Friday, August 31, 2018

कहानी

अच्छा जान एक किस तो कर दो !

तभी एक मद्धम रुनझुन हँसी सुनी और फोन डिस्कनेक्ट हो गया ...
कार स्टार्ट करने से पहले मैंने फोन की गैलरी में जाकर अपनी पत्नी रेखा और चार साला बेटी सपना की तस्वीर को अँगुलियों से छुआ और अनायास ही मुँह से निकल पड़ा -
" मेरी साँस के रुकने तक मेरी जिंदगी का हर इक कतरा तुम्हारा है ..मेरी जिंदगी हो तुम दोनों "
तभी फोन  में बैटरी खत्म हो गई और वो ऑफ़ हो गया ..फोन को कार चार्जर में लगाया और घड़ी में टाइम देखा ...मायका शहर से सिर्फ तीन घंटे दूर है तो सोचा रेखा और सपना शायद अब ट्रेन में बैठ गए होंगे..तो क्यूँ न तीन घण्टे शॉपिंग की जाए !
पहले टॉयज की दुकान से सपना के लिए खूब टॉयज खरीदे ...फिर उसी के लिए चॉकलेट , पेस्ट्रीज ..अब बारी थी रेखा की साड़ियों की लेकिन पहले उसके लिए मेहरून चूड़िया खरीदी ...फिर साड़ियों की दुकान पर जाकर साड़िया उलटने -पुलटने लगा ...तभी पास चलते टी.वी से एक न्यूज़ मेरे कान में आकर गिरी ..

" सुंदरनगर से आ रही ट्रेन पटरी से उतर गई ..मृतकों की संख्या 200 से ऊपर बताई जा रही है ..लोग अभी भी उसमें फ़ंसे है ..

मेरे पैर जैसे जमीन में धँस गए ...होश को सेकंडों के कंधे पर सम्हाला और बेतहाशा कार की ओर दौड़ लगा दी ..कार के पास पहुँचकर देखा तो पाया चाबी उसी साड़ी की दुकान में भूल आया हूँ.. वक्त न था वापस जाने का तो वहीं से एक टैक्सी पकड़ी और उससे घटनास्थल पर पहुँचने को कहा ..घटनास्थल जितना करीब आ रहा था उतना ही करीब आ रही थी रोने और चीखने की आवाजें ...
भीड़ के कारण टेक्सी आगे नही जा सकती थी तो टेक्सी वाले को उसका किराया पेड कर  पलटे डिब्बों की और दौड़ लगा दी
...अब सिर्फ खून ही ज़िंदा और ताजा मौजूद था वहां ...पुलिस ने मुझे किनारे कर दिया ... एक किनारे बैठ कर सिर्फ रोता और बिलखता रहा मैं ...रात के तकरीबन 12 बजे मेरी आँख अपने आप पलकों से लग गई ...तभी फिर कान में एक चीख गिरी और आँख खुल गई ...कुछ लोग एक औरत को तसल्ली दे रहे थे ...तभी उनमें से एक आदमी बोला -
" करीम मुल्ला इस ट्रेन का ड्राईवर था ..साला जरूर उसने जानबूझकर ऐसा किया होगा ..आतंकवादी साला !"

आँसू पोंछें ..सीधा रिसेप्सन में जाकर करीम का पता पूछा ..पता मिलते ही प्लेटफॉर्म से बाहर आया ..एक फ्रेश वॉटर की बोतल खरीदी ...उसका पानी खाली किया ..उसमें एक नजदीकी  पेट्रोल पम्प से पेट्रोल भरवाया ..और एक ऑटो को नूर बस्ती चलने को कहा ..कुछ 1  बजे रात को मैं नूरबस्ती पहुँचा ..पास आहाते में सोये एक आदमी से करीम का घर पूछा ..उसके लकड़ी के घर के करीब कदम थामे..इधर-उधर गहरी नजरों से देखा ...फिर तमाम पेट्रोल उसके मकान में छिड़क दिया ...फिर जेब में हाथ डाला लेकिन ..माचिस नही थी मेरे पास तो झल्लाकर करीम का दरवाजा पीटा ...
दरवाजा एक 6 या 7 साल की बच्ची ने खोला ..उसके पीछे दो और बच्ची खड़ी डर से  कँपकंपा रही थी ...उन्ही में खड़ी एक   5 साला बच्ची में मुझे अपनी बेटी सपना की झलक दिखाई दी ... तभी एक बच्ची तपाक से बोली -

"अब्बू लेलवे टेशन है अंतल ! अम्मी उनतो लेने दई है "

आँसू उमड़ आये आँखों में.. उन बच्चियों के सर पर हाथ फेरकर मैं ठंडे ..सूने ..बुझे कदमों से पैदल ही घर की ओर निकल गया ...घर के दरवाजे पर जैसे ही पहुँचा अंदर से रेखा और सपना और साथ में टी.वी चलने की आवाजें सुनाई दी ..दरवाजा नॉक किया ..झटके से दरवाजा खुला ..
अनिल ! आप कहाँ थे ..ओय माय गॉड ये क्या हाल बना रखा है आपने अपना ..?
बेतहाशा लिपट गया दोनों से और फूट -फूट कर रोने के बाद जब संभला तो मैंने भरी आवाज से पूछा ..तुम तो ट्रेन से आने वाली थी ..?
अरे ! वो मिस हो गई तो बस से आये फिर तुम्हे बताना चाहा लेकिन तुम्हारा फोन स्विच ऑफ़ आ रहा था ....
तभी फिर टी. वी की आवाज मेरे कान में गिरी ..

" सूत्रो के हवाले से पता चला है कि ट्रेन हादसे का सबसे बड़ा कारण अनुभवी ट्रेन ड्राईवर करीम जमाली के स्थान पर एक  टेम्पररी ड्राईवर रोशन लाल को ट्रेन चलाने की अनुमति देना था ..."

घटना की ओर देखकर रेखा भौचक्की रह गई ..ओह माय गॉड अनिल ..
उसके और कुछ बोलने से पहले मैंने फिर उसकोऔर पास खड़ी अपनी बच्ची को गले लगा लिया ..रेखा की आँख में आँसू थे और सपना सिसक रही थी ...मगर मेरी थरथराती नजर डाईनिंग टेबल में पड़ी उस माचिस की डिब्बी पर अटक गई ..जो मुझसे लगातार एक  सवाल  पूछ रही थी कि- "अनिल ! गर होती उस वक्त जेब में तुम्हारी तो क्या  किसी के सुने पर सच में फूँक देते तीन मासूमों की जिंदगियाँ ...?नवाजिश

Friday, August 24, 2018

जमीला

मेरी सेटिंग मुहल्ले में हुई ..सेटिंग का नाम था ' ' जमीला ' ..लेकिन मैं उन्हें " जानेमन जमीला " कहकर बुलाता हूँ ...
जमीला के अब्बा करीम कुबड़ा पेशे से दर्जी थे और और शौक से गुलफाम ..वो मुझे मनहूस कहते थे ..क्यूँकि जिस दिन उनकी मंझोली बीवी का इंतेक़ाल हुआ ..उस दिन उन्होंने सुबह उठकर मेरी ही शक्ल सबसे पहले देखी थी ...
करीम कुबड़ा शादी से पहले ही बाप बनने का सामान एक सड़क दुर्घटना में खो चुके थे ..हाँलाकि उनका अरमान सिलाई मशीन की छोटी सुई से भी छोटा था मगर अरमानों के धागे उनकी जुबान की तरह लम्बे ...
अरमान से याद आया जानेमन जमीला को एडल्ट बी ग्रेड फ़िल्म स्टार अरमान कपूर पसन्द थे ..और वो उनकी छाप मेरी मनहुस शक्ल में देखती थी ...ऐसा उन्होंने मुझसे कहा था...अरमान कपूर की वो फ़िल्म जानेमन जमीला को हद से जियादह पसन्द थी जिसमें वो फ़िल्म की शुरुवात में ही रंडवे ( विधुर) हो जाते है और 37 महिलाओं के बलात्कार के बाद अपने ही पायजामे के नाड़े से फाँसी का फंदा बनाकर उसमें लटक कर अपनी जान दे देते है ...
जानेमन जमीला बहुत शरीफ नेकनाम हसीना है ..क्यूँकि उनपर अपने क्रमशः  छटवें आशिक " शरीफ फरेबी " की मुहब्बत का गहरा असर पड़ा है ... आज भी वो मुझे गले लगाती है और शरीफ ...शरीफ बुदबुदाती है ...वो अक्सर मेरे गले लगने के दरमियान शरीफ को मेरे पीठ के पीछे से व्हाट्सएप से आज भी चुम्मा वाला इमोजी सेंड करती है ....और मुझे लगता है कि मेरी बाँहों में उन्हें सुकून मिलता है इसलिए उन्हें नींद आ जाती है ...
शहर के हर पार्क से जमीला जानेमन वाकिफ है , और उन सूने उजाड़ कोनों में भी उनकी पहुँच है जहाँ आज भी रवि की किरणें पहुँच नही बना पाई ....
दो बार इस हराम मुँह मारू आदत के चलते महिला कांस्टेबलों से कस कर कुट  भी चुकी है वो ,, और एक छापा मारी में धर पकड़ाई के बाद  थाने की बगल वाले दरोगा जी के सरकारी आवास में रात भी गुजार चुकी है वो.... कानून की बड़ी इज्जत करती हैं वो इसलिये रत्ती भर भी नही हिचकती है वो खुद को कानून को सौंपने में ....इसी निमित्त कानून भी उनका अब जड़ तक सम्मान करता है और किसी भी रेड में उनको पहले ही मिस कॉल देकर एलर्ट कर देता है ....
जानेमन जमीला और मेरा इश्क जब पनामा पेपर्स की तरह लीक हो गया तब हमनें भाग कर निकाह करने की ठान ली और सीधे पहुँचे उस तड़ीपार मुहल्ले से जलील कर निकाले गए अय्याश काजी के कने ... यहां भी ट्रेजडी ने पीछा नही छोड़ा और काजी ने जमीला को देखते ही उसकी माँ का नाम पुकारा .. वो चिपटने आगे बढे तो मैंने बीच में हाथ लम्बा कर दिया ...तब काजी ने बताया वो ही जमीला के असली अब्बा है... खैर बाप ने बेटी का निकाह मेरे साथ पढ़ाया ...मेरे कुबूल कहते ही जमीला के अब्बा  अर्थात काजी कनिंग स्माइल देकर बोले-" बेटा मुझे पूरा यकीन है  एक दिन तुम मेरी जगह जरूर खड़े होगे " मुझे लगा  लौंडिया की रुख्सती के सदमे या हुक्के के तेज तम्बाकू ने दिमाग में असर कर दिया है ....
खैर आज मैं दो बच्चों का बाप हूँ ... और दोनों विशुद्ध मेरे है ..ये इतनी ऐंठ से इसलिए बोले दे रिया हूँ क्यूँकि दोनों सांवले है ..लेकिन हमारा मकान मालिक भी सांवला है खैर भला आदमी है मेरे पीठ पीछे ही घर आता- जाता है .....
टक्कर यूनिवर्सिटी से बी .कॉम किया था इसलिये एक सस्ते गल्ले वाले का हिसाब -जवाब रखने की जॉब मिल गई ...मेरे मुँह आगे सब शांत था लेकिन पीठ पीछे सब पिचका और फूला ...
जानेमन जमीला की मुहब्बत के चलते मैंने गली , बस्ती , तहसील ,जिला और यहां तक शहर तक बदल दिया ...लेकिन वो तिनका बराबर भी न बदली...मानता हूँ कम कमाता हूँ ,.लेकिन कोशिश करता हूँ कि जमीला को कभी कोई गम न हो ..जमीला की बेलगाम हसरतों के चलते एक टायर बनाने वाली कम्पनी में नाइट शिफ्ट में काम करना शुरू कर दिया ..सुबह फजर की नमाज के बाद देहलीज पार करा मेरा वुजूद फिर तीन चौथाई निपट चुकी रात के गुजर जाने के बाद ही वापस देहलीज के अंदर पहुँचता है ....
मेरे घर में दाखिल होते ही मेरी मासूम छुटकी की आँख खुल जाती है ...आँख खूब घुमाती है जैसे कहती हो अब्बू रोटी खाकर ही सोना .,,ठण्डी रोटी हाथ में लिए मैं गर्म रजाई में बेखबर सोती  जमीला को देखता हूँ ...
और देखता हूँ उसके तकिये के बराबर में एक महँगा स्मार्ट फोन ..,जो मेरी कमाई से मुमकिन नही ..पास खड़ी अलमारी में झांकती महँगी साड़ियों को ..जिसका एक तार खरीद नही सकता मैं ..,तीन तरह के इत्रों से महकते जमीला के बदन को ...फिर महसूस करता हूँ खुद की खस्ता हाल कमीज से दो तरह के आते पसीने की बू को ....
बच्चे यतीम से है मेरे और जमीला बहुत से भ्रमरों से घिरी,,. लोगों के फिकरे उनके ठहाके अब मेरा मुकद्दर है ...इश्क अँधा होता है जानता हूँ लेकिन इश्क इतना जलील और बेवफा भी हो सकता है खबर नही थी ....माना एक मर्द ही अक्सर घर बरबाद करता है लेकिन एक औरत भी ठान ले तो कई जिंदगियाँ बर्बाद कर सकती है ..,,आखरी बार मुझे रोकती अम्मी और उनका चेहरा ..,अब्बू की खामोशी,,,बहन की सिसकियाँ और दोस्तों का समझाना ..,सब याद आता है ..,लेकिन सबसे जियादह याद आता है अपनी बर्बादी का वो पहला पल जब पहली बार जानेमन  जमीला को देखा था  ...

Wednesday, August 22, 2018

मीना

मीना अक्सर स्कूल जाने के नाम से झिझकने लगी है क्यूँकि स्कूल का रास्ता बाजार से होकर गुजरता है ....
बाजार जो खड़ा है समाज के खोखले उसूलो और उनके रसिक मिजाज की बेहुदा ,बदबूदार ईटों पर .....
नुक्कड़ की तंग गली से होकर जैसे ही मीना सामने वाले चौक की दीवार को देखती है एक बेहद अश्लील विदेशी और संगत देशी फ़िल्मी पोस्टर उसे नजर नीचे करने पर मजबूर कर देता है ..फिर मनचलों के  बेशर्मी से लबालब फिकरे उसके आत्मसम्मान के परखच्चे उड़ा देते है ...थोड़ा और आगे जाकर एक हाईटेक शोरूम के सामने एक महिला और पुरुष का अंडर गारमेंट्स का फ़ूहड़ आदमकद इलेक्ट्रोनिक प्रिंट पोस्टर उसको अंदर तक हिला देता है .....नजरें नीची करके थोड़ा दूर जाने पर भीड़ से खचाखच प्लेस जहाँ कुछ मौकापरस्त भीड़ की आड़ में शारीरिक छेड़छाड़ करते है वो राह बदल कर दूसरी गली पकड़ती है मगर सामने वाली दुकान पर एक बूचड़ बकरे की गर्दन पर छुरा फेर कर खून का फव्वारा तसले में भर रहा होता है .... वो मासूम ये देख कुछ पल के लिए ठिठक जाती है और चेतना खो देती है तभी पीछे से ऑटो वाले की टू टू से हवाश संभाले वो आगे बढ़ती है और उसकी नाक पर एक मादक बू दखलंदाज़ी करती है और देखती है कि सामने एक शराब की दुकान है जिसके सामने एक शराबी लेटा पड़ा है और उसके बगल में टूटी शराब की बोतल से शराब रिस रही है ....फिर नशेड़ियों  के फिकरों का फ़ूहड़ दौर जिसे वो पीछे छोड़ आई थी .....
कुछ देर चलने के बाद उसे स्कूल नज़र आता है और उसकी जान में जान आती है .......मगर छुट्टी होने से कुछ देर पहले उसका चेहरे का रंग महज इसलिए उड़ जाता है क्यूँकि उसे याद आता है कि उसे ,उसी रास्ते से घर लौटना है जहाँ से चलके वो स्कूल आई थी ....!

Monday, August 6, 2018

रईसी की निशानी

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मेरे पड़ोस में रहने वाले सज्जन नए-नए अमीर हुए हैं। फ्रिज का पानी उन्हें नहीं जमता। कहने लगे चलो मटका खरीद लाएं। उनकी नई कार में बैठा कर हम मटका लेने चले। अब मटका तो कुम्हारों के यहां मिलता है। मगर वे कुम्हारों की दुकान पर जाएं ही ना। पहले सुनारों के यहां ले गए। सुनार सुन कर हंसने लगे। मेरे पड़ोसी ने कहा कि दस हजार का भी मिलता होगा तो लूंगा। मैने कहा कि मटका तो कुम्हार के यहां मिलता है। कहने लगे कि कुम्हार के यहां से तो गरीब मटका खरीदते हैं। जब हमारी प्रदेश सरकार सिंहस्थ के लिए हार्डवेयर वाले से और ऑटो पार्ट्स वालों से आठ सौ रुपये का मटका खरीद सकती है, तो मैं घर के लिए क्या दस हजार रुपये का मटका नहीं खरीद सकता। लिहाजा वे मुझे लिए पूरे शहर में भटकते रहे। मैं भी छुट्टी में था, तो सोचा चलो उनकी एसी गाड़ी का ही लुत्फ उठाता रहूं। दिन भर उन्होंने खिलाया-पिलाया भी। मगर मटका नहीं मिला। आखिर में वे कुम्हार के यहां गए। कहने लगे कि मटकों को यूं सौ-सौ रुपये में मत बेचो। किसी हार्डवेयर वाले के यहां जाओ। वो सात सौ में खरीदेगा। आठ सौ में हम ले लेंगे। हम नहीं लेंगे तो सरकार ले लेगी। कुम्हार को कुछ समझ ही नहीं आया। वो जनाब खाली हाथ लौट आए। मेरे घर पर एक मटका फालतू पड़ा था, मैंने वो उठा कर दे दिया। वे पांच हजार देने लगे, मैंने केवल अड़तालीस सौ लिये। आखिर पड़ोसी का लिहाज भी रखना पड़ता है। हफ्ते भर बाद उन्होंने कहा कि किसी ठेकेदार से मिलाओ एक बाथरूम और बनवाना है। मैंने दसियों ठेकेदार के नंबर दिये। उन्होंने सबको बुलाया। सबसे रेट पूछा और सबको फेल कर दिया। मैंने कारण बताया तो कहने लगे कि इतने सस्ते बाथरूम बना रहे थे कि चार दिन में खराब हो जाते। जब मध्यप्रदेश सरकार ने सिंहस्थ में इतने महंगे शौचालय बनाए और दो दिन भी नहीं टिके, कुछ तो गायब ही हो गए। जो रेट में सरकार ने बनवाए उससे पिचानवे प्रतिशत कम रेट में मैं कैसे बाथरूम बनवाऊं, मुझे तो शर्म आती है। आखिरकार मैंने दो लाख रुपये में उनसे ठेका लिया और सोलह हजार में शानदार बाथरूम बनवा कर उन्हें दिया। हालांकि ये सिंहस्थ में बने शौचालयों से बहुत ज्यादा बेहतर है, जिसके लिए मुझे खेद है। मगर मैं कितना भी पैसा क्यों न बचाऊं इससे ज्यादा लगे ही नहीं। मुझे मध्यप्रदेश सरकार से बहुत कुछ सीखना है। मेरे बहुत दोस्त रईस हैं। कुछ तो सिंहस्थ के कारण ही अमीर बने हैं। मुझे उनकी फरमाइशें पूरी करनी हैं।
    

Sunday, August 5, 2018

वृद्धाश्रम

धड़ाधड़ खुलते वृद्धाश्रम जहाँ ईश्वर के होने का सबल प्रमाण है वहीं हमारी मोर्डिनिटी और डेवलपमेंट का एक सूचक भी .... विचारों , जज्बातों से जियादह चेहरे और लिंग पर रीझने वाला हमारा भारतीय समाज हमें आधुनिकता के शिखर पर स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध है ....
वो महिला जो आज वृद्धावस्था एक अनुभव के मंच से .. 3 घण्टे के कड़े मेकअप के बाद मात्र 3 मिनट बोलने उपस्थित हुई उन्होंने समां लूट लिया ...मात्र 70 सेकंड बाद की उनकी पूरी पंक्तियाँ अन्धाधुन्ध खुलते वृद्धाश्रम को समर्पित थी बोलते -बोलते  40 सेकंड के बाद उन्होंने एक पर्ची डाइस पर रखी और उसमें उनकी स्वयं रचित पंक्तियों को बड़े गम्भीर होकर श्रोताओं से सुनने का आग्रह किया ...
पंक्तियों में कतई दम नही था और न कोई निष्कर्ष लेकिन हुश्न देख लोटा डुबाने के शुभेच्छु उसमें जबरन जज्बात .. आत्मसात कर मचल उठे ...वाह ..वाह की सदायें और वन्स मोर की आवाजें महोदया को वक्ता कम एक कलाकार होने का बोध कराने लगी तो वो मंच से उतरने लगी तभी संचालक महोदय लपक के पास हो लिए और कामुकता से  बोले मैडम पंक्तियाँ करारी थी ....महोदया ने कातर स्माइल दी और जैसे ही सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी उनको पूरा आदमकद देखने और गज गामिनी की भांति गति करने के दृश्य के लोभ के संवहरण से मुख्य अतिथि महोदय भी झूला कुर्सी से किसी बहाने चार हाथ ऊपर हो लिए .....
उक्त महोदया के बाद एक वृद्ध  ने मंच पर पदार्पण किया और उनकी तीन पंक्तियों के बाद ही आधी पब्लिक को पेशाब लग गया आधी गुटखे ,चूना -खैनी में बीजी हो गए ...आधे चाय वाले को हाथ से इधर आ बे वाला इशारा करने लगे ...जनानियां फेसबुक में नोटिफिकेशन टटोलने लगी ...युवतियां सेल्फ़ी पर कमेन्ट बिनने लगी .. अतिथि महोदय बगल वाले के कान पर चढ़ गए ...संचालक बाँटी जाने वाली पंखियों को नामों से मैच करने लगे ....लेकिन इस पूरे हो हल्ले में दो आँखे और एक जिस्म पूरी तरह मुस्तैद था ...एक ग्यारह -बाराह साला बच्ची खाली कुर्सियों के बीच में नूर की नंगी तजल्ली बनकर चमक रही थी ....दोनों  फूले गालों को हथेलियों से दबाये वो उस वृद्ध का एक -एक शब्द अपने कानों से पी रही थी ...निर्निमेष वो बच्ची इन सब बवाल  हो हुड़दंग से अंजान आँखे फैलाये उस वृद्ध को जैसे मुकम्मल आँखों में कैद करना चाह रही थी ...वृद्ध भी समझ गए कि उनके विचार , उनकी भावनाओं और उनके शब्दों का सामूहिक बलात्कार हो रहा है परन्तु वो डिगे नही खाँसते -हाँफते वो कभी रुक-रुक कर तो कभी अधीर होकर बस बोलते ही रहे ....श्रोताओं ने बीच -बीच में तालियाँ बजाकर उस बूढ़े रेडियों के सेल ढीले करके उसे रोकना चाहा मगर एक चेहरे का सदका काफी था उनकी जुबान की रफ़्तार को बढ़ाने के वास्ते .....
अपनी बात रखते ही वो मंच से उतर गए ...क्या -कहा , किस प्रकरण में कहा खुदा जाने लेकिन नन्हें हाथों की तालियाँ उनके इस्तकबाल में अब भी बज रही थी ...उन्हीं नन्हे मासूम हाथों को थाम वो तात्कालिक माहौल से जल्दी दूर निकलने लगे ...पीछा करना वाजिब था नही तो मेरी पोस्ट मुकम्मल कैसे होती ....सड़क पर पहुँचते ही उस वृद्ध ने उस नन्ही ऊर्जा और को कुर्ते की जेब से निकालकर एक रुक्का (खत) दिया ..कुछ एक सस्ती टॉफी ...कुछ गेर की किशमिश ...कुछ फूल की पन्खुड़ियाँ उसके सर पर रखी ..... और  उसे फिर हॉल के गेट तक छोड़कर दूर  बस दूर निकल गए ..... वो बच्ची उसी  कातर आधुनिक  महिला कवयित्री के पास वाली सीट पर जाकर बैठ गई ....... और उक्त महिला उस बच्ची से बोली दादा जी चले गए क्या .........? उसने हम्म कहकर सर हिलाया और धप्प से कुर्सी के एक पाये पर सर टेक आँख मूँद ली लेकिन एक चिट्ठी  अब भी उसके सीने के पास सुलग रही थी ....खुदा जाने मजमून क्या होगा लेकिन लिफाफे में हैप्पी बर्थ डे अरु लिखा था  ....

Thursday, August 2, 2018

औरत

डॉक्टर सरोज सिंह (साइकेट्रिस्ट ) काठियावाड़ ,गुजरात कहती है कि लोग गलत कहते है कि औरत को नही समझा जा सकता ।शर्त महज इतनी  है कि औरत को समझना हो तो समझने वाले को कुछ औरत बनना पड़ेगा ...
मैं बहुत हद तक एडमायर करता हूँ उनकी थ्योरी लेकिन एक पचड़े के जवाब में वो कोन्सियस और इनकोन्सियस की बोर और पकाऊ बातें कर सारी लिसनिंग की लंका लगा देती है ।इन्ही बातों और एस्ट्रोनॉट कॉन्सेप्ट के चलते भारत में मनोविज्ञान का स्थान बाबाओ , ओझाओं और तांत्रिकों ने ले लिया ...
मैंने उनसे पूछा था कि " क्या एक औरत शादी के बाद किसी गैर मर्द से सच्चा वाला प्यार कर सकती है ..?"
ये सवाल इसलिए कि फेसबुक में 9 महीने पूर्व जुड़ी एक महिला मित्र जो अब मेरी घनिष्ठ मित्र है ..उन्होंने अपनी आप बीती सुनाते हुए इकरार किया कि उन्हें आज साढ़े सैंतीस की उम्र और दो बच्चों के बाद सच्चा प्यार हो गया है और वो भी कुछ दो साल पहले फेसबुक में उनसे जुड़े एक 27 वर्षीय युवा से ।
इन्हें यकीन है कि मैं इन्हें कोई रास्ता दिखा सकता हूँ लेकिन इन्होंने जो रास्ता चुन लिया है वो इन्हें अब सिर्फ बर्बादी की जानिब ले जायेगा...ये भी खूब समझती है लेकिन बस बहे जा रही हैं...
लेकिन इनमें सिर्फ इनकी गलती ढूँढी जाये तो अन्याय होगा ..16 साल पहले जब ये इच्छाधारी युवती हुआ करती थी तब इनके तमाम आशिकों की फेहरिस्त में इन्होंने उस योग्य आशिक का चयन किया जिन्होंने इनके लिए बस शिव धनु नही तोड़ा बाकि जान देने के ...हमेशा साथ रहने के ..तन्हा न छोड़ने के खालिस देशी लवर वादों की परम्परा निभाई.... ये इस लौंडे का हाथ पकड़ के फरार भी हो गई ...शादी के उन दिनों जब तक बच्चे की आहट पेट में नही पड़ी प्यार भी जवान रहा और जिस्म भी ...लेकिन फिर हासिल को कभी भी चबा लेने वाले भारतीय पुरुषवाद ने इनमें धीरे-धीरे अपनी अरुचि दिखाने का रंग प्रारम्भ किया...जिसके रंग से ये बेरंग तो हुई लेकिन अब दिन भर बच्चे और दिवार घूरने के इतर इन्हें सिर्फ हासिल हुआ तो एक सन्नाटा ...आशिक के ठेठ पति बन जाने पर कभी लिपस्टिक , पॉउडर का बाय हार्ट प्राइज़ याद रखने की इनकी अद्भुत शक्ति एवं कौशल का तेजी से पतन हुआ एवं उसका स्थान भिन्डी ,करेले और बैगुन के बढते -चढ़ते दामों ने ले लिया ...ये सब चलता रहा और भारत में मोबाईल क्रान्ति ने दस्तक दी अपरिचित लोग आपस में एक मिस कॉल से जुड़ने लगे ...घड़ी की सुइयाँ रिश्तों को बनाने बिगाड़ने लगी फेसबुक के अवतरण ने इस आग में घी का काम किया और अँधेरे में एंड्रॉयड की जलती स्क्रीन ने रिश्तों का कत्ल करने का संगीन इरादा तय कर लिया ....एक ही घर के लोग इसके आते ही अबोल और अपरिचित होने लगे ....
औरत को सिर्फ तलवार और प्यार के दम पर जीता जाने वाली थ्योरी लताड़ दी गई और उसके साथ उसमें मोडिफिकेशन करके जोड़ा गया कि औरत को तलवार , प्यार और एन्ड्रोइड के चलते जीता जा सकता है ..
अब 42 का पति जब पूरी तरह एक ही छत के नीचे उदासीन हो गया तो उसकी काट मोबाइल के नोटिफिकेशन ने करनी शुरू कर दी ...
एक अजनबी जो दो साल पहले सिर्फ फोटो पर लाइक करता था आज ये तक जानने लगा कि वो किस कलर के अंडरगारमेंट्स पहनना लाइक करती है ...पति के बिलकुल अज्ञात में गमन की प्रदत्त तन्हाई को ...उस पार से आते मेसेज ...हाय !...आप कैसी है ...क्या कर रही है ...हैप्पी बर्थ डे...दिन भर आपके बारे में सोच रहा था ...उदास क्यूँ हो....खाँसी क्यूँ है ....ने ले ली और प्यार की मयार पर अपनी बुनियाद से खड़ी औरत उस बेल नुमा ढाल की और बढ़ने लगी ..
जरुरी नही कि हर दफा पत्नी की वक्त दिया जाये मगर कायदा तो ये भी नही कि उसे टीवी , फ्रिज की तरह बेजान समझ तन्हा छोड़ दिया जाये ..आखिर है तो वो भी इंसान ...डर है कि एंड्रॉयड के बनते -बिगड़ते रिश्ते उन बच्चों की जिंदगियां न लील ले जो अपने मम्मी -पापा से बराबर का प्यार करते है ....आपको हक है प्यार करने का लेकिन आपको कोई हक नही कि बच्चों की किस्मत पर अपनी मुहब्बत के पासे से दांव लगाये ... याद रखियेगा लाखों की भीड़ में वो एक मर्द बरामद होगा जो आप और आपसे जुड़ी चीजों को सहर्ष अपना ले ...वगरना याद रखियेगा पुरुष तो वो जानवर है कि जब हवश उसके सर पर सवार हो जाये तो उसे औरत के जिस्म पर उसका मंगल सूत्र भी बोझ लगने लगता है .......

छुटकी

कुछ ढाई साल पहले मिली उस छुटकी ..जिसका जिक्र मैंने आज से ढाई साल पहले अपनी पोस्ट में किया था ...आज भी उसका नाम नही बताऊँगा..क्यूँकि उससे एक अपराध हुआ है ..अक्सर जब भी एक रास्ते से गुजरता हूँ ...उसको छूकर ..उसको हिलाकर आता हूँ ...कि कहीं चली तो नही गई ...अब से कुछ 10 दिन पहले सो रही थी जब मिलने गया पेट पर भरती साँस बता रही थी जिन्दा है अब तलक .....
कुछ और साल उससे मिलने जाता रहूँगा ..फिर कसम खुदा पाक की मैं उस गाँव उस  बटिया (कच्ची संकरी पहाड़ी सड़क) मैं कदम नह रखूँगा अपनी आखरी साँस तक ..न उस दिशा को ही कभी लापरवाही की वजह से देखूँगा ....
कच्चे टेड़े रास्ते से जब कुछ बकरियां बीच सड़क पर आ गई ...तब वो उगती सूरज की पहली नहाईं हुई किरन भी जलवा नुमा हुई ...धाप से एक उसकी बकरी का एक बच्चा जब मेरे टायर से कुछ दस इंच ही दूर रह गया ..तब दौड़ती आई ये कहकशा के नूर की तजल्ली ..उसे उठाकर सीने से लगाकर ...एक हाथ से दाईं लटकती लट उठाकर.. इत्मिनान से उसे कान के पीछे चढ़ाकर मुझे ऐसे नजरों से तरेर के डंक मारने लगी जैसे  किसी ने विस्की में नागिन का जहर मिला कर उसकी दो आँखे बना डाली .... मैंने उसकी आँखों में ख़ौफ़ से झाँककर देखा.. लगा जैसे वो आधी तो खुश है लेकिन आधी खफा ...
ऊपर टीले से एक बुजुर्ग ने उसे आवाज लगाई ...अधपका वो बुजुर्ग ,बुजुर्ग नही बल्कि अधेड़ था लेकिन कसरतन वक़्त ने बड़ी बेरहमी से उसको सिलवटों का एक नुजूल पहनाया हुआ था ...वो दौड़ पड़ी मसलन  ओस्ले टी ब्रुथ की कहानी की वो परी जो सूरज डूबते ही नंगे पैर  दौड़ कर जमीन को नापती थी ...बस वैसी ही लगी वो मुझे..लेकिन वो पलटी साहब ..खिलखिलाई फिर रास्तों की पगडंडियों पर खो गई लेकिन उसकी आवाज फिर भी बहुत साफ आ रही थी ....
इस घटना के कुछ साढ़े तीन महीने बीतने पर फिर वो मुझे मिली क्यूँकि मुझे फिर उसे आपसे मिलाना था ...सड़क पर डामरीकरण का काम चल रहा था ट्रैफिक जेम था दोनों साइड्स का ...तभी मैंने आड़ से देखा एक बच्ची कोलतार से भीगी लकड़ी से एक पेड़ पर एक शक्ल जैसा कुछ बना रही थी ...मैं उसे पहचानता इससे पहले जिंदगी मुझे पहचान गई ....मैं उसे " जिंदगी" कहता हूँ अब ..वो झट दौड़ मेरे पास आ गई ...पहले रुकी ...मटक कर मुझे देखा ..अंतिम बार.खूब से पहचाना ...बाइक के बटन सारे दबाये ...पीछे के बैग को खोलने लगी ..एक भी टॉफी नही थी मेरे पास ...पहली बार टॉफी की कीमत बहुत जियादह लगी मुझे ...अब जो उसने मुझे फिर तरेर के देखा उसकी आँखों का समन्दर मुझे बहा ले गया ...वो बुजुर्ग फिर पास आये हौले से बोले साहब बहुत शरारती है ये ...मैंने उसको गोद में लिया बाइक से दूर एक पैराफीट में जाकर बैठे ...उन्होंने बीड़ी निकाली और एक साँस में आप बीती गांव ..टीला ,,रोर ...कबीला सब बताकर अंत में बोले ....ये भी मुझे छोड़ जायेगी साहब !
गिट्टी पर गिट्टी चढ़ाती छुटकी को जैसे झटका लगा और तुरन्त अपने नाना का हाथ थाम उन्हें खींचने लगी ...आगे ले जाकर अपनी कुर्ती से उनके आंसू पोंछना चाह रही थी लेकिन छुटकी कमर से ऊपर ही नही थी नाना के बेवक़ूफ़ कहीं की ...भला आँसू भी कोई पोंछ पाया है आँख से न गिरे बाहिर  तो फिर कलेजे से गिरते है ....
गहरी तलहटी तक जाता देखता रहा उसे ...वो अपने नाना की पीठ पर और बकरियां सबसे आगे ...कुर्र क़ुर्रर्रर्र की आवाज अभी भी गूँज रही थी उसकी ...
AIDS है उसको ...यानि उसके बाप से मिला आशीर्वाद ...जो उसको और उसकी माँ को कुछ 7-8 महीने पहले छोड़ कर सो चुका था ....बीवी भी न बचेगी अब ...वो परी कब तलक जिन्दा रहेगी पता नही ...लेकिन अपनी माँ को रिसते हुए मरते देख वो भी जल्द सो जायेगी ...अब कोई नही गुजरता उनके घर के करीब से ...हा हा हा उधार मांगने वाले भी नही . ...जब पहली दफा पता चला तो मुझ कमीन की भी हिम्मत न हुई थी उसको छूने की लेकिन अब छूकर उसको उसकी रूह को महसूस करता हूँ ...उसके नाना कहते है इसकी माँ भी शरारती थी ऐसी ही ..जिंदगी बेमियादी खांसी और दस्त की वजह से अब घर पर ही रहती है..  ...गांव में जनी ये मासूम ये मासूम फ़रिश्ता बचाया जा सकता था ...ये हो सकता था ...वो हो सकता था ...लेकिन कुछ भी तो नही हुआ ...आखिर में फिर मौत जीतेगी देखते है उसकी गैरत को कितनी शर्म है कब आती है लेने ....
और वो आसमान ..कायनात ...अलाना-फलाना -ढिमकाना का मालिक जिसने मुर्दे उठाये ...पहाड़ हिलाये ..सजदे करवाये ...असुरों  को दलन किया ..अँगुलीमाल का हृदय परिवर्तन किया ...सलीब से चौथा आसमान छूआ ...ये तेगी की वो तेगी की वो कहीं मिले तो खबर कर दियो ...बच्ची जब भी जाये शान से जाये जिंदगी न भी दे सका तो मौत  तो दर्दनाक मत बनाइयों ...बस सोते -सोते दम निकल जाए ... तू भी बदनाम न होगा हम भी विश्वास बनाये रखेंगे तुझपर  ....