Saturday, January 26, 2013

गणतंत्र दिवस बनाम छुट्टी का दिन(लघुकथा)

गणतंत्र दिवस बनाम छुट्टी का दिन(लघुकथा)
गाँधी जी ने स्वर्ग में बैठे-बैठे सोचा, "कल गणतंत्र दिवस है| ज़रा अपने देश घूम कर आऊं|" पहचाने न जा सकें सो रिपोर्टर का भेष धर लिया| यही भेष उन्हें सबसे सहज लगा क्योंकि इन्ही के कही भी आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं है| वे एक महानगर के ऑफिस से बाहर निकलते पुरुष के संग लग लिए| कुछ ही दूरी पर उसकी पत्नी भी अपने ऑफिस से बहार निकलती मिल गयी|
रिपोर्टर बने गाँधी जी ने पूछा - "कल गणतंत्र दिवस है, आप अपने देश के बारे में क्या सोचते है? आज हमारे देश को आज़ाद हुए इतने साल हो गए है| इस आज़ादी के लिए कितने ही देश-भक्त शहीद हो गए थे, उनके बारे में आप क्या कहेंगे?" वो व्यक्ति बोला - "छोडो यार , काहे की आज़ादी| सारा दिन ऑफिस में जुटे रहो; घर पर भी चैन नहीं मिलता| बड़ी मुश्किल सरे तो' छुट्टी' मिली है| खासकर कल तो सारे सरकारी दफ्तर भी बंद रहेंगे | घर पर आराम से रहेंगे, टीवी पर कोई नई फिल्म देखेंगे|" बीच में उसकी पत्नी बोली- "अरे भाई साहब, कल तक हम स्कूलों में शहीदों की कहानियां पढ़ते थे; आज हम खुद रोज़ दफ्तर में शहीद होते है| शुक्र है कल तो 'छुट्टी का दिन' है|'
गाँधी जी सोचने लगे,"बेकार ही भेष बदला|यहाँ तो अब हमें कोई पहचानता ही नहीं है|"(डॉ. रश्मि)

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