कुछ ढाई साल पहले मिली उस छुटकी ..जिसका जिक्र मैंने आज से ढाई साल पहले अपनी पोस्ट में किया था ...आज भी उसका नाम नही बताऊँगा..क्यूँकि उससे एक अपराध हुआ है ..अक्सर जब भी एक रास्ते से गुजरता हूँ ...उसको छूकर ..उसको हिलाकर आता हूँ ...कि कहीं चली तो नही गई ...अब से कुछ 10 दिन पहले सो रही थी जब मिलने गया पेट पर भरती साँस बता रही थी जिन्दा है अब तलक .....
कुछ और साल उससे मिलने जाता रहूँगा ..फिर कसम खुदा पाक की मैं उस गाँव उस बटिया (कच्ची संकरी पहाड़ी सड़क) मैं कदम नह रखूँगा अपनी आखरी साँस तक ..न उस दिशा को ही कभी लापरवाही की वजह से देखूँगा ....
कच्चे टेड़े रास्ते से जब कुछ बकरियां बीच सड़क पर आ गई ...तब वो उगती सूरज की पहली नहाईं हुई किरन भी जलवा नुमा हुई ...धाप से एक उसकी बकरी का एक बच्चा जब मेरे टायर से कुछ दस इंच ही दूर रह गया ..तब दौड़ती आई ये कहकशा के नूर की तजल्ली ..उसे उठाकर सीने से लगाकर ...एक हाथ से दाईं लटकती लट उठाकर.. इत्मिनान से उसे कान के पीछे चढ़ाकर मुझे ऐसे नजरों से तरेर के डंक मारने लगी जैसे किसी ने विस्की में नागिन का जहर मिला कर उसकी दो आँखे बना डाली .... मैंने उसकी आँखों में ख़ौफ़ से झाँककर देखा.. लगा जैसे वो आधी तो खुश है लेकिन आधी खफा ...
ऊपर टीले से एक बुजुर्ग ने उसे आवाज लगाई ...अधपका वो बुजुर्ग ,बुजुर्ग नही बल्कि अधेड़ था लेकिन कसरतन वक़्त ने बड़ी बेरहमी से उसको सिलवटों का एक नुजूल पहनाया हुआ था ...वो दौड़ पड़ी मसलन ओस्ले टी ब्रुथ की कहानी की वो परी जो सूरज डूबते ही नंगे पैर दौड़ कर जमीन को नापती थी ...बस वैसी ही लगी वो मुझे..लेकिन वो पलटी साहब ..खिलखिलाई फिर रास्तों की पगडंडियों पर खो गई लेकिन उसकी आवाज फिर भी बहुत साफ आ रही थी ....
इस घटना के कुछ साढ़े तीन महीने बीतने पर फिर वो मुझे मिली क्यूँकि मुझे फिर उसे आपसे मिलाना था ...सड़क पर डामरीकरण का काम चल रहा था ट्रैफिक जेम था दोनों साइड्स का ...तभी मैंने आड़ से देखा एक बच्ची कोलतार से भीगी लकड़ी से एक पेड़ पर एक शक्ल जैसा कुछ बना रही थी ...मैं उसे पहचानता इससे पहले जिंदगी मुझे पहचान गई ....मैं उसे " जिंदगी" कहता हूँ अब ..वो झट दौड़ मेरे पास आ गई ...पहले रुकी ...मटक कर मुझे देखा ..अंतिम बार.खूब से पहचाना ...बाइक के बटन सारे दबाये ...पीछे के बैग को खोलने लगी ..एक भी टॉफी नही थी मेरे पास ...पहली बार टॉफी की कीमत बहुत जियादह लगी मुझे ...अब जो उसने मुझे फिर तरेर के देखा उसकी आँखों का समन्दर मुझे बहा ले गया ...वो बुजुर्ग फिर पास आये हौले से बोले साहब बहुत शरारती है ये ...मैंने उसको गोद में लिया बाइक से दूर एक पैराफीट में जाकर बैठे ...उन्होंने बीड़ी निकाली और एक साँस में आप बीती गांव ..टीला ,,रोर ...कबीला सब बताकर अंत में बोले ....ये भी मुझे छोड़ जायेगी साहब !
गिट्टी पर गिट्टी चढ़ाती छुटकी को जैसे झटका लगा और तुरन्त अपने नाना का हाथ थाम उन्हें खींचने लगी ...आगे ले जाकर अपनी कुर्ती से उनके आंसू पोंछना चाह रही थी लेकिन छुटकी कमर से ऊपर ही नही थी नाना के बेवक़ूफ़ कहीं की ...भला आँसू भी कोई पोंछ पाया है आँख से न गिरे बाहिर तो फिर कलेजे से गिरते है ....
गहरी तलहटी तक जाता देखता रहा उसे ...वो अपने नाना की पीठ पर और बकरियां सबसे आगे ...कुर्र क़ुर्रर्रर्र की आवाज अभी भी गूँज रही थी उसकी ...
AIDS है उसको ...यानि उसके बाप से मिला आशीर्वाद ...जो उसको और उसकी माँ को कुछ 7-8 महीने पहले छोड़ कर सो चुका था ....बीवी भी न बचेगी अब ...वो परी कब तलक जिन्दा रहेगी पता नही ...लेकिन अपनी माँ को रिसते हुए मरते देख वो भी जल्द सो जायेगी ...अब कोई नही गुजरता उनके घर के करीब से ...हा हा हा उधार मांगने वाले भी नही . ...जब पहली दफा पता चला तो मुझ कमीन की भी हिम्मत न हुई थी उसको छूने की लेकिन अब छूकर उसको उसकी रूह को महसूस करता हूँ ...उसके नाना कहते है इसकी माँ भी शरारती थी ऐसी ही ..जिंदगी बेमियादी खांसी और दस्त की वजह से अब घर पर ही रहती है.. ...गांव में जनी ये मासूम ये मासूम फ़रिश्ता बचाया जा सकता था ...ये हो सकता था ...वो हो सकता था ...लेकिन कुछ भी तो नही हुआ ...आखिर में फिर मौत जीतेगी देखते है उसकी गैरत को कितनी शर्म है कब आती है लेने ....
और वो आसमान ..कायनात ...अलाना-फलाना -ढिमकाना का मालिक जिसने मुर्दे उठाये ...पहाड़ हिलाये ..सजदे करवाये ...असुरों को दलन किया ..अँगुलीमाल का हृदय परिवर्तन किया ...सलीब से चौथा आसमान छूआ ...ये तेगी की वो तेगी की वो कहीं मिले तो खबर कर दियो ...बच्ची जब भी जाये शान से जाये जिंदगी न भी दे सका तो मौत तो दर्दनाक मत बनाइयों ...बस सोते -सोते दम निकल जाए ... तू भी बदनाम न होगा हम भी विश्वास बनाये रखेंगे तुझपर ....
Thursday, August 2, 2018
छुटकी
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