Sunday, June 21, 2020

गलवान घाटी

वो #मुसलमान, जिसकी वजह से घाटी का नाम #गलवान पड़ा।
जिस #गलवान_घाटी को चाईना अपनी जमीन बताकर खून-खराबा कर रहा है। उस गलवान घाटी का नाम एक
मुसलमान "#गुलाम_रसूल_गलवान" के नाम पर रखा गया था। #गुलाम_रसूल_गलवान अपनी लिखी हुई किताब में बताते हैं कि जब 1892 में #चार्ल्स_मरे वहां आए, तो गलवान उनके साथ सफ़र पर निकले थे। चार्ल्स डनमोर के सातवें थे। डनमोर आयरलैंड में एक जगह का नाम है। इन्हीं के साथ जब गुलाम रसूल गलवान निकले, तब उनकी उम्र बमुश्किल 14 साल की थी। इस सफ़र के दौरान उनका काफिला एक जगह अटक गया। वहां सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और खड़ी खाइयां थीं। उनके बीच से नदी बह रही थी। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यहां से कैसे निकला जाए! तब 14 साल के #गलवान ने एक आसान रास्ता ढूंढ निकाला, और वहां से #काफिले को निकाल के ले गए।
लद्दाखी इतिहासकार #अब्दुल_गनी_शेख के मुताबिक़, गलवान की ये चतुराई देखकर #चार्ल्स बहुत मूतासिर हुए और उस जगह का नाम #गलवान_नाला रख दिया। गलवान के नाम पर अब वो जगह #गलवान_घाटी कहलाती है।
#सर्वेन्ट_ऑफ़_साहिब्स किताब की खासियत ये है कि ये #गुलाम_रसूल_गलवान की टूटी-फूटी अंग्रेजी में उनके सफ़र नामा को बताती है. गुलाम रसूल गलवान ने अपनी 35 साल के सफरों में #अंग्रेजी, #लद्दाखी, #उर्दू, और #तुर्की ज़बान का बोलना सीख लिया था। बाद में वो लेह में ब्रिटिश कमिश्नर के चीफ असिस्टेंट के ओहदे पर पहुंचे।
उन की पैदाइश 1878 में हुई और 1925 में इंतकाल कर गए।
जिस गलवान घाटी के लिये #चीन और #हिन्दुंस्तान मैं झगड़ा हो रहा है जिसमें हमारे 20 जवान शहीद हो गए। हिन्दुंस्तान कहेता है #गुलाम_रसुल_गलवान हिन्दुंस्तानी था इसलिये वो घाटी भी हमारी है लेकिन चाइना कहे रहा है अगर ये जमीन तुम्हारी है तो कागज़ दिखाओ और ये साबित करो कि #गुलाम_रसुल_गलवान हिन्दुंस्तानी है।
जो लोग कुछ दिन पहेले 20 करोड़ #मुसलमानों से कागज ढुंढने को कह रहे थे, आज वो एक #मुसलमान के #कागज खुद तलाश रहे है।
#अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती है और वो तुम्हारी #साजिशों को तुम्हारे ही मुँह पर मार देता है। वो हर सय पे #कादिर है।

Wednesday, June 10, 2020

शास्त्रीजी और मोदी

शास्त्री और मोदी जी :- #एक_तुलना

अब जब गृहमंत्री #अमित_शाह ने स्वर्गीय #लाल_बहादुर_शास्त्री और #नरेन्द्र_दामोदर_दास_मोदी की तुलना कर ही दी तो आईए कुछ तुलना और हो जाए।

तुलना नंबर -1 शास्त्री जी के 1964 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उनको सरकारी आवास के साथ ही "इंपाला शेवरले" कार मिली थी। जिसका उपयोग वह बिल्कुल ना के बराबर ही करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अथवा विशिष्ट अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी। 

एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। 

शास्त्री जी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई ? और जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया कि लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज। 

शास्त्री जी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा कर दें।

मोदी जी , ₹6880 करोड़ के जनता के पैसे से शानदार लक्जरियस 2 बोईंग विमान खरीद चुके हैं।

तुलना नंबर 2 :- जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे और बम्‍बई जा रहे थे। रेलमंत्री के नाते उनके लिए प्रथम श्रेणी का डिब्बा लगा था। 

गाड़ी चलने पर शास्त्री जी बोले- डिब्बे में काफ़ी ठंडक है, वैसे बाहर गर्मी है। उनके पीए कैलाश बाबू ने कहा- जी, इसमें कूलर लग गया है। 

शास्त्री जी ने पैनी निगाह से उन्हें देखा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा- कूलर लग गया है?… बिना मुझे बताए? 

आप लोग कोई काम करने से पहले मुझसे पूछते क्यों नहीं? 

क्या और सारे लोग जो गाड़ी में चल रहे हैं, उन्हें गरमी नहीं लगती होगी ? शास्त्री जी ने कहा- कायदा तो यह है कि मुझे भी थर्ड क्लास में चलना चाहिए, लेकिन उतना तो नहीं हो सकता, पर जितना हो सकता है उतना तो करना चाहिए। 

उन्होंने आगे कहा- बड़ा गलत काम हुआ है। आगे गाड़ी जहाँ भी रुके, पहले कूलर निकलवाइए। 

मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रुकी और कूलर निकलवाने के बाद ही गाड़ी आगे बढ़ी। आज भी फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे में जहां कूलर लगा था, लकड़ी जड़ी है।

1956 में महबूबनगर के अरियालपुर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत हुई थी। इस पर शास्त्री जी ने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।

मोदी जी के शासन में कितनी जाने गयीं ? इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती , गुजरात से लेकर दिल्ली तक लाशों का अंबार लगा हुआ है पर यह शख्स अपने कुर्ते पर एक शिकन आने नहीं देता।

तुलना नंबर 3- आज़ादी से पहले की बात है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपतराय ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाना था। 

आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री भी थे। उनको घर का खर्चा चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ से 50 रुपए हर महीने दिए जाते थे। 

एक बार उन्होंने जेल से अपनी पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा कि क्या उन्हें ये 50 रुपए समय से मिल रहे हैं और क्या ये घर का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त हैं ? 

ललिता शास्त्री ने जवाब दिया कि- ये राशि उनके लिए काफी है। वो तो सिर्फ 40 रुपये ख़र्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपये बचा रही हैं। 

लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा कि- उनके परिवार का गुज़ारा 40 रुपये में हो जा रहा है, इसलिए उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपए कर दी जाए और बाकी के 10 रुपए किसी और जरूरतमंद को दे दिए जाएँ।

मोदी जी के खर्च की तुलना कर लीजिए ? एक अनुमान के अनुसार केवल उनके शरीर पर कपड़े , घड़ी , पेन , चश्मे और जूते की लागत ₹10 लाख से अधिक होगी।

तुलना नंबर 4 - शास्त्री जी जब रेलमंत्री थे उस वक्त उन्होंने अपनी माँ को नहीं बताया था कि वो रेलमंत्री हैं, बल्कि ये बताया कि वे रेलवे में नौकर हैं। इसी दौरान मुगलसराय में एक रेलवे का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें शास्त्री जी को ढूंढते-ढूंढते उनकी मां पहुंच गईं।

उनकी माँ ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा कि उनका बेटा भी रेलवे में नौकरी करता है , लोगों ने नाम पूछा , माँ ने कहा "लाल बहादुर शास्त्री"।

लोग हैरान रह गये कि शास्त्री जी की माँ को यह ही नहीं पता कि उनका बेटा रेलवे में नौकरी नसीं करता बल्कि रेलमंत्री है।

मोदी जी , प्रधानमंत्री के रुतबे के साथ हर साल कैमरों के साथ माँ हीराबेन से मिलने पहुचते हैं और पूरे देश की मीडिया उनका यह कार्यक्रम लाईव दिखाती है।

तुलना नंबर 5- एक बार शास्त्री जी कपड़े की एक दुकान में साडि़यां खरीदने गए। दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख कर बहुत खुश हो गया। 

उसने उनके आने को अपना सौभाग्य माना और उनका स्वागत-सत्कार किया। शास्त्री जी ने उससे कहा कि वे जल्दी में हैं और उन्हें चार-पांच साड़ियां चाहिए। 

दुकान का मैनेजर शास्त्री जी को एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखाने लगा। सभी साड़ियां काफी कीमती थीं। शास्त्री जी बोले- भाई, मुझे इतनी महंगी साड़ियां नहीं चाहिए। कम कीमत वाली दिखाओ। 

इस पर मैनेजर ने कहा- सर… आप इन्हें अपना ही समझिए, दाम की तो कोई बात ही नहीं है। यह तो हम सबका सौभाग्य है कि आप पधारे। 

शास्त्री जी उसका मतलब समझ गए। उन्होंने कहा- मैं तो दाम देकर ही लूंगा। मैं जो तुम से कह रहा हूं उस पर ध्यान दो और मुझे कम कीमत की साडि़यां ही दिखाओ और उनकी कीमत बताते जाओ। 

तब मैनेजर ने शास्त्री जी को थोड़ी सस्ती साडि़यां दिखानी शुरू कीं। शास्त्री जी ने कहा- ये भी मेरे लिए महंगी ही हैं। और कम कीमत की दिखाओ। 

मैनेजर को एकदम सस्ती साड़ी दिखाने में संकोच हो रहा था। शास्त्री जी इसे भांप गए। उन्होंने कहा- दुकान में जो सबसे सस्ती साडि़यां हों, वो दिखाओ। मुझे वही चाहिए। 

आखिरकार मैनेजर ने उनके मनमुताबिक साडि़यां निकालीं। शास्त्री जी ने उनमें से कुछ चुन लीं और उनकी कीमत अदा कर चले गए।

मोदी जी के ₹10 लखिया सूट के बारे में आपको पता ही 

इक़बाल अहमद के वाल से

Corona fight

बीमार हो जाना अपराध नहीं है. मीडिया ने और नेताओं ने सिर्फ अपनी नाकामी छिपाने के लिए कभी जमाती तो कभी कुछ और बता कर कोरोना पीड़ित को अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया है.  ये मानवता के विरुद्ध अपराध है. 

मैं आज  समाज के सभी लोगों से एक अपील करना चाहता हूं कि जब भी कभी आपके आसपास या पड़ोसी को कोराना के लक्षण मिलें या व्यक्ति या पड़ोसी को क्वारोटाइन या आइसोलेशन के लिए ले जाया जा रहा हो तो उसकी वीडियोग्राफी करके उसे आपराधिक बोध जैसा अनुभव कराने का प्रयास ना करें बल्कि अपने घर के दरवाजे से, बालकनी से या छत से आवाज लगाकर, हाथ उठाकर, हाथ हिलाकर उनका उत्साह बढ़ाएं,हर प्रकार से मदद करें और कहें कि आप जल्द ही ठीक होकर हमारे बीच में फिर से पहले जैसी जिंदगी शुरू करेंगे। उनके जल्द ठीक होकर घर वापसी के लिए शुभकामनाएं दें।
1. उनकी इज़्ज़त करें। नफ़रत नहीं
2. उनके लिए प्रार्थना करें।
3. उन्हें अच्छा पड़ोसी व मित्र होने का एहसास कराएं।
4. Get Well Soon  कहें
जिससे वह अंदर से मज़बूत होकर सबके साथ फिर से जुड़े।
ऐसा करने से उन्हें अच्छा लगेगा साथ ही आपको भी शांति प्राप्त होगी क्योंकि इस स्थान पर हम में से कोई भी हो सकता है।
बीमारी दवा से कम और मनोबल से ज़्यादा ठीक होती है। 
एक-दूसरे का मनोबल बढ़ाएं। ईश्वर से प्रार्थना करें सभी का मंगल हो। सभी स्वस्थ रहें। सबके जीवन में प्रेम और शांति की स्थापना हो। ❤️❤️❤️❤️

धन्यवाद। 🙏🙏

lock down

एक जैसिंडा अर्डर्न है और एक नरेंद्र मोदी है......
आज न्यूजीलैंड कोरोना वायरस से पूरी तरह छुटकारा पा चुका है। वहां की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डन ने बताया कि देश में संक्रमित आखिरी व्यक्ति स्वस्थ हो गया है न्यूजीलैंड की खबर इसलिए भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है क्योकि भारत और न्यूजीलैंड ने एक ही दिन कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में लॉकडाउन का ऐलान किया था।.....आज न्यूजीलैंड ने एक तरह से कोरोना वायरस पर काबू पा लिया है तो इसका श्रेय न्यूजीलैंड की प्राइम मिनिस्टर जैसिंडा अर्डर्न की नीतियों को दिया जा रहा है.और एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री है जो खुद अपने मुँह मिया मिठ्ठू बन कर कोरोना से लड़ने वाले वर्ल्ड के बेस्ट प्रधानमंत्री का अवार्ड अपने गले में डलवा रहे थे जबकि केस लगाता बढ़ते जा रहे थे 

जब इटली की खबर आई तो जैसिंडा अर्डर्न ने कहा था कि जो इटली में हुआ वैसा वह अपने देश में नहीं होने देंगी आज हम भारत में इटली को कही पीछे छोड़ चुके है हमारे यहाँ लॉक डाउन तब खोला गया है जब कम्युनिटी स्प्रेड की सिचुयशन है लेकिन आज हम न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री की बात कर रहे है जिन्होंने सतर्कता और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर कोरोना को हरा कर दिखाया.है  

जैसिंडा अर्डर्न ने मेडिकल एक्सपर्ट्स के साथ 4 सू्त्रीय कार्यक्रम बनाया, जिसमें 43 प्वॉइंट थे। 7 हफ्ते का लॉकडाउन भी रहा लेकिन हर हफ्ते समीक्षा की गई। जैसिंडा अर्डर्न इस पूरे अभियान में कोरोना से लड़ने के लिए फ्रंट लाइन में खड़ी रहीं, न्यूजीलैंड ने कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए अलर्ट के चार लेवल बनाए। पहले चरण में खतरे का अनुमान लगाना और उसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई करना था। जिसके तहत देश की सीमाओं को बंद कर दिया गया। टेस्टिंग पर फोकस किया गया और संक्रमितों की कांट्रेक्ट ट्रेसिंग शुरू की गई। वहीं दूसरे चरण में परिस्थितियों के हिसाब से प्रतिबंधों में छूट दी गई। 7 हफ्ते के सख्त लॉकडाउन की हर हफ्ते समीक्षा की गई। तीसरे चरण में वायरस के रोकधाम के लिए व्यापक स्तर पर प्रबंध किए गए। फिजिकल डिस्टेंसिंग पर जोर दिया गया वहीं, आइसोलेट और क्वारंटीन लोगों की जांच और देखभाल की गई। चौथे चरण में इमरजेंसी सर्विसेज को छोड़कर लोगों को घर में रहने की हिदायत दी गई। सभी सार्वजनिक स्थलों को बंद कर दिया गया और सभी तरह की यात्राओं पर रोक लगा दी गई।

न्यूजीलैंड में कुल 1154 मामले सामने आए। 22 लोगों की मौत हुई। करीब तीन लाख लोगों का टेस्ट हुआ। और आज न्यूजीलैंड ने अपने आपको कोरोना से मुक्त देश घोषित किया है ..........

Wednesday, June 3, 2020

नाजायज़

बिन ब्याही माँ :-

भारतीय क्रिकेटर हार्दिक पांड्या अपनी गर्लफ्रेन्ड नताशा स्तांकोविक के साथ एक चित्र पोस्ट करके सुर्खियों में हैं जिसमें उन्होंने सूचित किया है कि उन दोनों के जीवन में एक तीसरा मेहमान आने वाला है।

यह अद्भुत है।

लोग हार्दिक पांड्या और नताशा स्तांकोविक को बधाई दे रहे हैं , तब जबकि इन दोनों ने अभी तक विवाह नहीं किया है।

पूर्व में ऐसे संबन्धों से जन्में बच्चों को ही "हरामी" या "हराम की औलाद" कहा जाता रहा है , ऐसी माँ को कुलटा कुलक्षिणी और चरित्रहीन कहा जाता रहा है पर अब आज के समय में यह सब बधाई के पात्र हैं।

निंदनीय है "सफूरा जरगर" जो 2018 में अपने विवाह के बाद जनवरी में गर्भवती हो गयी है , और वह अब आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद है।

आप यह मत समझिए कि संघ ने केवल भारतीय समाज का विभाजन ही किया है बल्कि उसने अपने समर्थकों को बुद्धीविहीन करके "जोम्बी" बना दिया है।

यही कारण है कि बिनब्याहे "नताशा-हार्दिक" को गर्भवती होने की बधाई देने वाले ऐसे ज़हरीले पिस्सू "सफूरा जरगर" के चरित्र पर सवाल उठा रहे थे।

हकीकत यह है कि यह सभी एक तरह के "राजनैतिक कीड़े" बन चुके हैं जिनका हर आकलन , हर नैतिक और अनैतिक , हर हलाल और हराम कामों के आकलन का आधार केवल और केवल अपने आका के राजनैतिक हानि और लाभ के आधार पर होता है।

इनको ना नैतिकता से कोई मतलब होता है ना देश से ना अपने देश की संस्कृत से , यह इसमें ही खुश हैं कि सीएए के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रहा "शाहीन बाग" बिना किसी परिणाम को हासिल किए खत्म हो गया।

यह इसमें ही खुश हैं कि सीएए विरोध से जुड़े सभी क्रांतिकारी एक एक करके दिल्ली दंगों में आरोपित करके यूएपीए में अंदर किए जा रहे हैं , तब जबकि देश एक महामारी की चपेट में है।

यह ज़ोम्बी इशरत जहां , आसिफ इकबाल तन्हा, गुलफिशा खातून, सफूरा जरगर, मीरां हैदर, शिफा उर रहमान, ताहिर हुसैन,खालिद सैफी, नताशा नरवाल ,उमर खालिद , डाक्टर कफील और शरजिल इमाम को जेल में देख के खुश होता है तब तो और जबकि उसे पता है कि असली अपराधी कौन है ?

ऐसे ज़ोंबी , दिल्ली दंगों के सुत्रधार कपिल मिश्रा , अनुराग ठाकुर , परवेश वर्मा , रागिनी तिवारी , रामभक्त गोपाल , कपिल गुर्जर को सरकार द्वारा सुरक्षा और संरक्षण देने से ही खुश हो जाते हैं।

इनको देश से भी मतलब नहीं जिसकी अर्थव्यस्था की बर्बादी की कहानी "मूडीज़" बयान कर रहा है और पिछले 21 वर्ष की सबसे बर्बाद अर्थव्यवस्था बता रहा है। इनको इससे खुशी है कि इस बर्बाद अर्थव्यवस्था में मुसलमान परेशान है कि नहीं।

भारतीय परंपरा , सभ्यता और संस्कृत बिन ब्याही माँ और बच्चे को कभी स्विकार नहीं करती रही है। उदाहरण के तौर पर आप अभिनेत्री नीना गुप्ता से पूछ लें और उनके दुखों को सुन लें जो ऐसी ही बिनब्याही माँ बनकर क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स की बेटी "मसाबा रिचर्ड्स" को जन्म दे चुकी हैं।

दरअसल बिन ब्याही औलाद पैदा करना एक अधूरे रिश्ते की कहानी है जिसमें होता सबकुछ वही है जो विवाह के पश्चात होता है पर केवल विवाह नहीं होता।

विवाह एक वैद्धता का प्रमाणपत्र है , विवाह के पश्चात जन्में बच्चों को आप "व्हाईट मनी" कह सकते हैं जो व्यवस्था की तमाम प्रक्रिया से गुज़रकर आपकी गोद में आते हैं। ऐसे ही बिनब्यही माँ के बच्चों को "ब्लैक मनी" कह सकते हैं।

दरअसल , बिनब्याही माँ का यह कान्सेप्ट मर्दों के लिए सुविधाजनक है , जो सबकुछ बिना किसी बंधन और ज़िम्मेदारी के पा लेते हैं , और जब चाहा बिन ब्याही माँ को छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। 

विवाह महिलाओं को सुरक्षा देता है जो बिनब्याहे बाप देने से बचते हैं और भुगतती औरते हैं क्युँकि फिर उनको कोई नहीं पूछता। मर्द चाहे जितना बूढा हो जाए , चाहे जितने बच्चे का बाप हो उसकी अगली पसंद कुँवारी वर्जिन टीनएजर ही होती है।

लिव इन रिलेशनशिप के बाद बिनब्याही माँ के इस प्रमोशन के लिए हार्दिक पांड्या और नताशा इस देश की संस्कृत के गुनहगार हैं जिनको भारतीय सभ्यता कभी क्षमा नहीं कर पाएगी। 

ह्रदय विदारक घटना

लोगो ने अनानास में पटाख़े मिला कर खिला दिया..
गर्भवती हथिनी के मुँह में फट गए पटाखे..

पानी मे खड़े तीन दिन तक मौत का इंतज़ार करती रही यह हथिनी.. 😢😢

जब जानवर कोई इंसान को मारे.. 
कहते है दुनिया मे वहसी उसे सारे.. 

इस जानवर की जान आज इंसानो ने ली है..
चुप क्यों है संसार.. 😢😢

इंसान की सोच कितनी गिर सकती है यह खबर जरूर पढ़ें.. 😢😢

केरल के मलप्पुरम से क्रूरता की ऐसी ख़बर आई है जिसपर एकबारगी यक़ीन नहीं होता है. गांव की तरफ़ खाना ढूंढने आई एक गर्भवती हथिनी को लोगों ने मार डाला. लेकिन जिस हैवानियत से मारा वो तरीका यक़ीन से परे है. गर्भवती हथिनी को लोकल लोगों ने अनानास खिलाया, लेकिन पटाखों से भरा हुआ अनानास. हथिनी के मुंह में ही ये बारूदी पटाखे फट गए. इसकी वजह से उसका मुंह बुरी तरह जल गया और इससे राहत पाने के लिए वो तालाब में मुंह डुबाकर खड़ी रही. वहीं तालाब में ही खड़े-खड़े हथिनी की मौत हो गई. मामला सामने तब आया जब एक फ़ॉरेस्ट ऑफिसर ने अपनी फ़ेसबुक वॉल पर इस अनहोनी घटना का ज़िक्र किया.

केरल के नीलंबुर फॉरेस्ट के ऑफिसर द्वारा फेसबुक यह सूचना दी गई . उन्होंने लिखा -

 'वन विभाग के अधिकारियों को यह हथिनी 25 मई को मिली थी जब यह भटक कर पास के खेत में पहुंच गई थी, शायद वो अपने गर्भस्थ शिशु के लिए कुछ खाना चाह रही थी.'
वो हथिनी गांव में खाने की तलाश में आई थी. लेकिन वो वहां रहने वालों की शैतानी से अनजान थी. शायद उसने सोचा होगा कि गर्भवती होने की वजह से लोग उसपर दया करेंगे. उसने सभी पर भरोसा किया. जब उसने लोगों का दिया हुआ अनानास खाया और वो उसके मुंह में ही विस्फोट कर गया तब उसे शायद ही यक़ीन हुआ हो कि कोई ऐसा भी सोच सकता है .. 

मुँह जलने के बाद भी उस गर्भवती हथिनी ने तोड़फोड़ नही की शांति से पानी मे खड़ी रही अपने घाव को भरने.. और वही खड़ी खड़ी अपने प्राण त्याग दिए।

उसका पोस्टमार्टम करने आये डॉ भी खुदको रोने से नही रोक पाया.. शैतान लोगो ने हथिनी के साथ उसके पेट मे पल रहे बच्चे को भी मार दिया ।