चुनाव में विजयी सांसद सदस्यों के स्वागतार्थ एक रात्रिभोज का आयोजन किया गया। भोज के सहभागी अपने-अपने विजय की चर्चा-परिचर्चा करने लगे।
टेबल में सजे स्वादिष्ट व्यंजनों के बरतन ख़ाली हो रहे थे। ख़ाली बरतन भरने का क्रम भी जारी था। कोई व्यंजन तो बरतन पर पहुँचने ही नहीं पाता था। सब मिलकर टूट पड़ते थे।
लेकिन टेबल पर सजाए गए बरतनों में से एक बरतन का व्यंजन तक़रीबन अनछूआ था। उस व्यंजन को कोई औपचारिकतावश या लोकलाज की ख़ातिर थोड़ा सा प्लेट में रखता। पर उस व्यंजन को किसी के मुँह में जाने का अवसर नहीं मिला।
हर सांसद सदस्य कोई भी स्वादिष्ट व्यंजन छोड़ने के पक्ष में नहीं था। इसलिए सब उस बरतन की ढकनी उठाकर देखते और कई तो नाक-भौं सिकोड़र रह जाते। उनके नाक-भौं सिकोड़ने से पता चलता उस बरतन का व्यंजन वाक़ई कड़वा होगा। भोज की समाप्ति पर भी वह व्यंजन अछूता ही रहा।
उस रात्रिभोज में पद, पैसे, महलें, गाड़ियाँ, विदेश भ्रमण, सुरा-सुंदरी जैसे व्यंजनो को सांसद सदस्यों ने छककर खाया उनके बरतन ख़ाली हो गए। उस अनुछूए बरतन में जो व्यंजन था उसका नाम था - राष्ट्रीयता।
टेबल में सजे स्वादिष्ट व्यंजनों के बरतन ख़ाली हो रहे थे। ख़ाली बरतन भरने का क्रम भी जारी था। कोई व्यंजन तो बरतन पर पहुँचने ही नहीं पाता था। सब मिलकर टूट पड़ते थे।
लेकिन टेबल पर सजाए गए बरतनों में से एक बरतन का व्यंजन तक़रीबन अनछूआ था। उस व्यंजन को कोई औपचारिकतावश या लोकलाज की ख़ातिर थोड़ा सा प्लेट में रखता। पर उस व्यंजन को किसी के मुँह में जाने का अवसर नहीं मिला।
हर सांसद सदस्य कोई भी स्वादिष्ट व्यंजन छोड़ने के पक्ष में नहीं था। इसलिए सब उस बरतन की ढकनी उठाकर देखते और कई तो नाक-भौं सिकोड़र रह जाते। उनके नाक-भौं सिकोड़ने से पता चलता उस बरतन का व्यंजन वाक़ई कड़वा होगा। भोज की समाप्ति पर भी वह व्यंजन अछूता ही रहा।
उस रात्रिभोज में पद, पैसे, महलें, गाड़ियाँ, विदेश भ्रमण, सुरा-सुंदरी जैसे व्यंजनो को सांसद सदस्यों ने छककर खाया उनके बरतन ख़ाली हो गए। उस अनुछूए बरतन में जो व्यंजन था उसका नाम था - राष्ट्रीयता।



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