Saturday, May 23, 2020

BJP IT cell

          पिछले एक महीने से आईटी सेल को सांप सूंघा हुआ है! सोशियल मीडिया पर गुर्राने वाले अपनी पिंजरे में लेटे हैं, करवट बदल रहे हैं, लेकिन किसी करवट उन्हें चैन नहीं मिल रहा है। परेशान हैं, दिल बैचेन हो रहा है कि सारे किये धरे पर पानी फिर गया है।  ये गुर्राने वाले वैसे भी पूंजीपतियों के पाले हैं, इसलिए मजदूरों पर इन्हें और भी ज्यादा गुस्सा आ रहा है कि ये मुएँ सड़कों पर क्यों निकल आये!  हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया! न ये निकलते न इनके पांव में छाले पड़ते न ये भूख से तड़पते न ये निढाल होकर मर रहे होते न इन्हें चिलचिलाती धूप और आग उगलती सड़क बेहोश करती और न रहमतुललील आलमनीन यानी पूरी दुनिया के लिए राहत(सल्लाहुअलेही व सल्लम) के मानने वाले रोज़े की हालत में खुद भूखे प्यासे रहकर इन बेबस मजदूरों को खाना खिलाने, पानी पिलाने, दवा और वाहन का इंतज़ाम करवाने निकलते और न इन लाखों मजदूरों को पता चलता कि जिन्हें हम जाहिल-जालिम, आतंकवादी-कट्टर, अनपढ़ और क्रूर समझते थे,वो तो इंसानियत के पैरोकार निकले, वो जान लेने  नहीं जान बचाने आए, वे हाथ में पत्थर नहीं खाने की थाली,नाश्ते ही प्याली, एनर्जी ड्रिंक की बोतल, दवाई के रैपर लाए। मजदूरों को अब पता चला कि न्यू रूम से उन्हें जो शिक्षा दी जाती है,वो कितनी झूठी है, कितनी अन्यायपूर्ण है। मजदूर समझ रहे हैं कि मीडिया सेल कितनी धोखेबाज है, उनका भरोसा अब मीडिया सेल की पोस्ट और ब्रेकिंग न्यूज़ से उठ गया है, इसीलिए करवटें बदली जा रही हैं, बेचैनी है, कुड़न है, फिक्र है कि ये "भरोसा" दोबारा कैसे कायम किया जाए, वो करवट बदलते हुए सोच रहे हैं कि कहीं से राहत का दिखावा करते कुछ फ़ोटो की मिल जाएं तो शुरू हो जाएं कि देखों हम भी तुम्हारे साथ थे, लेकिन मिल नहीं रहे हैं मिलेंगे भी तो मुँह की खाना पड़ेगी क्योंकि मजदूरों ने आंखों से देखा है कौन मदद कर रहा था और कौन दिखावा!  तोड़ने वाले को ये भी मालूम है कि ये मुल्क जोड़ने वालों को जल्दी पहचान लेता है और तोड़ने वालों को दुड़की लगाने पर मजबूर कर देता है, जैसा कि नफरत के सौदागर अंग्रेजों के साथ हुआ था, वैसा ही इन नफ़रत के सौदागरों के साथ भी होगा और ये मजदूर करेंगे, क्योंकि देश बदलने का काम मजदूर-गरीब-पिछड़े तबके के लोग   ही करते रहे हैं, इसकी शुरुआत देश के  बायपास और हाईवे पर  वे लोग कर चुके हैं जिन्हें देशद्रोही सिद्ध करने की नाकाम कोशिश होती रहती है, वहां मजदूरों को आईटी सेल का कोई सदस्य नहीं मिला, किसी नफरती ने उनसे नहीं पूछा कि खाना खाओगे? दिखावे के लिए कुछ तंबू जरूर गड़े थे लेकिन वे बस इतने ही थे कि खानापूर्ति भी नहीं हो पा रही थी, दिल चाहिए "अपनों" पर खर्च करने के लिए लेकिन तंबू वालों के लिए सड़क पर चलता मजदूर "अपना" कहां था, वो तो "इस्तेमाल" की चीज़ था, जिसे वे कई-कई बार इस्तेमाल कर चुके हैं!  अगर न्यूज़ रूम वालों का ज़मीर जरा सा भी है, तो वे बताएं कि कौन वहां इंसानियत की सेवा कर रहा था और कितनी कर रहा था, कहीं नजर नहीं आ रहे थे, तथाकथित राष्ट्रभक्त, वहां थे तो असली देशप्रेमी जो अल्लाह के भक्त हैं और देश से मुहब्बत करने वाले, तभी तो वे देश के लोगों का दर्द बांटने, उन्हें सहारा देने सड़क पर उतर आए थे,अंधभक्त तो एसी में आराम फ़रमा रहे थे! ये मददगार वहीं हैं, जिन्हें सच्चर कमेटी की रिपोर्ट    एससी-एसटी वर्ग के लोगों से भी गरीब बताती है, अब बारी मजदूरों की है, जो अपना श्रम बेचते हैं, ज़मीर नहीं। यक़ीनन ज़मीर बेचने वाले हारेंगे और हिंदुस्तान जीतेगा!                           

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