1
दुष्ट का क्षणिक संग भी कष्टकरी होता है !
किसी जंगल के रस्ते में एक पीपल का विशाल पेड़ था| इस पीपल के पेड़ में अनेक पक्षियों ने अपने घोंसले बना रक्खे थे| उसी पेड़ पर एक हंस भी रहता था| हंस अपने उदार स्वभाव के कारन सभी पक्षियों के आदर का पत्र था| उसी पेड़ में एक कौआ भी रहता था| हंस के इस उदार भाव के कारन कौआ हंस से इर्ष्या करता था| एक दिन कोई यात्री उस मार्ग से जा रहा था, उस के शारीर पर मूल्यवान वस
्त्र और कंधे पर धनुष- बाण सोभा दे रहे थे| वह गर्मी की तपिश से ब्याकुल हो रहा था| पीपल के पेड़ की घनी छाया देख कर उसने उस पेड़ के निचे आराम करने का निश्चय किया| पेड़ की सुखद छाया में लेटते ही उसे नींद आगई| थोड़ी देर बाद सूर्य की रोशनी उस पथिक के ऊपर आगई| नींद गहरी होने के कारन वह सोता ही रहा| हंस ने जब सूर्य किरणों को उसके मुंह पर पड़ते देखा तो दयावश उसने अपने पंखों को फैला कर छाया कर दी, जिस से पथिक को सुख मिल सके| यात्री सुख पूर्वक सोता रहा| नींद में उसका मुंह खुल गया| उसी समय
कौआ भी उडाता हुवा आया और हंस के पास बैठ गया| साधु स्वभाव वाले हंसने कौवे को अपने समीप आया देख उसे सादर बैठाया और कुशल-प्रश्न पूछा| कौवा तो स्वभाव से ही दुष्ट था, हंस को छाया किये देख कर वह मन ही मन सोचने लगा कि यदि में इस यात्री के ऊपर बीट कर के उड़ जाऊ तो यह यात्री जाग जाएगा तथा पंख फैलाए हंस को ही बीट करने वाला समझ कर मार डालेगा, इस से में इस हंस से मुक्ति पा जाऊंगा| जब तक यह हंस यहाँ रहेगा, तब तक सब इसी की प्रशंसा करते रहेंगे|
यह विचार कर उस ईर्ष्यालु कौएने सोए हुए पथिक के मुंह में बीट कर दी और उड़ गया| मुख में बीट गिरते ही यात्री चौंककर उठ बैठा| जब उसने ऊपर कि और देखा तो हंस को पंख फैलाए बैठा पाया| यद्यपि हंस ने उसका उपकार किया था, परन्तु दुष्ट के क्षणिक संग ने उसे ही दोषी बना दिया| यात्री ने सोचा कि इस हंस ने ही मेरे मुंह में बीट की है, यात्री को गुस्सा तो थाही उसने धनुष-बाण उठाया और एक ही तीर से हंस का काम तमाम कर दिया| बेचारा हंस उस दुष्ट कौए के क्षणिक संग के कारन मृत्यु को प्राप्त हुआ| इस लिए कहा गया है कि दुष्ट के साथ न तो कभी बैठना चाहिए और नाही कभी दुष्ट का साथ देना चाहिए|
2
गुरु-शिष्य भ्रमण करते हुए एक वन से गुजर रहे थे। कुछ दूर से एक झरने का पानी बह कर आ रहा था। गुरूजी को प्यास लगी। उन्होंने शिष्य को कमण्डल में पानी भर कर लाने के लिए कहा।
शिष्य ने पानी के पास पहुँच कर देखा कि वहां से अभी-अभी बैल गाड़ियाँ निकलीं हैं, जिससे वहां का पानी गंदा हो गया था और सूखे पत्ते तैर रहे थे।
शिष्य ने आकर गुरूजी से कहा- " कहीं और से पानी का प्रबंध करना होगा।" लेकिन गुरूजी ने शिष्य को बार-बार वहीं से पानी लाने को कहा। हर बार शिष्य देखता कि पानी गंदा था फिर भी ....। पांचवी बार भी जब वहीं से पानी लाने को कहा गया, तब शिष्य के चेहरे पर असंतोष और खीज के भाव थे।
शिष्य गुरूजी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता था, अत: वह फिर वहां गया। इस बार जाने पर शिष्य ने देखा कि झरने का जल शांत एवं स्वच्छ था। वह प्रसन्नता पूर्वक गुरूजी के पीने के लिए पात्र में जल भर लाया।
शिष्य के हाथ से जल ग्रहण करते हुए गुरूजी मुस्कराए और शिष्य को समझाया - " वत्स ! हमारे मन रूपी जल को भी प्रायः कुविचारों के बैल दूषित करते रहते हैं। अत:हमें अपने मन के झरने के शांत होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए, तभी मन में स्वच्छ विचार आयेंगे। उद्वेलित मन से कभी कोइ निर्णय नहीं लेना चाहिए।
ज़िन्दगी की सीख :
अनुकूल परिणाम पाने के लिए प्रतीक्षा करें और धैर्य रखें।
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