" बेटा आज 2 अक्टूबर यानि गाँधी जयंती है और तुम यहाँ बैठे हो ....शक्ल से पाकिस्तानी , लंकाई , चीनी भी नही दिखते ......'"
" अब्ब....अबे यार अंकल अखबार पढ़ो आप ...मैं यहाँ बादल फाड़ने आया हूँ या हिलाने ...आप से मतलब ...आप अगर इत्ते ही बड़े गाँधीवादी है तो फिर आप यहाँ क्यूँ बैठे है .... ?"
" बेटा मैं गाँधी हूँ "
" ही ही ही ...और मैं सलमान खान .... पिक्चर चल रही है क्या यहाँ ...उल्लू की आल समझा है मुझे ...पढ़ो यार आप अखबार... पढ़ो अंकल "
" तभी एक व्यक्ति खाकी का कुर्ता पहनकर और सर पर नेहरू टोपी लगाकर आता हुआ दिखता है और सीधे आकर अंकल के पैरों में गिर पड़ता है -
" बापू कलकत्ता सुलग रहा है ...हिन्दू -मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहें है ......बोलिये बापू अब क्या करें...?
अक्ल हवा हुई और तशरीफ़ हवा में कुछ 17 इंच ऊपर हो गई ....मैं कुछ बोलता तभी एक स्त्री सूती साड़ी में पीछे से आई और वो भी बापू सॉरी अंकल के आगे हाथ जोड़ अर्ज करने लगी -
" बापू ... आप यहाँ है और हमनें एक जत्था आपसे मिलने साबरमती रवाना करवा दिया है ....बापू मांउटबेटेन ने ये खत आपके नाम दिया है ....
तुरन्त बेंच से खड़ा हो गया और भौंचक्का होकर उन तीनों को देखने लगा ...
" बापू ...बापू ...बापू ....?
" अरे ! जवाहर इतना शोर क्यूँ मचा रहे हो ....?
इस बार तो अक्ल में नाड़े सी गाँठ पड़ गई और वो उमराव जान के मुजरे की थिरकन लपेट अनन्त पर चल दी ...
और मैं सोचने लगा बताओ मेरे देश के पहले प्रधानमन्त्री आयें है और मैं मात्र खड़ा हूँ ....पहले बापू के चरण पकड़े ..फिर एक अतिरिक्त शख्स के ...बहन जी ने दूर से ही नमस्ते टेक दिया और प्रधानमन्त्री महोदय की तो मेरे नयन आरती उतारने लगे .....तभी बापू बोले
" पटेल और मौलाना नही दिख रहे ..."
" कैसे दिखेंगें बापू ..दोनों नीलामी में गए है ..."
" मैं समझा नही जवाहर ..'
" बापू कलकत्ता में भड़के दंगे और रक्त से तप्त हिन्दू मुसलमानों के शव ..उनकी अंत्येष्टि उनके बच्चों का पालन पोषण ..उनका पुर्नवास उनकी तालीम , उनका स्वास्थ्य आदि आदि के लिए पैसा चाहिये इसलिए पटेल साहब और मौलाना जी ने फैसला किया है कि वो अपनी संपत्ति नीलाम कर देंगे और जो धन इस नीलामी से अर्जित होगा उसे राष्ट्रवासियों की सेवा में अर्पण कर देंगे !
" अरे वाह ! ...लेकिन तुम जवाहर अभी भी अपनी संपत्ति का लोभ न छोड़ पाये और नीलामी से बचके यहाँ चले आये ...( कड़े आर्त स्वर में)
" बापू अगर मेरे पास अब कुछ भी बचा होता तो क्या मैं यूँ पैदल भागते हुए इस तरह हाँफते हुए आप के पास हाजरी लगाता ...मैंने अपना सब कुछ पहले ही दान कर दिया बापू .....अब तो राष्ट्र की सेवा हेतु ये शरीर ही रहा है बस ....
" आँसू छलक आये मेरी आँखों से ...एक निठल्ले चरस का लत्ती ..लौंडियाबाज ..बाप की कमाई का फुकान करने वाले लौंडे से मैं अब एक पल मैं एक क्रांतिकारी युवा बन गया ।तभी वो देवी बोली -
" बापू मेरे पास मात्र मेरा ये मंगलसूत्र बचा है इसको भी मैं राष्ट्र और उसके नागरिकों की सेवा में अर्पण करना चाहती हूँ ...
उस अतिरिक्त सज्जन ने अपनी घड़ी दान की और देश के पहले प्रधानमन्त्री ने अपने गले की चैन ...मैं कैसे पीछे हटता-
" बापू ! मेरा ये ए टी एम जिसका पिन xxxx है..जिसमें कुछ 1 लाख 20 हजार रुपए है मैं देश की सेवा में दान करना चाहता हूँ ...ये मेरा 36 हजार का विदेशी मोबाइल ये रही कानों की सोने की बालियाँ ..ये कुछ नकद 7 हजार रूपये ..ये गले की गोल्डन चैन ये चांदी का ब्रेसलेट ये ...2 तोला चरस ...ये दो डिब्बी सिगरेट ...ये 3200 रूपये का जूता ....ये रेवन सन् ग्लास.. ये कार्लोस की 4 हजार की जींस....ये डेनिम की शर्ट ....ये मेजर कोड तिब्बती बेल्ट ....
" बाकि रहने दो वीर ...ताकि धोती फंसाने के लिए कुछ न कुछ टेक तो रहे.... इस युवा राष्ट्रभक्त को धोती दो बहन सावित्री ...
धोती पहनते -पहनते मन में चलता एक प्रश्न चिल्लम के नशे के बावजूद पूरे होश में बापू से पूछ ही लिया .....
" बापू ये हेयर स्टाइल ..मतलब सर में बाल कैसे आ गए और आपकी धोती , चश्मा ...लाठी कहाँ है .....?
" हे माँ भारती के सपूत ...तुमने भी औरों की तरह मेरी आफ्टर इंडिपेंडेंस वाली फोटो ही जियादह देखी है ...दरअसल ये हुलिया तो मैंने 26 जनवरी 1950 से बनाया था .....तुम कुछ पढ़े-लिखे भी हो न वीर ...?
" इज्जत का फलूदा न हो और बापू मेरी आठवीं फेल का सच जानकर मुझे कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने से न बचे तो कहा -
" हे.. हे... हे बापू मैं तो ऐसे ही मजाक कर रिया था ...."
" हे युवा सन्यासी ..हे दिग्विजय के द्योतक ..हे कल के जनप्रचलित वीरगाथाओं के नायक ...ये समय प्रहसन का नही अपितु धैर्य और ऊर्जा संचित करने का है ...हे राष्ट्रभक्त तो मूँद लो अपनी आँखे ... और अवरुद्ध करो मन में भ्रमण करते किसी भी कुविचार को ध्यान लगाओ सद्चेतना पर ...अवचेतन की गति को बाधित करो ...ध्यान करो ...ध्यान करो ...
ध्यान करते -करते पता नही कब तीन घण्टे की चरसी नींद सूँघ बैठा ...पिछवाड़े पर कुछ दर्द महसूस हुआ तो आँख खुली ....
" क्यूँ बे ...इस पार्क को क्या अपने बाप की ऐशगाह समझा है ..?
.और साले ये धोती पहन के सार्वजनिक पार्क में अश्लीलता क्यूँ फैला रहा है और ये क्या गन्ध फैला रखी है यहाँ ...साले नौटंकी वाला है क्या ...चल समेट ये फ़टी साड़ी.. ये कुर्ता ये टोपी और निकल यहाँ से !"
मैं अब सब समझ गया था ....बापू ..मामू बना गए ...और वो भी अपने बर्थडे के दिन ..26 जनवरी 1950 से पहले ही बापू ने लेटा ले लिया था..और मुझे हुलिया बताया परेड के बाद का ...सच में बापू शिंडी लगा गए मैंने वो सब चीथड़े वो कचरा समेटा तभी पुलिड वाला बोला क्यूँ बे ये दो महीने पुराना अखबार कौन ले जाएगा ...उसको भी होंठ चबा कर बाजू के अंदर अड़ाया ....
पार्क के निकला ही था कि नजर गेट पर बापू की लाठी पकड़ी मूरत पर पड़ी ....और अनायास ही मुंह से निकल पड़ा वाह बापू मैं नशेड़ी ही मिला था ...और वो जो आपके नाम की झूठी कसमें खाते है ..वो जो आप की तस्वीर पर शृगाल से तपस्वी बन पुष्पमाला अर्पित करते है ..वो जो आपके नाम से हुकूमत करते हैं ...वो जो आपसे कोशों नफरत करने के बावजूद भी अपने स्वार्थ हेतु आपको यशोगान करते है ...वो जो आपकी दी हुई आजादी का इस्तेमाल मुल्क को तोड़ने ..औरतों -बच्चियों की इज्जत लूटने .... दंगा भड़काने ..नफरत बाँटने में करते है ...वो जो आपके नाम का स्वांग भरके एक लौंडे को नंगा कऱ देते हैं ....उनपर आपका बस नही चलता ...वाह बापू वाह ..मैंने गुस्से में बापू की लाठी को हिलाया .....तभी उसके निचले मुँह से हीरे झड़ने लगे ...सारे तत्काल समेटे ..और लाठी सीधी की ....और बापू को जय हिन्द सलूट बनाकर कहा -
" बापू राजनीति में तो आपके नाम का प्रयोग कर लोगों को मंत्री बनते .. नेता बनते खूब देखा है लेकिन आज आपके वुजूद का प्रयोग भी लोगों ने हीरे छुपाने में कर लिया है .... वाह बापू आप जिन्दा भी बेअसर नही थे और आज मरके भी असरदार बने हैं ....उसके बाद मैंने वहीं बापू की प्रतिमा के आगे प्रण किया कि मैं जुनैद जब तक पूरे शहर में लगी आपकी प्रतिमा का डंडा हिलाकर नही देख लूँगा तब तक तन से धोती को जुदा नही करूँगा....और मेरे संकल्प को तत्काल पंख और उड़ान दी उन शहरी धट्वे कुत्तों ने जिन्हें मेरे तन पर धोती भी बापू की वेशभूषा का अनादर लग रही थी ....नवाजिश
#जुनैद...........
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