Wednesday, January 2, 2013

पति-पत्नी का भेद:

पति-पत्नी का भेद:
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हिन्दी हास्य कविता
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सारी रात प्रियतम हमरे ,
दिल लगाकर पीटे हमको ,
फर्श पोंछने का दिल होगा ,
चोटी पकड़ घसीटे हमको ,
गला दबाया प्यार से इतने ,
अँखियाँ जइसे लटक गयीं हो ,
गाली इतनी मीठी बांचे ,
शक्कर सुनकर झटक गयी हो ,
पिस्तौल दिखा रिकवेस्ट किये ,
हम और किसी को न बतलायें ,
हम मन में ये फरियाद किये ,
ये प्यार वो फिर से न दिखलायें | |

वो तो अपनी सारी चाहत ,
सिर्फ हमीं पर बरसाते थे ,
चाय से ले कर खाने तक की ,
तारीफें मुक्कों से कर जाते थे ,
रोज रात को शयन कक्ष में ,
सुरपान नियम से करते थे ,
फिर देवतुल्य अपनी शक्ति का ,
हमें प्रदर्शन करते थे ,
कसम से इतने वीर थे वो कि ,
हम तुमको क्या-क्या बतलायें ,
बस मन में ये फरियाद किये ,
ये प्यार वो फिर से न दिखलायें | |

हम ही ससुरी पगली थीं ,
जो प्यार से उनके ऊब गयी थीं ,
उनके कोमल झापड़ की ,
उन झंकारों में डूब गयीं थीं ,
एक रोज हम दीवानी ने भी ,
अपना स्नेह ; उन पर लुटा दिया ,
उनके प्यारे मुक्के के बदले ,
उनको भी झापड़ जमा दिया ,
अब इतना सज्जन मानव आखिर ,
ये कैसे स्वीकार करे ,
उसके निस्वार्थ प्यार के बदले ,
पत्नी भी उसको प्यार करे ,
बस ठान लिया उसने मन में ,
हमको सर्वोच्च प्रेम-सुख देगा ,
हम मृत्यु-लोक(पृथ्वी) में भटक रही थीं ,

हमको परम मोक्ष वो देगा ,
गंगाजल का लिया कनस्तर ,
फिर हम पर बौछार कराई ,
गंगा इतनी मलिन थीं हमको ,
केरोसीन की खुशबू आई ,
फिर अंततयः उस पाक ह्रदय ने ,
शुद्ध अग्नि में हमें तपाया ,
हमरी अशुद्ध देह जलाकर ,

सोने जैसा खरा बनाया ,
अब भी जाने कितने दानव ,
पति-परमेश्वर कहलाते हैं ,
हम भी शक्ति-स्वरूपा हैं ,
ये जाने क्यूँ भुल जाते हैं ,

पति भी तो अर्द्धांग है अपना ,
फिर , उसको क्यूँ ईश्वर कहते हैं ,
वो अपना पालनहार नहीं है ,
फिर , चुप रहकर क्यूँ सब सहते हैं ,
वो सुबह न जाने कब होगी ,

जब नारी स्वतंत्र हो पाएगी ,
भेद मिटेगा पति-पत्नी का ,
और प्यार से न घबराएगी |

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