Saturday, October 27, 2018

गर्भवती महिला

एक गर्भवती महिला थी उत्तरखण्ड के सीमांत क्षेत्र त्यूनी में, अस्पताल में डॉक्टर के अभाव के चलते हिमाचल को जा रही थी लेकिन पैदल चलते चलते नदी के बीच पुल पर ही बच्चे को जन्म दे दिया। स्थानीय महिलाओं ने अपने दुपट्टे से घेरा बनाकर उस महिला को बचा लिया। अस्पताल प्रशासन पर यह भी आरोप सुनने में आ रहा है कि महिला अनुसूचित जाति की होने चलते इतनी उदासीनता रही और उसे वहां से चले जाने को मजबूर किया। यह घटना शर्मसार कर देने वाली है। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य और सड़क असुविधाओं के चलते प्रतिवर्ष सैकड़ों जाने चली जाती है।

सड़कें बन चुकी है लेकिन जमीन पर लकीर खींचने को सड़क बनना नही कहते हैं, गड्ढों के बीच सड़क बची हुई है और उनमें बसों का बंदोबस्त नही। हजारों लोग अकाल मृत्यु हर वर्ष मरते हैं, स्कूल के लिए बच्चों को 10 से 20 किमी तक का भी पहाड़ी रास्तों का सफर तय करना पड़ता फिर भी उन स्कूलों में अध्यापक मौजूद नही है ऐसे में शासन, प्रशासन मौन है जनता दो मिनट की संवेदना प्रकट करती है, नेताओं को जिम्मेदार बताकर, अपना रोष प्रकट करते फिर वापस अपने दो वक्त की रोटी की जुगत में लग जाते हैं।

हम यह सोचकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं कि हम कर भी क्या सकते हैं! पुरे देश में राजनीति अपने घृणित सोच व कर्म से गुजर रही है ऐसे में आम जनता को अपना नजरिया और कर्तव्य याद करना होगा। जब जब कोई व्यवस्था समाज पर हावी होती है तब समझ लेना चाहिए कि उसके पतन की शुरुआत हो चुकी है। भारतीय राजनितिक ढांचे को बदलना अति आवश्यक हो गया है और लोकतान्त्रिक मूल्यों को नए सिरे से स्थापित करने की सख्त जरूरत है।।
इस घटना को एक साल बीता मगर कोई भी सुधार नहीं हुआ

Friday, October 26, 2018

ये जीवन है

#मोक्ष
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हाथ हटाइये ! .....मैंने कहा मेरी थाई से हाथ हटाइये ...बुढ्ढे ..खूंसट !

उसने घृणा से मेरे चेहरे को  देखकर ...मेरा हाथ अपनी जाँघों से झटक दिया ...बस मैं ऐसा कोई नही था ...जिसकी थूथकार मेरे चरित्र पर न गिरी हो ....

मेरे कुछ बोलने अथवा प्रतिक्रिया देने से पहले ही बस.. ..बस -अड्डे पहुँच गई ...सभी यात्रीगण उतर कर अपनी -अपनी मंजिल को लौट गए .....!

मैं अशोक वर्धन अब भी उसी बस मैं बैठा हूँ ...क्यूँकि चाहकर भी मैं उससे उतर नही सकता ...वो लड़की यही कोई 16-17 साल के बीच की रही होगी ....मेरी पोती श्रद्धा भी इतनी ही बड़ी है ,, बस खाली हो चुकी है ...बस कंडेक्टर और ड्राईवर भी मेरी चुप्पी और खमोशी से ये समझे की बस में अब कोई नही ....रात का तीसरा पहर है ,,पीछे से एक आगे वाली सीट पर बैठा हूँ ...जहाँ सिर्फ अँधेरा है  घना अँधेरा  ..।।।

मेरे दो जिन्दा पुत्र है , अमित वर्धन और सुमित वर्धन ...इनको जनने वाली अब से दो बरस पहले कुत्ते की मौत मर गई ,,, जब  तक उसका दम  सरकारी हस्पताल में न निकला  ...तब तलक मैंने चैन की साँस न ली ...उसके मरते ही ,,, मैंने अपने बेटे के ड्रायर से रात को एक व्हिस्की की बॉटल चुराई और अपने जीवन साथी के लौट जाने का जश्न मनाया ।।।

दो पैग में ही आदमी औकात से आगे निकल गया ...और  जहाँ खड़ा था वहीँ उल्टी करने लगा ,,, और उसी में गिरकर -घिसकर आँख लग गई .. सुबह अमित ने बड़ी बेइज्जती करके जगाया ..और कहा -

" शर्म करो बाबूजी ..शर्म करो ...आप तो कहते थे कि आपने कभी शराब को हाथ नही लगाया ...आपसे बड़ा ढोंगी और बेशर्म कोई नही देखा... नीचे अम्मा की मृत देह लगी है और आप यहाँ .... ...आप तो अध्यापक रहें है ...क्या यही शिक्षा दी  बच्चों को आपने ....? "

शिक्षा... जैसा घण्टा भी कोई शब्द नही होता ,,,अध्यापक हूँ ..और अपने सम्पूर्ण शिक्षक जीवन  में मैंने सबसे अधिक बलात्कार  इसी शब्द का होते देखा है ..... एक अध्यापक के रूप में , मैं इसलिए भी असफल रहा क्यूँकि ..मैं अपनी सन्तानों को ही शिक्षा नही दे पाया ....

देता भी कैसे ...उस दौर शिक्षक बनने से पहले ही शांति जैसी देवी से विवाह हो गया ,, ..पिता जी के देहांत के बाद , अम्मा , चार बहनों और दो भाइयों की जिम्मेदारी मेरे सर आ लगी ,,, खेती -खलिहानी की ,, बताशे कोरे ,,कांधे में इमली , टॉफी , चूड़ी ,पतंग बेची ,,, और तो और लोगों के घरों में ईंटें भी चढ़ाई ...पिता जी भी शिक्षक थे ...उनके आदर्शों की गहरी छाप थी मुझमें ,,,वो चाहते थे कि मैं भी शिक्षक बनूँ इसलिए इस मजूरी और भागमभाग में भी मैंने पिता जी के सपने को मरने नही दिया ...और आभाव , विपन्नता , संघर्ष की बलि वेदी चढ कर मैंने शिक्षक जैसा पद प्राप्त किया ...लेकिन मेहनताना अब भी फ़क़ीरी था ...परन्तु क्षणिक  सुकून सा हो गया  था....

अम्मा को यमराज ने प्राण हड़प कर निपटाया ...चार बहनों को मैंने ब्याह कर ..भाइयों को पढ़ा-लिखाने शहर भेजा ...कुछ बन गए तो वापिस न लौटे ....

शांति .. तीन फ़टी साड़ीयों ..में शादी के 3 साल काट गई ...और दो औलादें भी जन गई ....समझती थी मुझे ,,, मैं विद्यालय तो वो खेतों में ,, मैं घर में तो वो रसोईघर में ,, मैं बिस्तर में तो वो बर्तनों के बीच ...मैं बेखटक सोया तो वो उठ-उठ कर बच्चों को कम्बल ओढ़ाती ...

उफ़्फ़ और शिकायत और फरमाइश क्या होती है शांति तब समझती जब उसे फुरसत मिलती ...अपने खून से उसने औलादों को सींचा ,,, वो अच्छा  और ताकतवर खा सके तो कंगन गिरवी रखवाकर गाय खरीद लाई मुई ....घी ..दूध ने अपना चमत्कार दिखाया ...उसे बनाने वाली सूखती रही और उसे गटकने और चाटने वाले जिस्म बनाते रहे ....

बच्चों की परीक्षाओं में शांति की भूमिका और प्रभावी हो जाती ...सुबह बच्च्चों को उठाना ...रात उनके साथ जागना ..उन्हें पंखा झलना ...कभी खिड़की के सींकचे से सर टिकाकर 10-7 मिनट की पॉज श्वान नींद ले लेना ...

आज अमित और सुमित क्रमशः बैंक और कृषि विभाग में अफसर के पद पर कार्यरत है ...तो बीवी भी अफसर लाये ...मैं तो उनमें कुछ रत्ती भर एडजेस्ट भी कर लेता हूँ ... मगर उम्र से पहले कोशों बूढ़ी और कमजोर , गंवार शांति डिसमैच कर गई ...

हाँलाकि  शादी के वक्त क्या अनुपम सुंदरी थी मेरी शांति ...और आज उसका रूप किसी श्मशान की आधी भस्म लकड़ी सा हो गया है ....अपनी वही काम की आदत उसने बड़े घर में भी नही छोड़ी इसलिए अमित ,सुमित और उनकी पत्नियों को कभी नौकरानी की कमी  महसूस नही हुई ....मैं अक्सर समझाता था उसे कि चल गाँव लौट चलते है ...पेंशन बहुत है दोनों हँसते -खेलते पल जायेंगे ...लेकिन उसे श्रद्धा यानि अपनी पोती का लालच कभी दुबारा गाँव से नही जोड़ पाया ...श्रद्धा जब तक बच्ची थी दादी की छाती से चिपकी रहती थी ...आज जब वो आधुनिक दुनिया में समाई तो दादी के फ़टे-कटे हाथों से उसे घिन आती है ....

शांति बीमार रहने लगी ...हद से जियादह उसकी तबियत बिगड़ती गई .... अफसर औलादों ने उसके ईलाज का खर्चा बाँट लिया और ये इतना निकला कि उसे सरकारी हस्पताल में एक बैड मिल गया .....

जिंदगी भर घुटते -पिघलते वो मुझे आदमखोर औलादों के बीच अकेला छोड़ गई .....लेकिन मैं खुश था बहुत खुश कि उसे मुक्ति मिल गई  .....

उसकी मृत्यु के मात्र दो महीने बाद मुझे पैरालेसिस अटैक पड़ा ..शरीर का दांया हिस्सा सुन्न पड़ गया ...जब औलादों को मेरी पेंशन लूटने में मेरे दस्तखत की आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने मेरा ईलाज ..मेरे ही पेंशन के जमा पैसे से करवाया ....

महज रत्ती भर फर्क पड़ा ..हिल -झूल कर थोड़ा चल लेता हूँ ...लेकिन हाथ को अपनी इच्छा से  अभी भी कोई हरकत नही दे सकता  ...

उस दिन जब शांति की बारसी पर मैंने अपने पुत्र और उनकी वधुओं को वीकेंड पिकनिक प्लान बनाते पाया ...तो रोया उस दिन भी नही मैं ...सिर्फ  दो कुर्ते ,, शांति की तस्वीर , अपने चश्मे का बक्स , अपना तौलिया , और कुछ किताबें बैग में भरी और अपना दाहिना हाथ , बांये हाथ से पकड़ कर अपने उस कुर्ते की जेब में डाला जो कभी भी फट सकती थी ...उसके बाद  चुपके से मैं उस नर्क से बाहर निकल आया ...

बस में बैठा था ...तभी एक प्यारी बच्ची मेरी बगल में आ बैठी ...श्रद्धा की छवि उसमें नजर आई ...लेकिन रास्ते भर अंदर ही अंदर रोता रहा और खिड़की से बाहर देखता रहा ..तभी मेरी जेब फट गई और मेरा दांया हाथ उस बच्ची की जाँघ पर चला गया ...उसने उसे उठाकर झटक दिया लेकिन मुझे तब पता चलता जब उसमें जान होती ...फिर वो हाथ फिसल कर उसकी जांघ में चला गया .....

हाथ हटाइये ! हाथ हटाइये ...बुढ्ढे ..खूंसट ...!!!!!!!

खैर अब कुछ नही बचा खोने को तो अब बस से नही बस जिंदगी की नैय्या से उतरना चाहता हूँ ....शांति हाथ दे रही है ...वो नवेली दुल्हन सी नजर  आ रही है ....मेरे बाबूजी ...मेरी अम्मा भी उसके साथ है ...मेरे दिल ने मेरी तड़प और उनसे मिलने की प्यास को इस बार अनदेखा नही किया और  एक आखरी  धड़कन मेरे दिल से होकर गुजरी  और मैं स्वयं से मुक्त हो गया ... ......नवाज़िश
#जुनैद.........

Thursday, October 25, 2018

किसका बच्चा

ऑपरेशन थेयेटर से बाहिर निकलते ही ...डॉक्टर ने मुझे बड़ी घूर के देखा और बोले तुम्ही पेशेंट के हसबैंड हो ?

मैनें तुरन्त मोबाइल गैलेरी में जाकर अपनी और शायरा की निकाह वाली फोटो निकाली ... डॉक्टर साहब को दिखाने के लिए

बिना देखे बोले - अरे इसकी कोई जरूरत नही मैं तो बस कन्फर्म कर रहा था ....
खैर छोड़ो मुबारक हो  तुम एक स्वस्थ्य बेटे के पिता बने हो !
Congratulation Dear .

हम झट से पायजामे से बाहर होकर बोले  संकोच और भय से डॉक्टर साहब से पूछ ही बैठे !

" हे हे हे हमपें तो नही गया न डॉक्टर साहब ..?"

डॉक्टर सर पर हाथ रखते हुए बोले ..यार इसी लिए मैंने आपसे कन्फर्म किया कि तुम कौन हो ....

दरअसल यार समझ में मेरी भी नही आता कि आखिर ये कैसे हो सकता है ...?

मैंने डर से कांपते हुए पूछा डॉक्टर साहब आखिर बात क्या है ...?

बोले यार बच्चा न तुम पर गया है न तुम्हारी बीवी पर बल्कि बच्चा तो टोटली यूरोपियन पैदा हुआ है बिल्कुल अंग्रेज सा  ...!

बस न इससे बड़ा जोक कभी सुना न इससे बड़ी गाली ।

तुरन्त फूलपुर वाले ताऊ को फोन लगाया ...

" क्यूँ बे ताऊ ...दिखा दी अपनी औकात ..ले लिया जमीन का बदला ...अबे अंग्रेज की जूठन हमारे गले पड़वा दी बे !

ताऊ ने भी तीन चचा की और दो बाप की गाली देकर फ़ोन स्विच ऑफ़ कर दिया ...

तुरन्त रिक्शा पकड़ा और शबनम चच्ची के घर का दरवाजा पीटा ...
दरवाजा खुलते ही ...

" अबे चच्ची रिश्ता खतम करने आये है यहाँ ..तुम से ऐसी उम्मीद न थी तुमने तो कहा था लौंडिया बड़ी अल्लाह वाली है ...लेकिन ये न बताया कि अंग्रेजी शौक रखती  है ...

चच्ची कुछ बोलती इससे पहले  हमने दरवाजे पर खड़े रिक्शे वाले से बोला ..
" अबे शराफत नगर ले चलो ...रिक्शे से उतरते ही गार्डनिंग कर रहे ससुर के सामने खड़ा हो गया

" अबे शायरा के अब्बा अब मत सोचियो पापा बोलूँगा ..और नाम बदल दो बे अपने मुहल्ले का घण्टे का शराफ़त नगर है ये ....और तुम क्या अंडे गिन रही हो लौंडिया की अम्मी ...अबे तुम तो कहती थी या तो तुम्हारी लौंडिया को फलक का चाँद पसन्द है या हम यानि जुनैद ....ये न बताया कि साला यूरोप भी पसन्द है लौंडिया को ।

रुके न एक पल ...अब रिक्शे से जम्प ली ...
" क्यूँ बे कहाँ भाग रहे हो बे दलाल ...बड़े मियां कहे अब मेरा रामपुरी तुम्हे ...अबे तुमने ही लौंडिया की फोटो दिखाई थी हरामखोर देखना कब्र के कीड़े खायेंगे तुझे ..."

रिक्शे में बैठे - बैठे नसीम खाला पुदीना खरीदती दिखी ...झट से उतरे और ख़ौल के बोले .

".यहाँ पुदीना खरीद रही हो खाला और हमारे खेत में लन्दन का धनिया बो दिया ...तुमने ही कहा था शायरा नही तुम्हे गुलाब मिल रहा है ...खबरदार हमारे घर की देहलीज न चड़ियो"

फिर चढे रिक्शे मैं ...और दाब लिया काजी को ...

" कसम खुदा की एक खून माफ़ होता तो ईमान से तुम्हारा गला उस्तरे से उतार देते आज ...निकाह के वक्त तुम्ही बोले थे शरीफ है लौंडिया तभी कबूल है बोलने में शरम कर रही है ....

रिक्शे से ही फोन किया अपने वालिद की और कहा फोन स्पीकर में लो ।

" अब्बा बोले अरे जुनैद बेटा कहाँ हो .हम कबसे तुम्हारा हस्पताल में तुम्हारा इंतेजार कर रहें हैं...बेटा मुबारक हो तुम बेटे के बाप बने हो "

फिर हम गरजे ।

" ये मुबारकबाद घुसेड़ो अपने हुक्के की कटोरी में ...अबे सुन लियो बे घर वालों बताई दे रिया हूँ तुम सब से आज के बाद मेरा कोई ताल्लुक नही ...तुम सब ने मेरे दुबई होने पर मेरा रिश्ता फिट कराया था न ...अबे तुम अब अग्रेज पोता खिला लियो मैं खुद्दार कुत्ते का पिल्ला पाल लूँगा लेकिन अंग्रेज का न पालूँगा ....

अगला घर ढूंढ ही रिया था ..तभी रिक्शे वाला बोला ...अबे भाईजान अब न चले मुझसे ...पैर दुःख  गए है... मेरा हिसाब करो और कोई दूसरा रिक्शा पकड़ो ..

हाँ तो बोल न कितने हुए ?

किरोड़ीमल हस्पताल से यहाँ तक कुल मिलाकर 320 रुपए ....।

अबे किरोड़ीमल नही छगनलाल से बोल ।

एक ही बात है साहब दोनों सटे हुए है ...?

अबे तो क्या मैं किरोड़ीमल से बाहर निकला ...अबे मेरी लुगाई तो छगनलाल में एडमिट है बे ......

सब फ्लेक बैश में समझ में आ गया ....मैं जल्दीबाजी में किरोड़ीमल में इंट्री कर बैठा और जाते ही ऑपरेशन थियेटर के आगे बैठ गया ....

अपने सूतियापे पे शर्मिंदा होने की जगह मैं अब  ये सोच रहा था ...कि यार जबलपुर की दूर की भाभी ही बची थी जब आखिर में सबसे सॉरी बोलना ही है तो क्यूँ न इससे भी पूछ ही लूँ कि

"क्यूँ री  तू तो कहती कि मैं कभी बाप बन ही नही सकता ........?नवाजिश
#जुनैद.........

महावारी

#माहवारी क्या है?

माहवारी 10-12 उम्र से शुरू होकर 45-50 साल तक स्त्रियों के शरीर में होने वाली स्वाभाविक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है!

इस प्रकिया में मानव शिशु बनने के लिए अनिवार्य अंडा बनता है और उस अंडे के निषेचित होने के बाद उसके पोषण के लिए आधार (परत) तैयार होता है!

लेकिन जब अंडा उस माह निषेचित नहीं होता तो अंडे समेत ये परत शरीर से बाहर स्रावित कर दी जाती है जिससे कि यही प्रक्रिया अगले महीने फिर दोहरायी जा सके! इसी स्राव (जो 4 से 5 दिन तक होता है) को मासिक स्राव कहते हैं!

बस इतनी सी बात है! यह एकदम प्राकृतिक प्रक्रिया है जो अगर न घटित हो तो हम आपमें से कोई नहीं होता! माहवारी कोई बीमारी नहीं, बल्कि स्त्री देह के स्वस्थ होने का प्रतीक है. ये स्राव न तो ‘अशुद्ध’ होता है और न ही अनहाइजीनिक!

इससे जुड़ी भ्रांतियां और #अंधविश्वास:

हमारे समाज में माहवारी को जैसे महामारी ही बना दिया गया है: पूजा मत करो वरना भगवान गंदे हो जायेंगे, गाय को मत छुओ वरना वो बछड़ा पैदा नहीं कर सकेगी, पौधों को मत छुओ वरना उनमें फल नहीं आयेंगे, अचार मत छुओ वरना ख़राब हो जायेगा, किसी देव स्थान या पवित्र जगह पे मत जाओ वरना सब अपवित्र हो जायेगा, शीशा मत देखो उसकी चमक फीकी पड़ जाएगी, मासिक स्राव वाला कपड़ा छुपा के रखो कोई देख लेगा तो?

इसके बारे में घर में सिर्फ़ माँ या बहन से बात करो और किसी से नहीं! समाज में माहवारी के लाल धब्बों को लेकर बहुत ही घटिया मानसिकता है!

मैंने तो यहाँ तक सुना है कि शहरों में कुछ घरों में धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये माहवारी को दवा द्वारा थोड़ा आगे खिसका देते हैं!
हालाँकि कुछ समाजों में पहली माहवारी पे लड़कियों को पूजा जाता है और इस प्रक्रिया को शुभ माना जाता है तो कुछ एक समाजों में घर के दक्षिण में किसी छोटे से दड़बे में दो-तीन दिन के लिए लड़की को बंद कर दिया दिया जाता है! लेकिन अधिकांश तथाकथित ‘सभ्य’ समाजों में ये आज भी माहवारी के साथ शर्म, कल्चर ऑफ़ साइलेंस, अपशकुन, अपवित्रता, अशुद्धता जैसे अंधविश्वास और मिथक जुड़े हैं!

इन भ्रांतियों और अंधविश्वासों का सामाजिक असर:

दरअसल माहवारी स्वास्थ्य का मामला है! इससे जुड़ा शर्म, अंधविश्वास, छिपाने की मजबूरी इसे घातक रूप दे देती है! साफ़ कपड़ा अथवा पैड इस्तेमाल न करने से संक्रमण हो सकते हैं. ये मानवाधिकार का भी मामला है क्योंकि इसके साथ साथ जुड़ी भ्रांतियां, अंधविश्वास, तिरस्कार, भेदभाव इत्यादि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सम्मान के ख़िलाफ़ हैं!

इसके कारण समाज अक्सर महिलाओं की ‘मोबिलिटी’ कम कर देती है, जेंडर-रोल्स तय करता है! ये समाज में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की एक अवैज्ञानिक परंपरागत धार्मिक-मर्दवादी सोच है! आज भी मेडिकल स्टोर से सेनेटरी पैड खरीदने में झिझक देखी जाती है! डॉक्टर सेनेटरी पैड काले रंग की पॉलिथीन में देता है! घर में सेनेटरी पैड पापा या भाई से कम ही मंगाया जाता है! इन सबके कारण आज भी ग्रामीण इलाकों में बहुत सी लड़कियाँ/महिलायें सेनेटरी पैड इस्तेमाल ही नहीं करतीं! 
औसतन 28 दिन की इस प्रकिया से कुल आबादी की 53% स्त्रियाँ गुज़रती हैं! ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के स्कूलों से ड्रापआउट के कारणों में माहवारी को छुपाने तथा इससे जुडी स्वास्थ्य सुविधायें या अलग टॉयलेट न होना भी एक बड़ा कारण है! महिला शिक्षकों या कर्मचारियों को आये दिन असहज इसके कारण असहज अथवा शर्मिंदा होना पड़ता है, कामचोरी का आरोप अलग से! किशोरावस्था व प्रौढावस्था में मासिक स्राव के कारण क़रीब 60% महिलाओं को दर्द हो सकता है लेकिन इससे जुड़ा शर्म, तिरस्कार, अपवित्रता कि सोच इसे स्त्रियों के ऊपर अत्याचार में बदल देता है.

हमें क्या करना चाहिए?

ये सोच बदलना होगा! हम सबको! घर में अपने बच्चों को इसके बारे में बचपन से ही बताना शुरू करें! इतना जागरूक करिए कि जैसे सर दर्द के लिए हम डॉक्टर से क्रोसिन माँगते हैं उसी तरह सेनेटरी पैड मांग सकें! इतना कि भाई बहन के लिए, पिता बेटी के लिए बेझिझक पैड ला सके! बहन खुलकर ये बात भाई और बाप से कह सके! फैमिली में माहवारी के दौरान होने वाला चिड़चिड़ापन, दर्द, मूड स्विंग, क्रंप आदि पर बात करना चाहिए ताकि बेटा आगे चलकर समाज में किसी भी स्त्री के प्रति संवेदनशील बन सके! पुराने घटिया सोच, अंधविश्वास, भ्रान्ति को दूर करें! टैम्पोन, पैड, घर में बने साफ़ कपड़ों का नैपकिन, मेन्स्त्रुअल कप इत्यादि के बारे में जानकारी बढायें! डॉक्टर से सलाह लें और साथ बेटी और बेटे दोनों को ले जायें!
समाज को इतना सहज बनाना होगा कि कोई स्त्री माहवारी के दौरान परेशानी होने पर बेझिझक सीट माँग सके! और अगर लाल धब्बा दिख भी जाये तो हाय-तौबा के बजाय नॉर्मल बात हो! ताकि जब कभी किसी ऑफिस या संस्था में कोई लड़की माहवारी के दर्द के चलते छुट्टी माँगे तो उसपे ताने न कसे जायें, उसपे कामचोरी का बेहूदा इल्ज़ाम न लगे! माहवारी जैसी प्राकृतिक प्रकिया के कारण अगर स्त्री को समाज में सिमटकर चलना पड़े, शर्मिंदगी उठानी पड़े, या असहज होना पड़े तो ये किसी भी समाज के लिए शर्मनाक है! जिस प्रकिया के द्वारा पूरी मानव जात पैदा होती है उसको अपवित्र या अशुद्ध कहना समाज का दोगलापन है! इसे अपवित्र और अशुद्ध कहके आधी आबादी को नीचा दिखाना हुआ! बच्चा जब पैदा होता है तो यही रक्त बच्चे के कान, मुँह, नाक में घुसी होती है जिसको नर्स या दाई उंगली डालके निकालती है. हर बच्चा इसी में सना पैदा होता है! तो सोचो ये अपवित्र या तिरस्कार योग्य चीज़ कैसे हो सकती है? यह स्त्री जननांगों की एक स्वाभाविक जैववैज्ञानिक प्रक्रिया है. ये न तो बीमारी नहीं और न ही समस्या है! इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं!
......शारिक़.....

Tuesday, October 23, 2018

स्वाभिमान

एक छोटी सी कहानी........💞

"रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें, माता_पिता जैंसे सास, ससुर और एक छोटी सी नंनद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहा था,

          आज रेनू बीतें दिनों को लेकर बैठी थी, कैंसे उसके पिताजी नें बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था,

        खैर बात ये नही थी, बात तो ये थी की  रेनू के बड़े भाई ने, अपने माता_पिता को घर से निकाल दिया था। क्यूँकी  पैसें तो उनके पास बचें नही थें, जितने थें उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थें, फिर भला बच्चें माँ बाप को क्यूँ रखने लगें।  रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थें ।😧😧
रेनू आज उनसे मिल के आयी थी, और बड़ी उदास रहने लगी थी। आखिर लड़की थी, अपने माता_पिता के लिए कैसे दुख नही होता, कितने नाजों से पाला था, उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था ।
आज वही माता पिता मंदिर के किसी कोने में भूखें प्यासें पड़ें थे।

         रेनू अपने पति से बात करना चाहती थी । वो अपने माता पिता को घर ले आए। पर वहाँ हिम्मत नही कर पा रही थी, क्यूँकी  उनके पति कम बोलते थे, अधिकतर चुप रहते थे ।  जैंसे तैंसे रात हुई और  रेनू के पति व पूरा परिवार खाने के टेबल पर बैठा था ।  रेनू की ऑखे सहमी थी, उसने डरते हुये अपने पति से कहा,
सुनिये जी, भाईया_भाभी ने मम्मी पापा को घर से निकाल दिया हैं। वो मंदिर में पड़े है, आप कहें तो उनको घर ले आऊ ।
रेनू के पति ने कुछ नही कहा, और खाना खत्म कर के अपने कमरें में चला गया, सब लोग अभी तक खाना खा रहें थे, पर रेनू के मुख से एक निवाला भी नही उतरा था, उसे बस यही चिंता सता रही थी अब क्या होगा ?  इन्होने भी कुछ नही कहा, रेनू रुहाँसी  सी ऑख लिए सबको खाना परोस रही थी ।

        थोड़ी देर बाद रेनू के पति कमरें से बाहर आए  और रेनू के हाथ में नोटो का बंडल देते हुये कहा, इससे मम्मी, डैडी के लिए एक घर खरीद दो, और उनसे कहना, वो किसी बात की फ्रिक ना करें मैं हूं।
रेनू ने बात काटते हुये कहा, आपके पास इतने पैसे कहा से आए जी  ??
रेनू के पति ने कहा, ये तुम्हारे पापा के दिये गये ही पैसे हैं।

मेरे नही थे, इसलिए मैंने हाथ तक नही लगाए।
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वैसे भी उन्होने ये पैसे मुजे जबरदस्ती दिये थे, शायद उनको पता था एक दिन ऐसा आयेगा।

रेनू के सास_ससुर अपने बेटे को गर्व भरी नजरों से देखने लगें, और उनके बेटे ने भी उनसे कहा, अम्मा जी बाबूजी सब ठीक है ना??

उसके अम्मा बाबूजी ने कहा बड़ा नेक ख्याल है बेटा, हम तुम्हें बचपन से जानते हैं, तुझे पता है, अगर बहू अपने माता_पिता को घर ले आयी, तो उनके माता पिता शर्म से सर नही उठा पायेंगे, की बेटी के घर में रह रहें, और जी नही पाएगें ।

इसलिए तुमने अलग घर दिलाने का फैसला किया हैं, और रही बात इस दहेज के पैसे की, तो हमें कभी इसकी जरूरत नही पड़ी। क्यूँकी  तुमने कभी हमें किसी चीज की कमी होने नही दी, खुश रहो बेटा कहकर रेनू और उसके पति को छोड़ सब सोने चले गयें ।

      रेनू के पति ने फिर कहा, अगर और तुम्हें पैसों की जरूरत हो तो मुझे  बताना, और अपने माता_पिता को बिल्कुल मत बताना घर खरीदने को पैसे कहाँ से आए, कुछ भी बहाना कर देना, वरना वो अपने को दिल ही दिल में कोसते रहेंगें।
चलो अच्छा अब मैं सोने जा रहा, मुझे सुबह दफ्तर जाना हैं, रेनू का पति कमरें में चला गया,

             और रेनू खुद को कोसने लगी, मन ही मन ना जाने उसने क्या_क्या सोच लिया था, मेरे पति ने दहेज के पैसें लिए है, क्या वो मदद नही करेंगे, करना ही पड़ेगा, वरना मैं भी उनके माँ_बाप की सेवा नही करूगी ....................🤔🤔
रेनू सब समझ चुकी थी, की उसके पति कम बोलते हैं, पर उससे ज्यादा कही समझतें हैं।
        रेनू उठी और अपने पति के पास गयी, माफी मांगने, उसने अपने पति से सब बता दिया।
उसके पति ने कहा कोई बात नही होता हैं, तुम्हारे जगह मैं भी होता तो यही सोचता।
रेनू की खुशी का कोई ठिकाना नही था, एक तरफ उसके माँ_बाप की परेशानी दूर दूसरी तरफ, उसके पति ने माफ कर दिया,
            रेनू ने खुश और शरमाते हुये अपने पति से कहा,
मैं आपको गले लगा लूं ?  उसके पति ने अट्टहास  करते हुये कहा, मुझे अपने कपड़े गंदे नही करने और दोनो हंसने लगें 🤣🤣🤣
और शायद रेनू को अपने कम बोलने वालें पति का ज्यादा प्यार समझ आ गया,,,,,,,,,,🌱

         "हर मर्द बुरा नही होता,
               गौर करना,
             कुछ अच्छें भी होते हैं.....!!!
                       ✍