पं. जवाहर लाल नेहरू : पुण्य तिथि- 27 मई ....
मित्रों आज 27 मई है, आज ही के दिन 1964 में पं. नेहरू का देहावसान हुआ था। पं. नेहरू ने आजादी के बाद एक ऐसे देश का सपना देखा था जो भय और भूख से रहित होगा । इसी सपने को पूरा करने के लिये वे ताजिंदगी विना रूके गरीबी, अशिक्छा , बेरोजगारी से लड़ते लड़ते एक दिन वे निर्वाण को प्राप्त हो गये । इसी के साथ हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गयी । दलितों, मजलूमों का सहारा सदैव के लिये छूट गया । गांधी के देश में वे शांति और अहिंसा के पुजारी थे, किंतु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के भी हिमायती थे। व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक होने के साथ साथ आर्थिक असमानता दूर करने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने देशहित में समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता भी नहीं किया। उदारता व दृढ़ता उनके जन्मजात गुण थे, यह दुर्भाग्य है कि पाकिस्तान और चीन के संदर्भ में उनके इसी गुणों को दुर्बलता समझा गया , जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा। बात इतनी सी है कि दबाब में आकर वे बात चीत करने के खिलाफ रहते थे।
जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदा ग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। उन्होंने बहुत पहले कहा था कि इस देश में फासिज्म आ सकता है और उसके वाहक मिडिल क्लास के लोग होंगे, वे दूरद्रष्टा थे ।
आज लोकतंत्र का मंदिर देश की संसदअपराधियों,गुंडो, मवालियों , नचनियां ,गवनियां, आतंकियों की पनाहगाह बनकर रह गयी हैं , हर दल के नेता के नाम पर जाति धर्म के गिरोहों के सरगना महिमामंडित हो रहे हैं।
सूर्य तो कब का अस्त हो गया ,हम तारों की रोशनी में अपना रास्ता ढूढने के लिये बाध्य कर दिये गये हैं । यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल हों।
संसद मे उनका अभाव कभी नही भरेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद ही अब भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी।
गांधी, नेहरू, अंबेडकर रोज रोज पैदा नही होते , पंडित नेहरू को समझना हो तो उनकी लिखि किताब ...
"भारत एक खोज" पंडित जवाहर लाल नेहरू ।..जरूर पढ़े ।
( आजकल एक फैशन बन गया है पं नेहरू को गाली देने का और सत्ता मे बैठे लोग जो अपनी सरस्वती विहिन, प्रतिभाहीन लगनशीलता के बल के द्वारा या किसी दैविक आसुरी शक्ति से या लोगों की मूर्खता के कारण आज दिल्ली की कुर्सी पर बैठ गये हैं , वे इसको प्रोत्साहन दे रहे हैं जबकि नेहरू के आगे इनकी हैसियत क्या है वही जानते हैं। पूरी दूनियाॅ घूम कर देख लिये कि मुंजे , परमानंद , सावरकर , हेडगवार और गोलवरकर को कोई नही जानता। और इनके नये भगवान मालवीय, जो कांग्रेसी थे, उनको को भी कोई नहीं जानता है. वे नेहरू के ईर्ष्या मे दीनदयाल और सावरकर को भूलकर मालवीय को भारत रत्न दिये हैं । क्या ये नेहरू की बराबरी कर सकते है। नेहरू का अधिकतर समय जेल मे ही बीता और जेल मे रहते हुये उन्होनें बहुत कुछ लिखा । "भारत की खोज" उसी मे से एक है। आप भी अगर नेहरू को जानना चाहते हैं थो एक बार जरूर पढे बिना किसी को पढे , समझे ,
दूसरों की बात सुनकर राय बनाना मूर्खता की पहली सीढी होती है उस पर झूठ का किला ही बनता है ) ।
पं. नेहरू कहते हैं...
" मेरी बहुप्रशंसित शैली आखिर है क्या ? एक खास तरह की सरलता और छोटे वाक्यों की प्रांजलता । कुछ तो स्पष्ट चिंतन के कारण और इस कारण कि मेरे पास कहने को कुछ है। लेकिन कुछ इस वजह से भी कि उसमे एक प्रकार की लय है और शब्दों की ध्वनियों का प्रेम भी ।मुझे असंतुलित वाक्य से चिढ है । यह लय क्यों ? यह कोई बाहरी चीज नहीं , जिसे कि सुनने के लिये कान हो और संतुलन के लिये आॅखें ।आखिरकार इसका रिश्ता दिमागी लय से है या शायद उससे भी गहरी किसी चीज से ।"
12 जून 1941 को अपनी बेटी इंदिरा को लिखे पत्र मे जवाहर लाल नेहरू कहते हैं इस लय के कारण ही उन्हें जिंदगी की रस्साकशी मे भी शांत रहने मे मदद मिलती है । चीख -पुकार , गाली गलौज मूर्खतापूर्ण मालूम होने लगती है । हमारे चारों तरफ के फूहड़पन का हम पर असर भी कम हो जाता है।
पं नेहरू ने कहा कि " इस लय की खोज करने के लिये सोचना बहुत आवश्यक है। यूरोप ने फासिज्म के अनुभव से सीखा कि जन - संहार के लिये सामाजिक स्वीकृति या औचित्य का कारण है समाज मे ठहर कर सोचने की ईच्छा या क्षमता का अभाव । नेहरू ने कहा कि वे किसी नैतिकता के पक्ष मे धर्मयुद्ध का रवैया अपनाने के हक मे नहीं। इसलिये वे किसी निश्चयात्मक या निष्कर्षात्मक ढंग से नारेबाजी के भाषा के खिलाफ हैं। मुझे नारे नापसंद हैं वे व्यक्ति को सोचने से रोकते हैं । अधिकतर नारे भ्रम उत्पन्न करते हैं ।"
पं नेहरू के जीवन और उनकी राजनीति को देखें तो वह इस लय की एक अंतहीन तलाश या यात्रा जान पड़ती है।
ताज्जुब नहीं कि वे लेखकों के प्रिय थे। अज्ञेय ने ऊनके अभिनंदन ग्रंथ का संपादन किया था। जन राजनीति करते हुए परिष्कार के प्रति इस आग्रह ने उनके साथ अभिजात्य को एक आरोप की तरह कुछ वैसे ही नत्थी कर दिया गया जैसे मोदी चाय बेचते थे । कहा गया पं नेहरू का कपड़ा पेरिस मे धुलता है।ये सही है पं नेहरू अपने घर से रूपया चुराकर नही भागे थे। पं नेहरू ने गांधी के आग्रह पर अपने घर पर आनंद भवन इलाहाबाद मे पूरे परिवार सहित विदेशी वस्त्र की होली जलायी और पूरे जीवन हाथ से काते गये सूत का कपड़ा पहने। आजाद भारत मे 5 करोड़ का सूट नहीं नीलाम किये। देश के आजादी के लिये लाठी खायी और जेल गये।
" नेहरू के लिये जनतंत्र का मतलब , प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपनी लय की खोज करने की आजादी उपलब्ध कराने मे ही चरितार्थ हो सकता है। सिर्फ हिंदू और गाय गोबर , गणेश सर्जरी उनकी सोच और लक्ष्य नही था। आंतरिक लय , परिष्कार और भीतरी इत्मीनान की खोज मे नेहरू लेकिन हमेशा साधारण जन, उनमें भी किसान के साथ अधिक सहज महसूस करते थे। किसान या खेतिहर मे वे जमीन से रिश्ते के कारण एक ठहराव व जीवट पाते थे जो शहरी जीवन मे प्राय: नही था । नेहरू के लिये यह ठहराव एक पहेली था । अक्सर भारत और चीन की सभ्यताओं की चर्चा करते हुए वे उनकी इस क्षमता का जिक्र करते थे कि इसमें इंसानी रिश्तों में एक ठहराव दिखाई देता है ।तो क्या ठहराव प्रगति का विरोधी है ?
भारत की खोज मे वे स्वभावगत स्थिरता पर मानवीय संबन्धों के प्रसंग मे बिचार करते हैं और कहते हैं कि राजनीति और अर्थशास्त्र के कोलाहल मे प्राय: मानवीय संबन्धों का प्रश्न दब ही जाता है जबकि वह कितना बुनियादी मसला है! राजनीति नेहरू के लिये इनसानी रिश्तों मे खो गये इस ठहराव को वापस हासिल करने के लिहाज से ही सार्थक हो सकती थी । प्राय: वे व्यक्ति शब्द का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उतना ही अधिक
रिश्ते शब्द का भी ।व्यक्ति बिना रिश्तों के बेमानी है। उसी तरह उनका दूसरा प्रिय शब्द प्रगति और परिवर्तन है ।लेकिन वैसा ही लगाव उन्हें निरंतरता शब्द से भी है।वैसै ही एकांत और सार्वजनिकता उनके लिये विरोधी युग्म नहीं थे। सार्वजनिक दिनचर्या के बीच अपने लिये एकांत की खोज नेहरू के लिये दूसरों से कटना या पलायन नहीं।
राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी उन्हें वास्तविक समस्या संबन्धों की ही लगती रही, मानवीय संबन्ध, राष्ट्रों के संबन्ध , आदमी - आदमी के संबन्ध, पुरूष - स्त्री का संबन्ध या बच्चों के प्रति वयस्कों का रूख इन सबको साथ देखें तो एक राष्ट्र के अंतर्गत लोगों के बीच के रिश्ते किस किस्म के होंगे ? अधिकतम परस्पर सहयोग किस तरह किया जा सकेगा और आखिरकार , राष्ट्रों के बीच संबन्ध कैसे होने चाहिये? बुद्धिमान लोग इन प्रश्नों के बारे मे सोचते हैं उन पर विचार- विमर्श करते हैंऔर समाधान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नेहरू के अधैर्य का, जो उनकी तरह ही प्रसिद्ध है, कारण यह था कि अक्सर वे लोगों के सोचने और विचार- विमर्श करने के कठिन कार्य से परहेज करते देखते थे । आसान रास्ते के लोभ में चिंतन सतही और जल्दबाज हो जाता है और भाषा भी उथली हो जाती है। आखिरकार नेहरू क्यों स्पष्टता के साथ देख पाये कि अगर भारत को पराधीनता से मुक्ति हासिल करनी है तो इसलिये कि अधीनता का संबन्ध मानवीय गरिमा के अनुकूल नहीं है । इस अधीनता से मुक्ति हासिल करके एक नयी अधीरता पर आधारित समाज कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?
धर्मनिरपेक्षता को, इस प्रकार अधीनता के हर प्रकार से मुक्त नये मानवीय संबन्ध की भाषा व मुहावरे की खोज का नतीजा माना जा सकता है । यह एक साझा खोज थी जिसमें गांधी और नेहरू का योगदान बराबर का था ।गांधी ने जब कहा कि ऊनके मरने के बाद नेहरू उनकी भाषा बोलेंगे तो संभवत: इसी भाषा की सोच रहे थे । धर्म की भाषा का अभ्यास मानव- समाज ने एक लम्बे समय तक किया था और वह सुकून देता था लेकिन नेहरू को शक था कि यह सुकून आलस का है । मनुष्य का स्वभाव अपनी सुरक्षा के अतिक्रमण का है अगर बीसवीं सदी के मनुष्य ने विरासत मे मिली इस धर्मकी भाषा में कोई प्रयोग नही किया और नया कुछ नहीं सृजित किया तो उसका धरती पर आना व्यर्थ रहा। धर्मनिरपेक्षता इस प्रकार मात्र राज्य का संचालक सिद्धांत न था जिस रूप मे उसके ब्याख्या व आलोचना होती रही है ।धार्मिक रूख नेहरू के लिए अधिक महत्वपूर्ण था । मुमकिन है कि यह रूख या रवैया संगठित या सांस्थानिक धर्म मे न रह गया हो । जैसे आज आर एस एस ने अपने को हिंदू धर्म का संस्थान मानता है परिणाम आप देख रहे हैं बहुमत की सांप्रदायिकता का हाल है कि आप क्या खायेंगे, आप क्या बोलेंगे , आप क्या पहनेंगे , ये संस्थान तय करेंगे। यहां तक कि आप क्या पढ़ेंगे , क्या नहीं पढ़ेंगे सरकार तय करेगी ।
" भारत की खोज " में आइंस्टीन को दुनियाॅ का सबसे बड़ा वैज्ञानिक बताते हुए वे उन्हें इस प्रकार ऊद्ध्रित करते हैं , हमारे इस भौतिकवादी युग मे वैज्ञानिक ही सबसे गहराई मे धार्मिक लोग हैं। इसके साथ नेहरू की अपनी टिप्पणी है , कि विवेकानन्द आधुनिक विज्ञान को वास्तविक धार्मिक भावना की अभिब्यक्ति मानते थे क्योंकि यह सत्य को समझने का एक ईमानदार प्रयास था।
ईमानदारी को परिभाषित करना आसान नही ।इसे नितांत मनोगत भाव भी कहा जा सकता है।यह भी दिलचस्प है कि मार्क्सवादी मुक्तिबोध के लिये सबसे बड़ी चुनौती ईमानदारी हासिल करने की थी । उनके दो प्रिय शब्द थे , सत्य और ईमानदारी । धर्म निरपेक्षता इस रूप मे धर्म का नकार नहीं बल्कि धार्मिक भावना का आधुनिकता मे पूनर्वास है।
क्या नेहरू धर्म की जगह विज्ञान को स्वीकार करने का प्रस्ताव दे रहे थे?
आइंस्टीन और विवेकानंद के बारे मे उनके कमेंट्स से यह बात ठीक नहीं लगती । धर्म उन्हें आकर्षित नही करता था लेकिन उन्हें यह भी पता था कि जीवन सिर्फ वह नही है जिसे हम देख , सुन और छू सकते हैं। यह दृश्य विश्व है जो दिक् और काल मे निरंतर परिवर्तनशील है। इसका संबन्ध भिन्न प्रकार के अदृश्य विश्व से है जो शायद अधिक स्थिर है या उतने ही परिवर्तनशील तत्वों से बना है । कोई भी विचारशील व्यक्ति इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता ।नेहरू के लिये सबसे महत्वपूर्ण मानवीय जीवन था । वह काफी जटिल है और अबतक के मानवीय ज्ञान लिहाज से अत्यंत अतार्किक भी और इसलिये किसी एक विचारधारा के लोहपाश मे उसे बाॅधा नही जा सकता ।
धर्मनिरपेक्षता नेहरू को दुनियावी मसलों मे साथ रहने का एक रास्ता प्रदान करती थी । गांधी के साथ नेहरू का सामंजस्य आधिकतर विचारकों के लिये पहेली रहा है । गांधीवादियों के लिए सबसे अधिक । वे इसे गांधी का नेहरू के पार्टी मोह का परिणाम मानते थे। लेकिन वह यह नही देख पाये कि गांधी और नेहरू की तलाश एक ही थी " साथ रहने को नयी भाषा का आविष्कार " । गांधी की प्रार्थना किसी के धर्म विशेष की भाषा मे समझी नहीं जा सकती । वह कोई धार्मिक क्रियोल भी नही है।
गांधी ने जब नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया , तो क्या उनके दिमाग मे यह बात थी कि धर्मनिरपेक्षता मे ,उनके बाकी सहयोगियों से कहीं ज्यादा विश्वास नेहरू का था। पटेल हों या राजेन्द्र प्रसाद या कोई और , इस बिषय किसी ने इतना नहीं सोचा था जितना नेहरू ने। अगर गांधी और नेहरू का या नेहरू का दूसरे नेताओं से संवाद पढा जाये तो यह साफ हो जाता है कि गांधी के अलावा नेहरू ही इस प्रश्न पर सबसे गहराई से विचार कर रहे थे कि भारत मे हिंदू- मुसलमान और अन्य धर्मावलंबी किस आधार पर एक नयी सामूहिकता की भाषा बिकसित कर सकेंगे।
पं नेहरू ने धर्मनिरपेक्ष राज्य को परिभाषित करते हुए लिखा , कि कुछ लोगों का खयाल है कि यह धर्म का बिरोधी है । स्पष्टत: यह सही नही है। इसका मतलब एक ऐसा राज्य जो हर धर्म को समान आदर देता है और उन्हें बराबरी के मौके भी मुहैया करता है। हाॅ , राज्य के तौर पर यह खुद को किसी एक धर्म या मत से नहीं संबद्ध करता, जो तब राजकीय धर्म बन जाता है ।
इसी राज धर्म को अटल ने मोदी को पालन करने के लिये कहा था । लेकिन अडवानी ने नही पालन करने दिया। परिणाम सामने है। शाह जहाॅ की याद ताजा हो गयी।
नेहरू के सामने साफ है कि भले ही भारत मे धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा रही हो, धर्मनिरपेक्षता उसका दूसरा नाम नहीं है ।एक तो , यह एक आधुनिक परिकल्पना है , दूसरे यह एक नयी प्रकार की राष्ट्रीयता का आधार है ।इसका अर्थ यह हुआ की यह परंपरा प्रदत्त नही है । इसी कारण भले ही संविधान ने इसे सिद्धांत रूप मे स्वीकार कर लिया हो, समाज को इसका अभ्यास करना बाकी है।
नेहरू इस क्रम मे बिनोवा भावे को उदाहरण देते हैं कि उनके हिसाब से राजनीति और धर्म पुराने पड़ चुके हैं ।उनके मुताबिक विश्व को अब संकीर्ण अर्थ मे धर्म या तुच्छ राजनीति की जगह विज्ञान और आधुनिकता की जरूरत है । नेहरू मानते हैं कि दोनों ही विविध स्तरों पर लोगों को एक दूसरे के करीब लाने और उनकी दृष्टि को व्यापक करने का काम करते है ।
नेहरू के लिये किसी भी बिचार की जाॅच की कसौटी यह है कि वह संकीर्णता की ओर ले जाता है या हमारी समझ और संवेदना का दायरा बढाता है । धर्मनिरपेक्षता इस दृष्टि से , जिस रूप मे गांधी और नेहरू ने उसे विकसित किया , मनुष्य और समाज की आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा किये बगैर सांसारिक स्तर पर सहजीवन के सिद्धांत के रूप मे ऊपयुक्त है । यह मनुष्य को सामूहिकता के भाव से बंचित किये बिना उसे उसकी अपेक्षित स्वायत्तता भी प्रदान करती है। धर्मनिरपेक्षता के साथ भारतीय जनतंत्र का प्रश्न जुड़ा हुआ था। नेहरू जैसे पहले को सामाजिक अभ्यास के बिना असंभव मानते थे , जिसका मतलब यही था कि वह राजकीय उपायों से अपना मकसद नही पा सकती,
ठीक उसी तरह वे जनतंत्र को भी सामाजिक स्वभाव से अभिन्न करने के लिये गहन और दीर्घ अभ्यास पर बल देते हैं।
धर्मनिरपेक्षता की तरह ही जनतंत्र के बारे में उनका खयाल है कि वह मात्र राजनीतिक या आर्थिक अवधारणा नहीं है, वह कुछ है जो मन- मस्तिष्क से जूड़ा है । वह आर्थिक समानता और अवसरों की बराबरी तो है ही, लेकिन उससे कहीं अधिक एक ऐसे मनुष्य की कल्पना है जो विचारशील है, जो सोचने का श्रम करता है ।एक समाज जो सोचने का काम किसी महापुरूष को सुपुर्द कर दे और खुद उससे लाभ उठाना चाहे , जनतांत्रिक नहीं हो सकता ।
अपने शासन के 10 साल के बाद आर के करंजिया को दिये इंटरव्यू मे नेहरू ने खुद को " स्टेट्समैन " कहे जाने पर ऐतराज किया । उनके मुताबिक उनके जमाने में यह विशेषण सिर्फ गांधी के लिये ऊपयुक्त था । खुद को उन्होंने गांधी- युग की संतान मात्र कहा। पूछे जाने पर कि इनकी उपलब्धि क्या है तो नेहरू ने कहा कि बंटवारे के भयंकर खून - खराबे के बाद मुसलमानों और हिंदुओं के बीच एक सौहार्दपूर्ण रिश्ता बहाल कर पाने की तसल्ली उन्हें है। नेहरू एक अत्यंत विनम्र व्यक्ति थे जिन्हें इसका बोध था कि वे इतिहास के प्रवाह में एक कण मात्र हैं।
ऐतिहासिकता की इस तीव्र संवेदना के कारण हमेशा के लिए सामाजिक जीवन का कोई प्रारूप प्रस्तावित करने मे उन्हें संकोच था ।लेकिन जिस क्षण की वे पैदाइश थे , ऊसके प्रति अपने उत्तरदायित्व का अहसास भी उन्हें था और ऊससे भागना वे कायरता मानते थे ।सांप्रदायिकता , युद्धोन्माद या राष्ट्रवाद से अगर उन्हें विरक्ति थी तो इसलिए कि ये सोचने की संकीर्ण और अपरिष्कृत कोटियाॅ थी। ये हमारे दायरे को संकरा करते हैं । असल बात है अपनी क्षुद्रताओं से उठ पाने की ताकत। अपनी श्रेष्ठता के अभिमान की जगह समानता का रिश्ता बनाने का यत्न ।
आजकल कुछ बेवकूफ़ लोगों के द्वारा कहा जा रहा है कि नेहरू युग का अंत हो गया है, तो क्या हम मान ले कि नेहरू ने जो लक्ष्य भारत के सामने रखा था , वह अप्रासंगिक हो गया है ? यह सम्भव ही नहीं है.....