Sunday, September 22, 2013

इस दुनिया में हिन्दू तो पहले से हैं,लेकिन मुसलमान बाद में क्यों बने...???

प्रश्नः इस दुनिया में हिन्दू तो पहले से हैं,लेकिन मुसलमान बाद में क्यों बने...???

उत्तरःमानव इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि इस धरती पर अलग अलग विभिन्न मानव नहीं बसाए गए अपितु एक ही मानव से सारा संसार फैला है। निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान दें, आपके अधिकांश संदेह खत्म हो जाएंगे।
सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है, ईश्वर ने सर्वप्रथम विश्व के एक छोटे से कोने धरती पर मानव का एक जोड़ा पैदा किया जिनको आदम तथा हव्वा के नाम से जाना जाता है। उन्हीं दोनों पति-पत्नी से मनुष्य की उत्पत्ति का आरम्भ हुआ जिन को कुछ लोग मनु और शतरूपा कहते हैं तो कुछ लोग एडम और ईव जिनका विस्तारपूर्वक उल्लेख पवित्र ग्रन्थ क़ुरआन(230-38) तथा भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व खण्ड 1 अध्याय 4 और बाइबल उत्पत्ति (2/6-25) और दूसरे अनेक ग्रन्थों में किया गया है। उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम कहते हैं जो आज तक सुरक्षित है।
ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें। वह हर देश और हर युग में भेजे गए, उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती है, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ति-पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं, उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं।
परन्तु उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखें सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना आदि।
लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं। फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाली तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की सन्तान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता है कि उन्हों ने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार की थी तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया।

बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया।

इसे यूं समझिए कि यदि कोई पत्रवाहक एक व्यक्ति के पास उसके पिता का पत्र पहुंचाता है तो उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके परन्तु यदि वह पत्र में पाए जाने वाले संदेश को बन्द कर के रख दे और पत्रवाहक का ऐसा आदर सम्मान करने लगे कि उसे ही पिता का महत्व दे बैठे तो इसे क्या नाम दिया जाएगा....आप स्वयं समझ सकते हैं।

ऐसा ही बिल्कुल संदेष्टाओं के साथ भी हुआ।

जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा तो ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है । उनके समान धरते ने न किसी को देखा न देख सकती है। वही कल्कि अवतार हैं जिनकी हिन्दु समाज में आज प्रतीक्षा हो रही है।

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