Saturday, January 26, 2013

सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल! konkan railway

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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!

मैंगलोर (कर्नाटक) से रोहा (महाराष्ट्र) तक की दूरी अगर आप ट्रेन से तय करें तो आपका सामना इस उपमहाद्वीप की उस सबसे हैरतंगेज मानवीय संरचना से होगा जिसे बनाने की कल्पना करने से भी लोग घबराते थे। 
 
जी हां,  हम बात कर रहे हैं कोंकण रेलवे के नाम से मशहूर उस रेलवे ट्रैक की जो कर्नाटक के मैंगलोर से महाराष्ट्र के रोहा को जोड़ता है।
 
समुद्र के किनारे बसे ये दोनों ही क्षेत्र आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थे लेकिन इनके बीच किसी तरह का संपर्क मार्ग न होने से दोनों ही जगह के व्यापारियों को काफी नुकसान हो रहा था। 
 
अंततः सरकार ने उनकी सुध ली और इस क्षेत्र को रेलमार्ग से जोड़ने का फैसला किया। लेकिन फैसला लेने वालों को इस बात का बखूबी ज्ञान था कि इस फैसले को अमलीजामा पहनाना इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती है। 
 
सरकार ने इस काम को पूरा करने का जिम्मा रेलवे के एक अधिकारी ई श्रीधरन को सौंपा। 740 किलोमीटर लम्बे इस बेहद दुर्गम रेलमार्ग को बनाने के लिए 2000 पुल और 91 सुरंगे खोदने पड़ीं। इस मार्ग को बनाने के लिए एशिया में पहली बार एक अनोखी तकनीक अपनाई गई। 



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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
मुंबई और मैंगलोर आर्थिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण राज्य रहे हैं। इन दोनों शहरों को जोड़ने के लिए इस क्षेत्र की दो बड़ी हस्तियों (मधु दंडवते और जॉर्ज फर्नांडीज) ने इस क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने का बीड़ा उठाया और इन दोनों शहरों को जोड़ने के लिए रेलवे लाइन बिछाने का फैसला किया।


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 सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
1966 में इन दोनों शहरों को जोड़ने के लिए रेलवे लाइन का श्रीगणेश मुंबई के दिवा और रायगढ़ के अप्ता के बीच ट्रेन सेवा की शुरुवात कर रखी गई। 


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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
मधु दंडवते जब रेल मंत्री बने तो उन्होंने इस लाइन को रोहा तक बढ़वाया हालांकि, इसके बाद भी रोहा से मैंगलोर तक की दूरी अभी भी तय होनी बाकी थी। 


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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!आगे चलकर मैंगलोर से मडगांव और फिर मडगांव से रोहा को जोड़ने से सम्बंधित प्लान का प्रोजेक्ट 1988 में सरकार को सौंपा गया। चूंकि यह लाइन कोंकण के तटीय इलाके से होकर गुजरती थी इसलिए इसे 'कोंकण रेलवे प्रोजेक्ट' नाम दिया गया। 


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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
जॉर्ज फर्नांडीज के रेलमंत्री बनने के बाद इस प्रोजेक्ट ने गति पकड़ी। 19 जुलाई 1990 को 'कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड' नामक एक स्वतंत्र इकाई की स्थापना की गई।


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 सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
इस कंपनी ने पांच साल में प्रोजेक्ट को पूरा करने का निश्चय लिया। 15 सितम्बर 1990 को कंपनी ने अपने काम की शुरुवात की। यहां से शुरू होती है उस प्रोजेक्ट को अमली जामा पहनाने की शुरुवात जो आगे चलकर पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गई।


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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
इंसान ने हमेशा ही चुनौतियों को स्वीकार किया है और उन्हें जीतकर ही दम लिया है। इस कड़ी में हम आपको आधुनिक इंजीनियरिंग के एक ऐसे उदहारण से रूबरू कराने जा रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन गया।
                                                                     


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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
मैंगलोर और रोहा (महाराष्ट्र) दो ऐसी जगहें हैं जो समुद्र के किनारे बसते हैं लेकिन लम्बे समय तक इनके बीच कोई संपर्क मार्ग नहीं था


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सदी की सबसे बड़ी चुनौती, जिसे जीतने के लिए खोदनी पड़ी 91 सुरंगें और 2000 पुल!
संपर्क मार्ग की कमी की वजह से इन दोनों ही क्षेत्रों के लोगों के लिए व्यापार का रास्ता बंद पड़ा था। अस्सी के दशक में भारत सरकार ने इन दोनों क्षेत्रों को आपस में जोड़ने का फैसला किया। यह रास्ता कितना दुर्गम और जोखिम भरा है इसकी झलक आप स्लाइड में लगी तस्वीरों में पा सकते हैं।

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