Sunday, July 22, 2018

Ram mandir

सूरज उगते हुए भगवा दिखे या डूबते हुए लाल मुझे सूरज से नही मुझे सूरज के नीचे खड़े लोगों के रंग से सरोकार है ...भगवा जिसे आज एक अलग शक्ल और सियासत से जोड़ दिया गया है अवश्य ही शौर्य कासूचक है परन्तु ये रंग इसके इतर कुछ और भी है ...
कुम्भ ड्यूटी के दौरान हरिद्वार जिले के ज्वालापुर कस्बें में एक साधू का व्यक्तित्व मेरी कलम पर कर्ज है सोचा आज पूरा कर के मुक्ति पाऊँ ...वो साधू ठोस सनातनी था पक्का और कर्रा ..दावा तो ये तक करता था कि उसके पुरखों ने महमूद लुटेरे को सिंध के पास रोका था ...औरंगजेब के वक़्त उसके ही पुरखे विद्रोह में सबसे आगे थे ..सत्तावन की क्रांति में रोटी ..कमल की चिट्ठी इनके पुरखे ही पार लगाते थे ...अपनी बिगड़ैल रईशी का भी दौर उसे याद था ...वो सब फेंक रहा था मुझे इल्म हो गया वो सब झूठ नही था मुझे बाद में महसूस हुआ..
चाय की चुस्की के साथ एक गहरे चिलम का कश फूँकते हुए उसने बताया की साधू बनना मेरी नियति नही विवशता थी ..कर्ज चढ़ गया था सर पर और घर में एक अन्न का दाना नही था ..बड़ी सच्चाई से स्वीकारा की साधू बनकर भी चैन नही मिला क्यूँकि साधू नेम का एक भी अध्याय मुझे नही पता था ..संयम था परन्तु संकोच भी ..भारत का हर कोना पाट लिया हर मन्दिर हर तीर्थ हो लिया ..कभी रात किसी मन्दिर में गुजारी तो कभी उसके अहाते में तो कभी धर्मशाला में ..तो कभी किसी टेंट के भीतर ...
लेकिन बच्चे हर जगह हर दिशा से याद आये...बीवी तो कभी धुंधलाई ही नही आँखों से।
मैंने अपनी जिंदगी में अनेकों साधू देखे है लेकिन जो एक ढेला माँगकर नही खाता ऐसा साधू मुझे बता रहा था कि यन्त्र बेचता है और अँगूठी के नग भी...जोश से आँखे तेर कर बोला यदि ठगी करूँ तो मेरा राम मेरी देह मेरी अस्थियों से उतार दे..चिलम भी अब कम कर दी है कुछ खाँसी की वजह से और कुछ छोटी बेटी का ब्याह ठहरा है और पैसा भेजना है  उसके वास्ते ...अक्सर मिलता हूँ अब उनसे ..वो कहती है बाबा घर आ जाओ अब बहुत हुआ ..भूल जाती है कि अब घर लौटा तो जीवन श्राप बन जायेगा कोई भी नही स्वीकारेगा कहेगा समाज साधू का घर है न कि ईंट -पत्थर का मकान ..वो कर्ज देने वाला मर चुका है लेकिन उसके बच्चे जवान है और खस्ता हालत में है छुटकी के ब्याह के बाद आखरी साँस तक कमाऊँगा ताकि उन बच्चों का भी कर्ज अदा कर सकूँ ...जोर का ठहाका लिया न जाने क्या याद आया मैंने ठेल कर पूछा महाराज ! क्या हुआ बोले मियां जी अभी महीना भर पहले बड़की के घर गया था मिलने.. भैरव सेवक मुझे वापस स्टेशन छोड़ आये कुत्ते बहुत है उसके कस्बे में ...लेकिन आँख डुबो लेते है दूसरी करवट में कहते है कि नवाशा भी महाराज बोलता है 5 साल का हो गया है दाढ़ी बाल देखकर पहले गोद नही चढ़ता था ...राम पर अटूट श्रद्धा रखते है और राम मन्दिर बनने के ख्वाहिशमन्द है मगर तभी जब उसकी ईंट मुल्क के मुसलमानों द्वारा रखी जाये ..एक पोटली एक बाशाता का केस है उनके पास ....
ये साधू रुकता नही बस दौड़ता जाता है सूरज से पहले जागकर और उसके दफ़्न होने के बाद तलक ये अपनी जिम्मेदारियों को निभाता राम  का सच्चा नामलेवा उनके मर्म से अवगत वास्तविक रूप में श्रद्धा और सबूरी का केंद्र है इसमें नित विश्वास और ऊर्जा है विषम परिस्थितियों में शौर्यधारी , त्याग और समर्पण की मूर्ती ...इसकी देह पर लिपटा भगवा मुझे मेरे राष्ट्रध्वज की याद दिला गया ...
वो साधू एक नग दे गया था कहता था कि पहन लेना भाग्य न भी बदले परन्तु विश्वास बना रहेगा ....वो नग आज भी मुझे ढूंढे से नही मिलता परन्तु आस-पास ही होगा कहीं क्यूँकि मेरा विश्वास आज भी जिन्दा है कि आज भी कुछ इंसान इस दुनिया में इंसानियत को सम्हाले हुए है ....फिर चाहे वो भगवा वेश में हो या फिर फ़क़ीरी लिबास में ......नवाजिश
#जुनैद........

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