Monday, October 1, 2018

सादगी

"" पिंकी देख-देख बच्चा हमारा पुराना मकान देख न बेटा देख ....अरे !क्या हुआ ..स्कूटी क्यूँ रोक दी  ....?

" दादी देख नही रही हो आगे जैम लगा है .....मैंने पहले कहा था कि जल्दी चलो ...जल्दी चलो ..पर आप हैं न ......

" मेरी गुड़िया.. बेटा ... वो मेरा पाठ करने का समय था ....."

" दादी एक पाठ नही करती तो क्या भगवान रूठ जाते आपसे ...ओह शिट ...भैय्या क्या हुआ है जैम क्यूँ लगा है ......?

" वो आगे शायद कोई एक्सीडेंट हुआ है ....

" लो दादी अब आप को ख़ुशी हुई ....एक तो पूरा दिन बर्बाद ऊपर से धूप ...जानती है मेरी स्किन कितनी सेंसेटिव है ...एंड ऑयली आल्सो ...सारे मेकअप की वाट लगा दी आपने ....कहीं सेंडी मेरी ये हालत देखकर डेट रिजेक्ट न कर दे !

" बच्चा तभी कहा है लाइट मेकअप किया करो  ...एलोविरा में शहद मिलाकर..या फिर मुल्तानी मिटटी में थोड़ी हल्दी .के साथ....

" इनफ  ..ओके इनफ ... दादी प्लीज ..अब आप शुरू मत हो जाना.. अपने बाबा आदम नुस्खे लिए ...यू डोंट नो एनीथिंग... आप जानती  हैं मेकअप किसे कहते है...नाम सुना है शहनाज प्रोडक्ट ...लैक्मे ..गार्नियर ..कोस्त्रो ..सोरेमन एक्सेस्ट्रा.....कभी किसी लड़के को अट्रेक्ट भी किया है या हमेशा बहनजी लुक ही रहा आपका ...जानती है लड़के कैसे पीछे भागते है ...

पिंकी की बात दादी को किसी चाबुक सी लगी या किसी मीठी छुरी सी ..ये वो जाने लेकिन उनकी नजर अब अपने पुश्तैनी मकान के छज्जे पर थी ...जहाँ एक बला की हसीन और कातर लड़की अपने भीगे बालों से पानी के रेशे जमीन पर उतार रही थी ....वो छींठ जिस आते -जाते हुए के ऊपर गिरते वो बड़ी सख्ती और तरेर के ऊपर देखता लेकिन एक बार जो देखता फिर देखता ही रह जाता ...... तभी दादी नजर फ़िराती है और उस लड़की के छज्जे के ठीक सामने वाली चाय की दु।कान पर नजर फेरती है .......
" जैसे ही उस छज्जे वाली लड़की की नजर भी उस चाय की दुकान पर खड़े मनचलों ..शोहदों से टकराती है ...वो मनचले आह भरके रेडियो ऑन कर देते है.....

" चढ़ती जवानी तेरी चाल मस्तानी ......

कुछ देर बाद वही लड़की सीढ़ियों से नीचे उतरती है ....गली-गली से लड़कों का एक सैलाब उसके पीछे हो लेता है ...अपनी सहेली अंजू का वेट करते हुए फिकरे पड़ने लगते है .....

कोई मस्कारे को छेड़ता है ..तो कोई आँखों के काजल को बरखा का बादल बताता है ...कोई होंठो को गुलाब के रस में भीगी नज्म तो कोई गालों को दूध में घोटा केसर ...कोई जुल्फों को रेशम के धागे तो कोई..काजल की डिबरी में रंगा सूत का जाल बोलता है....कोई सोबिया लिबास की चुन्नट गिनता तो कोई दुपट्टे के गोटे में दिल का दाँव लगाता है..कोई पैर की लोपड़ गिट्टी नागरा को शम्स ए समान पुकारता तो कोई कलाइयों की चूड़ियों को रुनझुन करती नूर की आयतों का टकराव कहता ..कोई बालों में जड़ी हेयर पिन को टूटा हुआ तारा बोलता तो कोई दूसरे को दुरुस्त करके उसे छींट ए आतिश ...

कमर की नाप पर सब बेमाप थे और जिस्म को चेहरे से मिलाती गर्दन पर सबका ईमान फिसलता था........

बरकत दर्जी जो सावित्री के मुँह बोले भाई थे
इस भीड़ को हुड़क देकर छांट रहे थे
......

लेकिन सावित्री की नजर और  दिल अपने आशिकों की भीड़ में उस मरगिल्ले ..चश्मे वाले लौंडे पर टिकी थी ....जिसे वो प्यार ही नही उसपर ऐतबार भी करती थी ...क्यूँकि वही इकलौता था इस भीड़ में जिसने कभी उसको आँख उठाकर नही देखा ....न कभी उसके जिस्म में अपनी नजरें रगड़ी ....न कभी उसके श्रृंगार को कोई भाव दिया ....

सावित्री जानती थी कि वो दुबला घोंघा उससे इश्क तो करता है मगर कहने से डरता है ....किसी मनचले ने सावित्री की नजरें ताड़ ली ....लेकिन आज वो हड्डियों का ढाँचा जरूर सावित्री को कोई रुक्का कोई खत देने आगे बढ़ रहा था ...तभी मनचलों में से एक ने सावित्री के दो भाइयों को बुला लिया ....और उस पहले से मरे लौंडे की खूब ठुकाई हुई ...उसी दिन फैसला हुआ कि ये मकान बेच आगे शहर में बसेंगे .....

बरकत ने बड़ी मुश्किल से उस लौंडे की जान बचाई ...खून से सना ..कॉलर फटा ..टूटा चश्मा ..वो लौंडा गज्जब का दहाड़ा और बोला-

" सावित्री मैं लौटुंगा ...क्यूँकि मैंने तुमसे सच्चा प्यार किया है ...इन शोहदों की भीड़ में ...इन घात लगाऊ और जिस्म के प्यासों की जमात में मैंने तुम्हे तुम्हारे रूप ..तुम्हे तुम्हारे श्रृंगार से नही बल्कि मैंने तुम्हे तुम्हारी रूह की सादगी को महसूस करके इश्क किया है ....मैं लौटूँगा सावित्री...मैं लौटूँगा .....

" जैम खुल गया है दादी.. मेरा शोल्डर पकड़ लो ...दादी...दादी  सुन रही हो ..अरे दा .....कहाँ गई ....?

"आदाब बरकत भाई !..... "

"...हें...एहें ..पहचाना नह्ह्....अरे सावित्री  ...सावित्री तुम ....तुम यहाँ ...तुम्हे देखे तो अरसा बीत गया बहन ,,.कितनी बूढ़ी हो गई हो तुम ...एक एक वक्त सिर्फ तुम्हारा और ..तुम्हारे रूप ..तुम्हारे श्रृंगार का था ...लखनऊ की वो कोई लड़की नही उस दौर जिसने तुमसा रूप ..श्रृंगार न इख्तियार किया हो ...और वो कोई लड़का नही जिसने तुम्हारे  रूप श्रृंगार पर अपना सब कुछ न हारा हो ...और......

" बस ...बस ...बस बरकत भाई ...पोती संग आई हूँ ..थोड़ा जाम लगा तो फुरसत मिली .....मुझे बस इतना बता दो कि वो आया था क्या........?

बरकत ने हाँ मैं सर हिलाया और सावित्री ने अपने बहते आँसुओं को अपना चश्मा हटाकर पोंछा ....तभी सावित्री के कँधे में एक हाथ ने दस्तक दी .....और कहा -

" दादी ...मुझे प्राउड है आपपर और प्राउड है खुदपर कि मैं आप की पोती हूँ ......दादी एक मैं हूँ जो रूप श्रृंगार के बनने -बिगड़ने का मतलब सिर्फ किसी को अट्रेक्ट करने से लगाती रही और एक आप हैं जिसने सम्मोहन और वशीकरण वाले एक युग का नेतृत्व किया ....

"बरकत दादा ये मेरी पोती पिंकी ......बच्चा आदाब करो ....!

अब चलती स्कूटी में मंजर चेंज था ...पिंकी जहाँ दादी की जवानी की कहानी के हर मौजू को खोल-खोल कर सुनना चाह रही थी वहीं मन के किसी कोने में खुद को धिक्कार दे रही थी क्यूँकि जिस रूप और श्रृंगार की देवी की वह पोती थी उस देवी की जाने-अंजाने में न जाने कितनी बार उसने इन्सल्ट की थी ..मगर अब उसको लगा कि वो भी दादी के वशीकरण पाश में बंध चुकी है क्यूँकि उसने दादी से कहा -

" दादी ये मुल्तानी मिट्टी किस खेत में मिलेगी ......नवाज़िश
#जुनैद......

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