एक गर्भवती महिला थी उत्तरखण्ड के सीमांत क्षेत्र त्यूनी में, अस्पताल में डॉक्टर के अभाव के चलते हिमाचल को जा रही थी लेकिन पैदल चलते चलते नदी के बीच पुल पर ही बच्चे को जन्म दे दिया। स्थानीय महिलाओं ने अपने दुपट्टे से घेरा बनाकर उस महिला को बचा लिया। अस्पताल प्रशासन पर यह भी आरोप सुनने में आ रहा है कि महिला अनुसूचित जाति की होने चलते इतनी उदासीनता रही और उसे वहां से चले जाने को मजबूर किया। यह घटना शर्मसार कर देने वाली है। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य और सड़क असुविधाओं के चलते प्रतिवर्ष सैकड़ों जाने चली जाती है।
सड़कें बन चुकी है लेकिन जमीन पर लकीर खींचने को सड़क बनना नही कहते हैं, गड्ढों के बीच सड़क बची हुई है और उनमें बसों का बंदोबस्त नही। हजारों लोग अकाल मृत्यु हर वर्ष मरते हैं, स्कूल के लिए बच्चों को 10 से 20 किमी तक का भी पहाड़ी रास्तों का सफर तय करना पड़ता फिर भी उन स्कूलों में अध्यापक मौजूद नही है ऐसे में शासन, प्रशासन मौन है जनता दो मिनट की संवेदना प्रकट करती है, नेताओं को जिम्मेदार बताकर, अपना रोष प्रकट करते फिर वापस अपने दो वक्त की रोटी की जुगत में लग जाते हैं।
हम यह सोचकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं कि हम कर भी क्या सकते हैं! पुरे देश में राजनीति अपने घृणित सोच व कर्म से गुजर रही है ऐसे में आम जनता को अपना नजरिया और कर्तव्य याद करना होगा। जब जब कोई व्यवस्था समाज पर हावी होती है तब समझ लेना चाहिए कि उसके पतन की शुरुआत हो चुकी है। भारतीय राजनितिक ढांचे को बदलना अति आवश्यक हो गया है और लोकतान्त्रिक मूल्यों को नए सिरे से स्थापित करने की सख्त जरूरत है।।
इस घटना को एक साल बीता मगर कोई भी सुधार नहीं हुआ
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