भोपाल गैस त्रासदी के बाद सात
दिनों में लगभग सात हजार शवों का सम्मानजनक
तरीके से अंतिम संस्कार किया गया गया था।
हजारों शवों के लिए कफन का इंतजाम
समाजसेवकों ने किया था। बीमारों को अस्पताल
पहुंचाने में भी उन्होंने प्रशासन को पूरा सहयोग
दिया था।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित यूनियन
कार्बाइड संयंत्र से दो-तीन दिसंबर, 1984 की रात
रिसी जहरीली गैस ने बहुत बड़ी तबाही मचाई थी।
इस दौरान लगभग तीन हजार लोगों की मौत हुई
थी। हजारों शवों का अंतिम संस्कार भी प्रशासन
के लिए बड़ी समस्या बन गई थी।
जुमेराती इलाके में अग्रवाल पुड़ी भंडार के संचालक
और समाजसेवक प्रदीप अग्रवाल बताते हैं कि उनके
ताऊ शिव नारायण अग्रवाल तीन दिसंबर की सुबह
गैस प्रभावित इलाके और अस्पतालों में गए,
तो शवों को देख उनका दिल दहल गया। उन्होंने
मृतकों का सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार करने
का फैसला किया। बाजार से कफन खरीदे और इस
काम में जुट गए।
प्रदीप भी अपने ताऊ के साथ कफन का इंतजाम करने
वालों में शामिल थे। वह बताते हैं कि आमजन के बीच
शिब्बू चाचा के नाम से लोकप्रिय उनके ताऊ ने अन्य
समाजसेवियों की मदद से कफन जुटाए और श्मशान
घाट पर पहुंच शवों पर कफन ओढ़ाए।
उस मंजर को याद कर प्रदीप आज भी सिहर जाते हैं।
उन्होंने बताया कि हादसे के बाद की सुबह यूनियन
कार्बाइड संयंत्र के आसपास के इलाके में सड़कों के
किनारे जानवरों से लेकर इंसानों तक के शव थे।
अस्पतालों में शवों का अंबार लगा था, जिसमें लोग
अपनों के शव खोज रहे थे।
प्रदीप ने बताया कि शहर के श्मशान घाट भी कम
पड़ गए थे। बड़ी संख्या में शवों को नर्मदा नदी में
बहा दिया गया था।
भोपाल ग्रुप इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की सदस्य
रचना ढींगरा ने 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' की रिपोर्ट
का हवाला देते हुए बताया कि कई
सौ शवों को नर्मदा नदी में बहा दिया गया था। वे
कौन अभागे थे, इसका ब्यौरा आज तक नहीं मिल
पाया है।
Thursday, March 12, 2015
गैस कांड
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