Monday, August 6, 2018

रईसी की निशानी

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मेरे पड़ोस में रहने वाले सज्जन नए-नए अमीर हुए हैं। फ्रिज का पानी उन्हें नहीं जमता। कहने लगे चलो मटका खरीद लाएं। उनकी नई कार में बैठा कर हम मटका लेने चले। अब मटका तो कुम्हारों के यहां मिलता है। मगर वे कुम्हारों की दुकान पर जाएं ही ना। पहले सुनारों के यहां ले गए। सुनार सुन कर हंसने लगे। मेरे पड़ोसी ने कहा कि दस हजार का भी मिलता होगा तो लूंगा। मैने कहा कि मटका तो कुम्हार के यहां मिलता है। कहने लगे कि कुम्हार के यहां से तो गरीब मटका खरीदते हैं। जब हमारी प्रदेश सरकार सिंहस्थ के लिए हार्डवेयर वाले से और ऑटो पार्ट्स वालों से आठ सौ रुपये का मटका खरीद सकती है, तो मैं घर के लिए क्या दस हजार रुपये का मटका नहीं खरीद सकता। लिहाजा वे मुझे लिए पूरे शहर में भटकते रहे। मैं भी छुट्टी में था, तो सोचा चलो उनकी एसी गाड़ी का ही लुत्फ उठाता रहूं। दिन भर उन्होंने खिलाया-पिलाया भी। मगर मटका नहीं मिला। आखिर में वे कुम्हार के यहां गए। कहने लगे कि मटकों को यूं सौ-सौ रुपये में मत बेचो। किसी हार्डवेयर वाले के यहां जाओ। वो सात सौ में खरीदेगा। आठ सौ में हम ले लेंगे। हम नहीं लेंगे तो सरकार ले लेगी। कुम्हार को कुछ समझ ही नहीं आया। वो जनाब खाली हाथ लौट आए। मेरे घर पर एक मटका फालतू पड़ा था, मैंने वो उठा कर दे दिया। वे पांच हजार देने लगे, मैंने केवल अड़तालीस सौ लिये। आखिर पड़ोसी का लिहाज भी रखना पड़ता है। हफ्ते भर बाद उन्होंने कहा कि किसी ठेकेदार से मिलाओ एक बाथरूम और बनवाना है। मैंने दसियों ठेकेदार के नंबर दिये। उन्होंने सबको बुलाया। सबसे रेट पूछा और सबको फेल कर दिया। मैंने कारण बताया तो कहने लगे कि इतने सस्ते बाथरूम बना रहे थे कि चार दिन में खराब हो जाते। जब मध्यप्रदेश सरकार ने सिंहस्थ में इतने महंगे शौचालय बनाए और दो दिन भी नहीं टिके, कुछ तो गायब ही हो गए। जो रेट में सरकार ने बनवाए उससे पिचानवे प्रतिशत कम रेट में मैं कैसे बाथरूम बनवाऊं, मुझे तो शर्म आती है। आखिरकार मैंने दो लाख रुपये में उनसे ठेका लिया और सोलह हजार में शानदार बाथरूम बनवा कर उन्हें दिया। हालांकि ये सिंहस्थ में बने शौचालयों से बहुत ज्यादा बेहतर है, जिसके लिए मुझे खेद है। मगर मैं कितना भी पैसा क्यों न बचाऊं इससे ज्यादा लगे ही नहीं। मुझे मध्यप्रदेश सरकार से बहुत कुछ सीखना है। मेरे बहुत दोस्त रईस हैं। कुछ तो सिंहस्थ के कारण ही अमीर बने हैं। मुझे उनकी फरमाइशें पूरी करनी हैं।
    

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