Sunday, August 5, 2018

वृद्धाश्रम

धड़ाधड़ खुलते वृद्धाश्रम जहाँ ईश्वर के होने का सबल प्रमाण है वहीं हमारी मोर्डिनिटी और डेवलपमेंट का एक सूचक भी .... विचारों , जज्बातों से जियादह चेहरे और लिंग पर रीझने वाला हमारा भारतीय समाज हमें आधुनिकता के शिखर पर स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध है ....
वो महिला जो आज वृद्धावस्था एक अनुभव के मंच से .. 3 घण्टे के कड़े मेकअप के बाद मात्र 3 मिनट बोलने उपस्थित हुई उन्होंने समां लूट लिया ...मात्र 70 सेकंड बाद की उनकी पूरी पंक्तियाँ अन्धाधुन्ध खुलते वृद्धाश्रम को समर्पित थी बोलते -बोलते  40 सेकंड के बाद उन्होंने एक पर्ची डाइस पर रखी और उसमें उनकी स्वयं रचित पंक्तियों को बड़े गम्भीर होकर श्रोताओं से सुनने का आग्रह किया ...
पंक्तियों में कतई दम नही था और न कोई निष्कर्ष लेकिन हुश्न देख लोटा डुबाने के शुभेच्छु उसमें जबरन जज्बात .. आत्मसात कर मचल उठे ...वाह ..वाह की सदायें और वन्स मोर की आवाजें महोदया को वक्ता कम एक कलाकार होने का बोध कराने लगी तो वो मंच से उतरने लगी तभी संचालक महोदय लपक के पास हो लिए और कामुकता से  बोले मैडम पंक्तियाँ करारी थी ....महोदया ने कातर स्माइल दी और जैसे ही सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी उनको पूरा आदमकद देखने और गज गामिनी की भांति गति करने के दृश्य के लोभ के संवहरण से मुख्य अतिथि महोदय भी झूला कुर्सी से किसी बहाने चार हाथ ऊपर हो लिए .....
उक्त महोदया के बाद एक वृद्ध  ने मंच पर पदार्पण किया और उनकी तीन पंक्तियों के बाद ही आधी पब्लिक को पेशाब लग गया आधी गुटखे ,चूना -खैनी में बीजी हो गए ...आधे चाय वाले को हाथ से इधर आ बे वाला इशारा करने लगे ...जनानियां फेसबुक में नोटिफिकेशन टटोलने लगी ...युवतियां सेल्फ़ी पर कमेन्ट बिनने लगी .. अतिथि महोदय बगल वाले के कान पर चढ़ गए ...संचालक बाँटी जाने वाली पंखियों को नामों से मैच करने लगे ....लेकिन इस पूरे हो हल्ले में दो आँखे और एक जिस्म पूरी तरह मुस्तैद था ...एक ग्यारह -बाराह साला बच्ची खाली कुर्सियों के बीच में नूर की नंगी तजल्ली बनकर चमक रही थी ....दोनों  फूले गालों को हथेलियों से दबाये वो उस वृद्ध का एक -एक शब्द अपने कानों से पी रही थी ...निर्निमेष वो बच्ची इन सब बवाल  हो हुड़दंग से अंजान आँखे फैलाये उस वृद्ध को जैसे मुकम्मल आँखों में कैद करना चाह रही थी ...वृद्ध भी समझ गए कि उनके विचार , उनकी भावनाओं और उनके शब्दों का सामूहिक बलात्कार हो रहा है परन्तु वो डिगे नही खाँसते -हाँफते वो कभी रुक-रुक कर तो कभी अधीर होकर बस बोलते ही रहे ....श्रोताओं ने बीच -बीच में तालियाँ बजाकर उस बूढ़े रेडियों के सेल ढीले करके उसे रोकना चाहा मगर एक चेहरे का सदका काफी था उनकी जुबान की रफ़्तार को बढ़ाने के वास्ते .....
अपनी बात रखते ही वो मंच से उतर गए ...क्या -कहा , किस प्रकरण में कहा खुदा जाने लेकिन नन्हें हाथों की तालियाँ उनके इस्तकबाल में अब भी बज रही थी ...उन्हीं नन्हे मासूम हाथों को थाम वो तात्कालिक माहौल से जल्दी दूर निकलने लगे ...पीछा करना वाजिब था नही तो मेरी पोस्ट मुकम्मल कैसे होती ....सड़क पर पहुँचते ही उस वृद्ध ने उस नन्ही ऊर्जा और को कुर्ते की जेब से निकालकर एक रुक्का (खत) दिया ..कुछ एक सस्ती टॉफी ...कुछ गेर की किशमिश ...कुछ फूल की पन्खुड़ियाँ उसके सर पर रखी ..... और  उसे फिर हॉल के गेट तक छोड़कर दूर  बस दूर निकल गए ..... वो बच्ची उसी  कातर आधुनिक  महिला कवयित्री के पास वाली सीट पर जाकर बैठ गई ....... और उक्त महिला उस बच्ची से बोली दादा जी चले गए क्या .........? उसने हम्म कहकर सर हिलाया और धप्प से कुर्सी के एक पाये पर सर टेक आँख मूँद ली लेकिन एक चिट्ठी  अब भी उसके सीने के पास सुलग रही थी ....खुदा जाने मजमून क्या होगा लेकिन लिफाफे में हैप्पी बर्थ डे अरु लिखा था  ....

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