मैं मर्द जात कहलाता हू ,
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मैं मर्द जात कहलाता हू ,
नारी पर रौब जताता हू ,
अपने मुताबिक ढ्लाता हू , रुलाता हू ,
नारी है मेरी चरणों की धुल ,
बस इसी बात पर गर्वता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
जब सडको पर वो जाती है ,
मैं नजरो से तीर चलाता हू ,
सिटी बजाता हू हाथ लगाता हू ,
ना माने तो उसके मुह पर तेजाब फैक के आता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
नारी बड़ी समस्या है ,
मेरी है तो ठीक, नहीं तो वैश्या है ,
मंदिर में है तो माता है ,
हाथ जोड़ सर झुकाता हू ,
घर में उसी माता को जूती से पिटवाता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
जब मोहल्ले का वो रावण ,
मदिरा पीकर आता है ,
अपने घर की नारी पर लाठी हाथ चलाता है ,
मैं अपने घर के दरवाजे बंद कर ,
चैन की नींद सो जाता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
पडोसी की उस छोटी सी गुडिया को ,
देख के मन ललचाता हू ,
मौका ढून्ढ कर घर बुला के इधर उधर हाथ लगाता हू ,
ना मौका मिले तो मुह दबा स्कूल से उसे उठाता हू ,
कुकर्म कर वही कही खेतों में दफना आता हू ,
मैं वही हू जो मर्द जात कहलाता हू ,
उस प्यारी सी दुल्हन को ब्याह कर घर लाता हू ,
सोने में तुलवाता हू चांदी भी मंगवाता हू ,
फिर भी भुझे न प्यास तो आग उसे लगाता हू ,
प्यार की उस सूरत को जिंदगी भर सताता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
माँ की किसी लाडली को जब छः छः वहसी खाते है ,
मैं द्वेष में आ ,झंडा उठा , इंडिया गेट पे कंडेल जलाता हू ,
फिर घर जाते हुए कन्या दिखे ,
तो फिर जोर से सिटी बजाता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
राम रहीम भी शरमाते होंगे ,
ये मुर्ख किस बात पे गर्वता है ,
किस मूर्खता से खुद को मर्द बताता है ,
जिस कोख से निचे आता है ,
फिर उसी कोख को कटवाता है ,
चरणों में बिठाता है, घर घर में पिटवाता है ,
कुछ और नहीं तो ये सब होता देख भी गर्व से मुह उठा आगे निकल जाता है ,
किस बात पे ये गर्वता है ,मर्द कैसे ये कहलाता है
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मैं मर्द जात कहलाता हू ,
नारी पर रौब जताता हू ,
अपने मुताबिक ढ्लाता हू , रुलाता हू ,
नारी है मेरी चरणों की धुल ,
बस इसी बात पर गर्वता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
जब सडको पर वो जाती है ,
मैं नजरो से तीर चलाता हू ,
सिटी बजाता हू हाथ लगाता हू ,
ना माने तो उसके मुह पर तेजाब फैक के आता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
नारी बड़ी समस्या है ,
मेरी है तो ठीक, नहीं तो वैश्या है ,
मंदिर में है तो माता है ,
हाथ जोड़ सर झुकाता हू ,
घर में उसी माता को जूती से पिटवाता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
जब मोहल्ले का वो रावण ,
मदिरा पीकर आता है ,
अपने घर की नारी पर लाठी हाथ चलाता है ,
मैं अपने घर के दरवाजे बंद कर ,
चैन की नींद सो जाता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
पडोसी की उस छोटी सी गुडिया को ,
देख के मन ललचाता हू ,
मौका ढून्ढ कर घर बुला के इधर उधर हाथ लगाता हू ,
ना मौका मिले तो मुह दबा स्कूल से उसे उठाता हू ,
कुकर्म कर वही कही खेतों में दफना आता हू ,
मैं वही हू जो मर्द जात कहलाता हू ,
उस प्यारी सी दुल्हन को ब्याह कर घर लाता हू ,
सोने में तुलवाता हू चांदी भी मंगवाता हू ,
फिर भी भुझे न प्यास तो आग उसे लगाता हू ,
प्यार की उस सूरत को जिंदगी भर सताता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
माँ की किसी लाडली को जब छः छः वहसी खाते है ,
मैं द्वेष में आ ,झंडा उठा , इंडिया गेट पे कंडेल जलाता हू ,
फिर घर जाते हुए कन्या दिखे ,
तो फिर जोर से सिटी बजाता हू ,
मैं मर्द जात कहलाता हू ,
राम रहीम भी शरमाते होंगे ,
ये मुर्ख किस बात पे गर्वता है ,
किस मूर्खता से खुद को मर्द बताता है ,
जिस कोख से निचे आता है ,
फिर उसी कोख को कटवाता है ,
चरणों में बिठाता है, घर घर में पिटवाता है ,
कुछ और नहीं तो ये सब होता देख भी गर्व से मुह उठा आगे निकल जाता है ,
किस बात पे ये गर्वता है ,मर्द कैसे ये कहलाता है
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