पिछले सवा दो महीने से पूरा देश Locked डाउन है! शुरु शुरू में तो सबको मजा आ रहा था.... जैसा कि हम भारतीयों को आदत है! हमें भी लगा (या हमें ये लगाया गया?) कि बस कुछ ही दिनों की बात है! इधर बियर का मग खाली हुआ और उधर सब नार्मल हो जायेगा!
जबकि हमारे ही बगल में हमारा एक पडोसी देश पिछले चार महीनों से इस आफत से जूझ रहा था! लेकिन हम निश्चिन्त थे! ....कि देश सुरक्षित हाथों में है!
जब तक हमारे पास सामान वगैरह मौजूद थे तो हम रोज नया नया उत्पात मचा रहे थे! Innovations की तो भरमार लगी हुई थी! कोई गुलाबजामुन तल रहा था तो कोई पूडी! सबके दिन मजे में कट रहे थे!
इस दौरान सरकार को भी खूब मनोरंजन सूझ रहा था! रामायण चलवा दो! महाभारत चलवा दो! ताली बजवा दो! दीया जलवा दो! ये करवा दो! वो पकवा दो!
समय बीतता गया और धीरे धीरे सबके पकोड़े लगते गये! जब (राशन, सब्जी, मसाले, रूपये, दारू वगैरह का) स्टॉक खतम होने लगा तब हमारी आंख खुली! ...और सरकार की भी!
...कि ये बालाकोट से दूर होने वाली कोई ऐसी वैसी शार्ट टर्म प्रॉब्लम नहीं लग रही! इसके लिए "कुछ बड़ा" करना पड़ेगा!
...तो सरकार ने हमारे डॉक्टरों की साइज से दुगने साइज के PPE किट मंगा लिए! दवाओं का ठेका फेसबुकिया हकीमों को दे दिया गया!
राज्य से लेकर केंद्र तक सब जगह दबाव बढ़ रहा था!इनकी सारी तैयारियों की पोल खोली दिहाड़ी कारीगरों और मजदूरों ने! पहले उनके मालिकों ने उनका साथ छोड़ा! फिर पड़ोसियों ने! ...और सबसे आखिर में स्थानीय प्रशासन ने भी इनका साथ छोड़ दिया! जाओ मरो!
ऐसे में रामायण देखना भी महाभारत से कम नहीं था!
इक्का दुक्का समाजसेवी लोग सहायता के लिए सामने आये! लेकिन वह सहायता ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी! करोड़ों की आबादी और सहायता करने वाले मुठ्ठीभर! कैसे पार पाते?
इसी दरम्यान तब्लीगी वाला मामला सामने आ गया! सरकार थोड़ी खुश हुई कि चलो बला टली! लेकिन ये ख़ुशी भी ज्यादा देर नहीं टिकी!
गोमूत्र, शंख, ताली, थाली, सब हो गया! लेकिन मामला रुकने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है! मृतकों की संख्या में कोई कमी नहीं हो रही है! ये सब देखकर एक दिन सरकार बहादुर के बाहुबली सामने आये!
पहले तो उन्होंने शराब की दुकानें खुलवायीं! पी पाकर अर्थव्यवस्था थोड़ी सम्हली तो उन्होंने अगला पिछला सबकुछ जोड़ जाड़ कर एक पैकेज घोषित कर दिया! बाद में पता चला कि इसमें से आधा तो पहले ही खर्च हो चुका है!
घर में बैठे लोगों की समझ में न पैकेज आया और ना ही इनकी बातें! ....तो जो जहाँ था वहीं से पैदल चल पड़ा!
किधर? अपने गांवों की ओर!
देश के इतिहास में शायद पहली दफ़ा ऐसा हुआ होगा जब आम जनता शहरों की बजाय गाँवो का रुख कर रही थी! वो भी सम्पूर्ण लॉक डाउन में!
जैसे तैसे लोग घर पहुंचे! कुछ रास्ते में ही मर गए! कुछ को ट्रेन ने काट दिया! ...और कुछ को ट्रकों ने उड़ा दिया!
अब जाकर सरकार बहादुर के मंत्री (जो शुरू शुरू में रामायण का लुत्फ़ ले रहे थे) बाहर निकले हैं और टीवी चैनलों पर घूम घूम कर सरकार के एक साल की उपलब्धियां गिना रहे हैं!
वे उपलब्धियां....जो exist ही नहीं करती हैं!
....और हमारे माननीय!! चिट्ठियां लिखते हुए अफ़सोस जता रहे हैं कि सामान्य स्थिति होती तो मैं आपके बीच होता!
अब मालिक को कौन बताये कि आपको इसीलिये भेजा गया है कि जब स्थिति असामान्य हो तो आप कुछ करें! लेकिन आप तो सामान्य स्थिति में भी जनता को प्याज और तेल के आंसू रुला रहे थे!
...और इस स्थिति को सामान्य करेगा कौन? आप ही न?
महामारी की वजह से जो लोग मारे गए वे ये सब देखने नहीं आने वाले! लेकिन जो लोग जिन्दा हैं वे न सिर्फ देख सकते हैं...बल्कि सुन भी सकते हैं...और महसूस भी कर सकते हैं!
...तो देखो और महसूस करो सरकार की उस नाकामी को, जिसने समय रहते भारतीय वायुसीमा को सील नहीं किया और देश में कोरोना जैसी महामारी पसरती चली गयी!
सुन सकते हो तो सुनो....उस मासूम बच्चे की चीत्कार को, जिसकी माँ रेलवे स्टेशन पर दम तोड़ चुकी है!
महसूस कर सकते हो तो उस तंत्र की असंवेदनशीलता को महसूस करो जिसने तुम्हे बिहार की बजाय ओडिसा पहुंचा दिया है!
फिर भी आंख न खुल रही हो तो..."एक साल बेमिसाल" के उस जश्न में शामिल जो जाओ जहाँ भूखे प्यासे पैदल घर पहुंचे मजदूरों को ये एहसास दिलाया जा रहा है कि तुम पैदल नहीं बल्कि पुष्पक विमान द्वारा घर पहुंचे हो!
लेकिन ध्यान रहे....जिस जगह तुम जश्न मना रहे होगे वहां पांच हजार लाशें दफन हैं!
(Unlock - 1 के स्वागत का संकल्प लेते हुए अब दूब अक्षत छोड़ दीजिए)
कपिल देव कहिन
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