लाली का बस नाम लाली है ...बाकि नाख़ून और दाँत छोड़कर वो पूरी काली है !
बिल्कुल काली ...काली कलूटी ..बैगन लूटी ,काली कीचड़ , उल्टा तवा , काली कोयल , काली नागिन , काली घुरड़ आदि आदि...
नैतिक मर्यादाओं का संविधान साक्षी है कि जब भी उसका बारी -बारी एवं पृथक-पृथक नामकरण किया जाता है ...विशेषकर सावधानी बरती जाती है कि उपमा में काली शब्द प्रधान हो एवं जिस शब्द के आगे काली जोड़ा जाए वो शब्द नितांत हेय, घृणित, अमर्यादित , कलुषित , नीच , पतित , जुगुप्सा पूर्ण , असमाजिक एवं त्याज्य हो ।
एक 16 साल की किशोरी का तमाशा तब और बन जाता है जब उसको घेर कर.. कभी सांकेतिक तो कभी प्रतिकात्मक रूप से उसके आत्मविश्वास एवं स्वाभिमान का दलन किया जाता है ...लाली कान में रोज पड़ते इन फिकरों के सीसों से अक्सर बिलख पड़ती है ..अक्सर मोटे -मोटे आँसू उमड़ पड़ते है उसकी आँखों में ...सिसकियाँ जब भरती है तो ईमान से बैकुंठ भी डोलता होगा लाली ने सरवाइवल ऑफ़ दी फिटेस्ट की थ्योरी के अक्रोडिंग जीना भी सीख लिया है ....तबाही तो तब हुई जब लाली अपना वास्तविक नाम अर्थात लाली ही भूल गई ...माँ भी मजबूरी के चलते अब उसे काली कहती है वरना बताती है चिल्लाते रहो लाली ...लाली कमबख्त सुनती ही नही और काली कहो तो झट चली आती है लेकिन माँ के आंसू बयान कर रहे थे कि फिर वो क्या नामकरण की रस्म वो. लोगों का आना ..पंडत का कहना लक्ष्मी पैदा हुई क्या ये सब झूठ था ...? खैर समाज की तरह माँ ने उसका नाम अब काली स्वीकार कर लिया है ....ललिता उर्फ़ लाली अब सिर्फ स्कूल की बाल दैनिक उपस्थिति पंजिका में ही जीवित है जबकि उसके कातिल हर दिशा हर , जात , हर पन्थ , हर मजहब में जिन्दा घूम रहें है ।
एक लड़की का किशोरावस्था का सबसे नायाब दोस्त 'दर्पण' होता है ...जिससे उसे अगाध लगाव , स्नेह और आत्मीयता होती है ...दर्पण जो उसे प्रत्येक पथ पर हौंसला देता है और कुछ कर -गुजरने का साहस उसमें भरता है ...एक नव किशोरी जितना समय दर्पण को देती है उतना तो वो स्वयं को भी नही देती ..लाली के घर में दर्पण के नाम पर एक शेविंग मिरर है ....गन्दी रहती है .. बालों और गर्दन पर मैल की माइक्रो परत जमी रहती है ...आँखों में नींद के गीदड़े ..और दाँतों में धुली हल्दी सा पीलापन ..लेकिन आखिर वो सँवरे भी तो किसके लिए ..?कौन है जो उसे आँख भरकर देखना चाहता है ..? बन -ठन के आती थी तब भी उसकी गैरत पर आर डी एक्स चस्पा कर दिया जाता था और न सँवरे तो भी ....
हफ्ते भर पहले जादू हुआ था मैं हैरान भी था लेकिन खुश भी लाली बहुत खूबसूरत लग रही थी हाँलाकि श्रृंगार का शऊर नही जानती थी लेकिन क्या कस के तैयार हुई थी.. साफ..उजली जैसे ओस के बादल से छन के आती कोई रवि की किरण ...उसको उस दिन देखकर मेरा दिन भी बहुत अच्छा गया ..दिन- भर उसका साहसी चेहरा मेरी आँखों में बना रहा ...हाँलाकि उसका मजाक भी उस दिन कसरत से बना लेकिन वो पता नही कैसे उस दिन उस माहौल का हिस्सा नही थी ...वो लबरेज थी आत्मविश्वास से और एक भीनी -भीनी ख़ुशी से ....
लेकिन आज स्कूल से लौटते वक़्त मैंने अपनी सारी उम्मीदों को सिलसिलेवार बारूदों के हवाले कर दिया ...अपनी उम्र से तकरीबन ढेड़ गुने एक चरसी ड्राइवर के साथ लाली उसके बेहद करीब होकर उसमें धँसने को तैयार थी ...उसमें प्रेम की कसक की लहर और लज्जा के मेघ का आवरण छाया हुआ था ...वो उपेक्षाओं से मुरझाई बेल उस पके अधेड़ में अपना वुजूद मुकम्मल होती देख रही थी...एक व्यक्ति पर सर्वस्व लुटा देने का भाव भी लाली में तत्पर दिखा और उस व्यक्ति के लिए जिसे मात्र लाली की आयु और उसकी देह का लालच भर था ...मुझे देख वो अधेड़ सकपका कर दूर निकलता रहा लेकिन लाली जो मेरा बेहद सम्मान करती थी .. मुझे ऐसे घूरने लगी जैसे मैं बड़ी मशक्कत से अर्जित उसका मान छीनने आया हूँ ..वो भाव-भंगिमाओं से बागी दिखी एक रोष उसमें एकत्रित होता जा रहा था जो मुझे चेतावनी स्वरूप् कहना चाह रहा था कि दफा हो जाओ अपितु भला न होगा ....लाली एक ऐसे रास्ते में निकल पड़ी है जिसका कोई मुहाना या मंजिल नही ...पग -पग में इस्तेमाल करने वाला उसका ये मार्ग हमनें अर्थात वी दी पीपुल ऑफ़ इण्डिया ने उसे चुनकर दिया है ...हम यानि संस्कृति और सभ्यता के पालने में झूलने वाले वो धूर्त जो काले रंग को महज तब ही स्वीकारते एवं उसका सम्मान करते है जब हमें ...काला शिवलिंग दिखाई दे ... काले कृष्ण ...काली माँ ...काले शनि देव या फिर काला जन्नती पत्थर या फिर उसका काला गिलाफ ..... ऐसी अनेक लालियाँ जिनको अपने कर्म अपने नाम से आसमान में छाना था उनको ग्रहण की काली छाया में पहुंचाने वाले हम भारतीय आज भी सोच और दिल से कभी उजले नही हो पाये ......
Thursday, August 2, 2018
काली
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