Friday, August 24, 2018

जमीला

मेरी सेटिंग मुहल्ले में हुई ..सेटिंग का नाम था ' ' जमीला ' ..लेकिन मैं उन्हें " जानेमन जमीला " कहकर बुलाता हूँ ...
जमीला के अब्बा करीम कुबड़ा पेशे से दर्जी थे और और शौक से गुलफाम ..वो मुझे मनहूस कहते थे ..क्यूँकि जिस दिन उनकी मंझोली बीवी का इंतेक़ाल हुआ ..उस दिन उन्होंने सुबह उठकर मेरी ही शक्ल सबसे पहले देखी थी ...
करीम कुबड़ा शादी से पहले ही बाप बनने का सामान एक सड़क दुर्घटना में खो चुके थे ..हाँलाकि उनका अरमान सिलाई मशीन की छोटी सुई से भी छोटा था मगर अरमानों के धागे उनकी जुबान की तरह लम्बे ...
अरमान से याद आया जानेमन जमीला को एडल्ट बी ग्रेड फ़िल्म स्टार अरमान कपूर पसन्द थे ..और वो उनकी छाप मेरी मनहुस शक्ल में देखती थी ...ऐसा उन्होंने मुझसे कहा था...अरमान कपूर की वो फ़िल्म जानेमन जमीला को हद से जियादह पसन्द थी जिसमें वो फ़िल्म की शुरुवात में ही रंडवे ( विधुर) हो जाते है और 37 महिलाओं के बलात्कार के बाद अपने ही पायजामे के नाड़े से फाँसी का फंदा बनाकर उसमें लटक कर अपनी जान दे देते है ...
जानेमन जमीला बहुत शरीफ नेकनाम हसीना है ..क्यूँकि उनपर अपने क्रमशः  छटवें आशिक " शरीफ फरेबी " की मुहब्बत का गहरा असर पड़ा है ... आज भी वो मुझे गले लगाती है और शरीफ ...शरीफ बुदबुदाती है ...वो अक्सर मेरे गले लगने के दरमियान शरीफ को मेरे पीठ के पीछे से व्हाट्सएप से आज भी चुम्मा वाला इमोजी सेंड करती है ....और मुझे लगता है कि मेरी बाँहों में उन्हें सुकून मिलता है इसलिए उन्हें नींद आ जाती है ...
शहर के हर पार्क से जमीला जानेमन वाकिफ है , और उन सूने उजाड़ कोनों में भी उनकी पहुँच है जहाँ आज भी रवि की किरणें पहुँच नही बना पाई ....
दो बार इस हराम मुँह मारू आदत के चलते महिला कांस्टेबलों से कस कर कुट  भी चुकी है वो ,, और एक छापा मारी में धर पकड़ाई के बाद  थाने की बगल वाले दरोगा जी के सरकारी आवास में रात भी गुजार चुकी है वो.... कानून की बड़ी इज्जत करती हैं वो इसलिये रत्ती भर भी नही हिचकती है वो खुद को कानून को सौंपने में ....इसी निमित्त कानून भी उनका अब जड़ तक सम्मान करता है और किसी भी रेड में उनको पहले ही मिस कॉल देकर एलर्ट कर देता है ....
जानेमन जमीला और मेरा इश्क जब पनामा पेपर्स की तरह लीक हो गया तब हमनें भाग कर निकाह करने की ठान ली और सीधे पहुँचे उस तड़ीपार मुहल्ले से जलील कर निकाले गए अय्याश काजी के कने ... यहां भी ट्रेजडी ने पीछा नही छोड़ा और काजी ने जमीला को देखते ही उसकी माँ का नाम पुकारा .. वो चिपटने आगे बढे तो मैंने बीच में हाथ लम्बा कर दिया ...तब काजी ने बताया वो ही जमीला के असली अब्बा है... खैर बाप ने बेटी का निकाह मेरे साथ पढ़ाया ...मेरे कुबूल कहते ही जमीला के अब्बा  अर्थात काजी कनिंग स्माइल देकर बोले-" बेटा मुझे पूरा यकीन है  एक दिन तुम मेरी जगह जरूर खड़े होगे " मुझे लगा  लौंडिया की रुख्सती के सदमे या हुक्के के तेज तम्बाकू ने दिमाग में असर कर दिया है ....
खैर आज मैं दो बच्चों का बाप हूँ ... और दोनों विशुद्ध मेरे है ..ये इतनी ऐंठ से इसलिए बोले दे रिया हूँ क्यूँकि दोनों सांवले है ..लेकिन हमारा मकान मालिक भी सांवला है खैर भला आदमी है मेरे पीठ पीछे ही घर आता- जाता है .....
टक्कर यूनिवर्सिटी से बी .कॉम किया था इसलिये एक सस्ते गल्ले वाले का हिसाब -जवाब रखने की जॉब मिल गई ...मेरे मुँह आगे सब शांत था लेकिन पीठ पीछे सब पिचका और फूला ...
जानेमन जमीला की मुहब्बत के चलते मैंने गली , बस्ती , तहसील ,जिला और यहां तक शहर तक बदल दिया ...लेकिन वो तिनका बराबर भी न बदली...मानता हूँ कम कमाता हूँ ,.लेकिन कोशिश करता हूँ कि जमीला को कभी कोई गम न हो ..जमीला की बेलगाम हसरतों के चलते एक टायर बनाने वाली कम्पनी में नाइट शिफ्ट में काम करना शुरू कर दिया ..सुबह फजर की नमाज के बाद देहलीज पार करा मेरा वुजूद फिर तीन चौथाई निपट चुकी रात के गुजर जाने के बाद ही वापस देहलीज के अंदर पहुँचता है ....
मेरे घर में दाखिल होते ही मेरी मासूम छुटकी की आँख खुल जाती है ...आँख खूब घुमाती है जैसे कहती हो अब्बू रोटी खाकर ही सोना .,,ठण्डी रोटी हाथ में लिए मैं गर्म रजाई में बेखबर सोती  जमीला को देखता हूँ ...
और देखता हूँ उसके तकिये के बराबर में एक महँगा स्मार्ट फोन ..,जो मेरी कमाई से मुमकिन नही ..पास खड़ी अलमारी में झांकती महँगी साड़ियों को ..जिसका एक तार खरीद नही सकता मैं ..,तीन तरह के इत्रों से महकते जमीला के बदन को ...फिर महसूस करता हूँ खुद की खस्ता हाल कमीज से दो तरह के आते पसीने की बू को ....
बच्चे यतीम से है मेरे और जमीला बहुत से भ्रमरों से घिरी,,. लोगों के फिकरे उनके ठहाके अब मेरा मुकद्दर है ...इश्क अँधा होता है जानता हूँ लेकिन इश्क इतना जलील और बेवफा भी हो सकता है खबर नही थी ....माना एक मर्द ही अक्सर घर बरबाद करता है लेकिन एक औरत भी ठान ले तो कई जिंदगियाँ बर्बाद कर सकती है ..,,आखरी बार मुझे रोकती अम्मी और उनका चेहरा ..,अब्बू की खामोशी,,,बहन की सिसकियाँ और दोस्तों का समझाना ..,सब याद आता है ..,लेकिन सबसे जियादह याद आता है अपनी बर्बादी का वो पहला पल जब पहली बार जानेमन  जमीला को देखा था  ...

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