जो शिक्षा दी जाती है,वो कितनी झूठी है, कितनी अन्यायपूर्ण है। मजदूर समझ रहे हैं कि मीडिया सेल कितनी धोखेबाज है, उनका भरोसा अब मीडिया सेल की पोस्ट और ब्रेकिंग न्यूज़ से उठ गया है, इसीलिए करवटें बदली जा रही हैं, बेचैनी है, कुड़न है, फिक्र है कि ये "भरोसा" दोबारा कैसे कायम किया जाए, वो करवट बदलते हुए सोच रहे हैं कि कहीं से राहत का दिखावा करते कुछ फ़ोटो की मिल जाएं तो शुरू हो जाएं कि देखों हम भी तुम्हारे साथ थे, लेकिन मिल नहीं रहे हैं मिलेंगे भी तो मुँह की खाना पड़ेगी क्योंकि मजदूरों ने आंखों से देखा है कौन मदद कर रहा था और कौन दिखावा!  तोड़ने वाले को ये भी मालूम है कि ये मुल्क जोड़ने वालों को जल्दी पहचान लेता है और तोड़ने वालों को दुड़की लगाने पर मजबूर कर देता है, जैसा कि नफरत के सौदागर अंग्रेजों के साथ हुआ था, वैसा ही इन नफ़रत के सौदागरों के साथ भी होगा और ये मजदूर करेंगे, क्योंकि देश बदलने का काम मजदूर-गरीब-पिछड़े तबके के लोग   ही करते रहे हैं, इसकी शुरुआत देश के  बायपास और हाईवे पर  वे लोग कर चुके हैं जिन्हें देशद्रोही सिद्ध करने की नाकाम कोशिश होती रहती है, वहां मजदूरों को आईटी सेल का कोई सदस्य नहीं मिला, किसी नफरती ने उनसे नहीं पूछा कि खाना खाओगे? दिखावे के लिए कुछ तंबू जरूर गड़े थे लेकिन वे बस इतने ही थे कि खानापूर्ति भी नहीं हो पा रही थी, दिल चाहिए "अपनों" पर खर्च करने के लिए लेकिन तंबू वालों के लिए सड़क पर चलता मजदूर "अपना" कहां था, वो तो "इस्तेमाल" की चीज़ था, जिसे वे कई-कई बार इस्तेमाल कर चुके हैं!  अगर न्यूज़ रूम वालों का ज़मीर जरा सा भी है, तो वे बताएं कि कौन वहां इंसानियत की सेवा कर रहा था और कितनी कर रहा था, कहीं नजर नहीं आ रहे थे, तथाकथित राष्ट्रभक्त, वहां थे तो असली देशप्रेमी जो अल्लाह के भक्त हैं और देश से मुहब्बत करने वाले, तभी तो वे देश के लोगों का दर्द बांटने, उन्हें सहारा देने सड़क पर उतर आए थे,अंधभक्त तो एसी में आराम फ़रमा रहे थे! ये मददगार वहीं हैं, जिन्हें सच्चर कमेटी की रिपोर्ट    एससी-एसटी वर्ग के लोगों से भी गरीब बताती है, अब बारी मजदूरों की है, जो अपना श्रम बेचते हैं, ज़मीर नहीं। यक़ीनन ज़मीर बेचने वाले हारेंगे और हिंदुस्तान जीतेगा!                           

Friday, May 22, 2020

WHO की साज़िश

डोनल्ड ट्रंप की बात सही होती दिख रही है।

विश्व स्वास्थ संगठन और चीन मिलकर खेल गये। और भारत विश्व स्वास्थ संगठन के इशारे पर फँसता चला गया और अपनी अर्थ व्यवस्था बर्बाद करता चला गया। मुझे लगने लगा है कि मात्र 2 से 2•5% मृत्यु दर वाला संक्रमण दुनिया का सबसे कम खतरनाक संक्रमण है जिसका शोर अधिक मचाकर चीन को टक्कर देती अर्थव्यवस्थाओं को बर्बाद कर दिया गया।

भारत भी उसी चंगुल में फंस गया और अब उसे भी इसके बेहद कम खतरनाक होने का एहसास होने लगा है तभी तो 50-100 केस प्रतिदिन संक्रमण होने पर कर्फ्यू और लाॅकडाऊन लगाने वाला देश 6000 से अधिक संक्रमण प्रतिदिन होने पर अब बाज़ार खोल रहा है , पब्लिक परिवहन , ट्रेन और बस चला रहा है और 2 दिन बाद हवाई जहाज़ उड़ाने की तैय्यारी कर रहा है।

कोरोना एक बहुत बड़ा आर्थिक घोटाला है , जिसमैं चीन को टक्कर दे रहे देश बर्बाद हो गये और चीन ? वुहान में ही कोरोना को रोक कर अब अपनी जीडीपी 3% तक बढ़ा चुका है।

दूसरा तर्क अमेरिकी साजिश का है , पर कोरोना किसी की साजिश तो है जिसमें भारत पिस गया और उसे समझ में अब आ रहा है। मात्र 2% दर तो साधारण बिमारियों में भी होती है फिर कोरोना भी उसी स्तर का संक्रमण है।

खैर , सोशल डिस्टेन्सिंग बनाए रखिए और सरकारी आदेश का पालन करिए।

प्रवासी मज़दूरों की सेवा करके ईद मनायें

अस्सलामु आलेकुम
इंशा अल्लाह ईद मनायेंगे ओर ज़रूर ज़रूर बनायेंगे अल्लाह क़े क़रम से पूरे रमज़ान क़े रोज़े रखें है ओर उसी क़े इनाम क़े लिए अल्लाह ने हमें तोहफ़े में ईद जैसा मुक़द्दस दिन दिया हमें।

हम ईद मुसाफ़िर की मनायेंगे उसको उसके घर सही सलामत पहुँचाक़े🌹

हम ईद मनायेंगे जिसके घर राशन नहीं उसके घर राशन पहुँचाके🌹

हम ईद मनायेंगे जिनके पास कपड़े नहीं उन्हें कपड़े दिलाक़े🌹

हम ईद मनायेंगे परेशान क़े परेशानी दुर करकें🌹

हम ईद मनायेंगे ज़ो ख़र्च नहीं कर सकता अपनी बीमारी पर उसका इलाज़ कराके🌹

हम ईद मनायेंगे ज़ो कम पूँजी से काम करते थे इस बंद में पूँजी ख़त्म हों गई उनका कारोबार वापस चालु कराके🌹

हम ईद मनायेंगे बेवा मिस्कीन की हर परेशानी दुर करके🌹

हम ईद मनायेंगे हमारे वतन 🇮🇳 को हर तरह से आगे बढ़ाने में मदद करेंगे🌹

ईद का पैग़ाम भी यही होता है की आप की ख़ुशी दूसरों की ख़ुशी में होना चाहिए सही तरीक़े से यही ईद होगी 🌹🌹🌹

इतिहास

इतिहास  का एक पृष्ठ। थोड़ा सा समय निकाल कर जरूर पढ़ने का कष्ट करें शायद कुछ हासिल हो सके।

सन 2014 से पहले तक इतिहास का वो दौर थ जब हम भारत के लोग "बहुत दुखी" थे। 

एक तरफ तो फैक्ट्रियों मे काम चल रहा था और कामगार काम से दुखी थे अपनी मिलने वाली पगार से दुखी थे।

सरकारी बाबू की तन्ख्वाह समय समय पर आने वाले वेतन आयोगों से बढ रही थी। हर छ महीने साल भर मे 10% तक के मंहगाई भत्ते  मिल रहे थे नौकरियां खुली हुईं थीं अमीर, गरीब, सवर्ण, दलित, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबके लिये यूपीएससी था, एसएससी था, रेलवे थी, बैंक की नौकरियां थीं। 

प्राईवेट सेक्टर उफान पर था।
मल्टी नेशनल कम्पनियां आ रहीं थी जाब दे रहीं थीं। 

हर छोटे बडे शहर मे ऑडी और जगुआर जैसी कारों के शो रूम खुल रहे थे।

हर घर मे एक से लेकर तीन चार तक अलग अलग माडलो की  कारें हो रही थीं। प्रॉपर्टी मे बूम था। नोयडा से लेकर पुणे, बंगलौर तक, कलकत्ता से बम्बई तक फ्लैटों की मारा-मारी मची हुई थी। महंगे बिकते थे फ़िर भी बुकिंग कई सालों की थी।

मतलब हर तरफ हर जगह अथाह दुख ही दुख पसरा हुआ था।

लोग नौकरी मिलने से,  तन्ख्वाह पेन्शन और मंहगाई भत्ता मिलने से दुखी थे।

प्राईवेट सेक्टर, आई टी सेक्टर में मिलने वाले लाखों के पैकेज से लोग दुखी थे।

कारों से, प्रॉपर्टी से, शान्ति से बहुत लोग दुखी थे।

फिर क्या था?😢😢👇👇

प्रभु  से भारत की जनता का यह दुख देखा न गया।

तब उन्होंने 'अच्छे दिन' का एक वेदमंत्र लेकर भारत की पवित्र भूमि पर अवतारी का अवतरण हुआ। 

भये प्रकट कृपाला दीन दयाला।
जनता ने कहा - कीजे प्रभु लीला अति प्रियशीला। 

प्रभु ने चमत्कार दिखाने आरम्भ किये।

जनता चमत्कृत हो कर देखती रही।

लगभग 10 फ़ीसदी की रफ़्तार से चलनें वाली तीव्र अर्थव्यवस्था को शून्य पर पहुंचाया प्रभु ने और इसके लिए रात दिन अथक प्रयास किये। 

विदेशों से कालाधन लानें के बजाए जनता का बाप दादाओं का खज़ाना खाली करवा दिया क्योंकि जनता ही चोर निकली। सारा कालाधन छिपाए बैठी थी और प्रभु तो सर्वज्ञानी हैं। 

एक ही झटके में कर दी सर्जिकल स्ट्राइक और खेल दिया मास्टरस्ट्रोक। इस ऐतिहासिक लीला को नोटबन्दी का नाम दिया गया।

तमाम संवैधानिक संस्थायें रेलवे, एअरपोर्ट, दूरसंचार, बैंक, AIIMS, IIT, ISRO,  CBI, RAW, BSNL, MTNL, NTPC, POWER GRID ,  ONGC, आदि जो नेहरू और इंदिरा नाम के क्रूर शासकों ने बनायीं थीं उनको ध्वंस किया और उन्हें संविधान, कानून  और नैतिकता के पंजे से मुक्त किया। 

रिजर्व बैंक नाम की एक ऐसी ही संस्था थी जो जनता के पैसों पर किसी नाग की भाँति  कुन्डली मार कर बैठी रहती थी। प्रभु ने उसका तमाम पैसा,  जिसे जनता अपना समझने की भूल करती थी, तमाम प्रयासों से बाहर निकाल कर उस रिजर्व बैंक को  पैसों के भार से  मुक्त किया।

 प्रजा को इन सब कार्यवाहियों से बड़ा आनन्द मिला और करतल ध्वनि से जनता ने आभार व्यक्त किया और प्रभु के  गुणगान में लग गयी।

प्रभु ने ऐसे अनेक लोकोपकारी काम किये जैसे सरकारी नौकरियां खत्म करने का पूर्ण  प्रयास, बिना यूपीएससी सीधा उपसचिव, संयुक्त सचिव नियुक्त करना, मंहगाई भत्ता रोकना, आदि। 

पहले सरकारी कर्मचारी  वेतन आयोगों मे 30 से 40% तक की वृद्धि से दुखी रहते थे। फिर सातवें वेतन आयोग में जब मात्र  13% की वृद्धि ही मिली तब जा के कहीं  सरकारी कर्मचारियों को संतुष्टि मिली वरना मनमोहन सिंह नामक क्रूर शासक ने  तो कर्मचारियों को तनख्वाह में बढोतरी और मंहगाई भत्ता की मद मे  पैसे दे-देकर बिगाड़ रहा था।

 प्रभु जब अपनी लीला मे व्यस्त थे तभी कोरोना नामक एक देवी चीन से प्रभु की मदद को आ गयीं। अब सारे शहर गाँव गली कूचे मे ताला लगा दिया गया।लोगों को तालों मे बंद करके आराम करने का आदेश हो गया।अब सर्वत्र शान्ति थी। लोग घरों मे बंद होकर चाट पकौड़ी, जलेबी, मिठाई  का आनंद उठाने लगे। 

रेलगाड़ी और हवाई जहाज जैसी विदेशी म्लेच्छो के साधन छोड़कर लोग पैदल ही सैकड़ों हजारो मील की यात्रा पर निकल पड़े।   

फैक्ट्रियां, दुकानें सब बंद कर दी गयी। कामगारों को नौकरियों से निजात दे दी गयी सबको गुलामों और घोड़ों की तरह मुँह पर पट्टा बाधना अनिवार्य किया गया, जो लोग 2014 के पहले के तमाम लौकिक सुखों से दुखी थे उनमें प्रसन्नता का सागर हिलोरे मारने लगा।

सर्वत्र नमोराज छा गया।

जनता जो 2014 से पहले आत्मनिर्भर थी, किसी सरकार की मोहताज नहीं थी, स्वावलंबी थी उसे सड़को, पटरियों, पगडंडियों पर चलाकर गावों में पैदल पैदल पहुंचा दिया। प्रभु की लीला देखिए। जो गर्भवती महिला पहले डॉक्टर के कहनें पर घर में पड़ी हुई रोटियां तोड़ती थी उन महिलाओं का ऐसा सशक्तिकरण कर दिया प्रभु ने कि वे ख़ुद ही सड़क किनारे बच्चे को जन्म देकर 160 किलोमीटर तक दौड़ रही हैं। ऐसा चमत्कार प्रभु कोई नहीं कर पाया। 

आपनें तो छोटे छोटे बच्चों को भी सशक्त और आत्मनिर्भर बना दिया है। हज़ारों, लाखों बच्चों को भी सड़कों पर अपनें माता पिता के साथ पैदल चलते देखा जा सकता है। कुछ बच्चे तो अपनें छोटे छोटे पैरों से रिक्शा चलाकर परिवार को ढ़ोने में खुशी पा रहे हैं। आप धन्य हैं प्रभु।

ग़रीबों की प्रभु को इतनी चिंता और फ़िक्र है कि देश का सारा खज़ाना उनपर न्यौछावर कर दिया। 

20 लाख करोड़ रुपये अमीरों को दे दिए प्रभु ने ताक़ि ये अमीर जीवनभर ग़रीबों को ग़ुलाम बनाकर रखें। धन्यवाद प्रभु।

यदि प्रभु के सारे कृत्य वर्णन किये जाये तो सारे भारत की भूमि और सारी नदियों का जल भी लिखने के लिये कम पड़  जाये। थोड़ा लिखना बहुत  समझना आप तो खुद  समझदार हैं । आगे की लीला के लिए प्रभु के दूरदर्शन पर प्रकट होने की प्रतीक्षा करें उसके बाद करतल ध्वनि से स्वागत करते रहिये।

जय हो महाजुमलेश्वर महाराज की जय।

कढा़ही पनीर | Kadai Paneer Recipe | Spicy Kadhai Paneer Curry with Thick Gravy

कढा़ही पनीर |
Kadai Paneer Recipe | Spicy Kadhai Paneer Curry with Thick Gravy

पनीर से तरह-तरह की करी और डिश तैयार की जाती हैं, लेकिन जो स्वाद कढ़ाही पनीर में आता है, उसका मुकाबला अन्य किसी भी पनीर की डिश से नही किया जा सकता. आइए देखते हैं इसकी बेहद सरल रेसिपी.

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Kadai Paneer Recipe
पनीर - 300 ग्राम
शिमला मिर्च - 1 (150 ग्राम)
टमाटर - 3 (250 ग्राम)
हरी मिर्च - 2
काजू - 10-12
तेल - 2-3 टेबल स्पून
हरा धनियां - 2-3 टेबल स्पून (बारीक कटा हुआ)
हींग - 1 पिंच
जीरा - 1/2 छोटी चम्मच
हल्दी - 1/3 छोटी चम्मच
धनियां पाउडर - 1 छोटी चम्मच
कसूरी मेथी - 1 टेबल स्पून
अदरक पेस्ट - 1 छोटी चम्मच
गरम मसाला - एक चौथाई छोटी चम्मच से कम
लाल मिर्च - 1/4 छोटी चम्मच
नमक - 1 छोटी चम्मच या स्वादानुसार

विधि - How to make Spicy Kadhai Paneer Curry with Thick Gravy
पनीर को 1 इंच के चौकोर टुकड़ों में काट लीजिये. शिमला मिर्च भी अच्छे से धो लीजिये. इसके बीज हटाकर इसे चौकोर टुकड़ों में काट लीजिये.
पैन में 2-3 छोटी चम्मच तेल डाल कर गरम कीजिये, गरम तेल में पनीर के टुकड़े सिकने के लिए लगा दीजिए और नीचे की ओर से हल्के से ब्राउन होने तक सेक लीजिये. पनीर के टुकड़े नीचे से हल्के ब्राउन हो जाने पर इन्हें पलट लीजिए और दूसरी ओर से भी हल्का ब्राउन होने तक सिकने दीजिए. दोनों ओर से सिक जाने पर पनीर के टुकड़ों को प्लेट में निकाल लीजिए.
शिमला मिर्च के टुकड़ों को भी पैन में डालकर हल्का सा क्रन्ची होने तक भून लीजिए. शिमला मिर्च को ढककर के 1 मिनिट के लिए पकने दीजिए. भुनी शिमला मिर्च को प्लेट में निकाल लीजिए.
टमाटर, हरी मिर्च और काजू का बारीक पेस्ट बना कर तैयार कर लीजिए.
पैन में 2 टेबल स्पून तेल डालकर गरम कीजिए. तेल गरम होने पर इसमें जीरा डाल कर भूनिये. जीरा भूनने के बाद इसमें हींग, हल्दी पाउडर, धनियां पाउडर और कसूरी मेथी डालकर मसाले को हल्का सा भून लीजिए. इसके बाद इसमें अदरक का पेस्ट, टमाटर, हरी मिर्च और काजू का पेस्ट और लाल मिर्च पाउडर डालकर मसाले को तब तक भूनिये जब तक मसाले के ऊपर तेल न तैरने लगे.
मसाला भुन जाने के बाद मसाले में नमक, गरम मसाला डालकर मिक्स कीजिए और 1/2 कप पानी डाल दीजिए. इसमें पनीर के टुकड़े, शिमला मिर्च और थोडा़ सा हरा धनिया डालकर अच्छे से मिक्स कर दीजिए.
सब्जी को ढककर 4-5 मिनिट धीमी आंच पर पकने दीजिए ताकि पनीर और शिमला मिर्च में सारे मसाले अच्छे से जज़्ब हो जाएं.
सब्जी को चैक कीजिए. कढ़ाही पनीर बनकर तैयार है. सब्जी को प्याले में निकाल लीजिए.
कढाही पनीर को हरा धनियां डाल कर सजाइये. स्वाद में लाज़वाब कढ़ाही पनीर को गरमागरम चपाती, परांठा, नॉन या चावल किसी के भी साथ परोसिये और खाइये.
3-4 सदस्यों के लिए

सुझाव
काजू के बदले खसखस, खरबूजे के बीच, क्रीम भी डाल सकते हैं.
अगर कढाही पनीर आपको प्याज लहसुन के साथ बनाना है, तब एक प्याज और लहसुन बारीक कतर लीजिये. कढ़ाही में घी या तेल डालकर गरम कीजिये, जीरा भूनिये, और कटे हुये प्याज और लहसुन को डालकर हल्का गुलाबी होने तक भूनिये, इसके बाद, उपरोक्त विधि के अनुसार सब्जी बना लीजिए.