भोपाल गैस त्रासदी: विधवाओं को मौत
का इंतजार
आईएएनएस | 24-Nov 10:15 AM
भोपाल| मध्य प्रदेश की राजधानी में 30 साल पहले
यूनियन कार्बाइड संयंत्र से हुए गैस रिसाव ने
हजारों सुहागनों को विधवा बना दिया था।
घटना के तीन दशक बाद भी इन विधवाओं
की जिंदगी से अंधियारा नहीं मिट पाया है। उनमें
से कई विधवाएं अब ईश्वर से अपने लिए मौत मांग
रही हैं। हादसे में अपने जीवनसाथी को गंवाने
वाली महिलाओं को बसाने के लिए हाउसिंग बोर्ड
द्वारा बनाई गई कॉलोनी की पहचान
ही विधवा कॉलोनी की हो गई है। इस
कालोनी में रहने वाली विधवाओं को वे सुविधाएं
नसीब नहीं हो पाई हैं, जो आरामदायक जीवन के
लिए जरूरी होती हैं।
मेवा बाई बताती हैं कि हादसे के वक्त वह छोला में
रहती थीं। उनकी जिंदगी खुशहाल थी। पति किशन
स्टेशन के करीब फर्नीचर की दुकान पर काम करते थे,
मगर दो-तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात में
उनकी जिंदगी को ग्रहण लग गया। गैस त्रासदी ने
उनसे पति को छीन लिया और खुद उन्हें सांस फूलने
की बीमारी दे दी। अब वह मर-मर कर जी रही हैं।
चार कदम भी चल नहीं पातीं। वह कहती हैं
कि बीमारी ने उनका जीवन नरक बना दिया है,
अस्पतालों से दवाएं नहीं मिलती। आर्थिक
स्थिति ऐसी नहीं है कि दवा खरीद सकें।
विधवा कालोनी में रहने वाला हर परिवार
समस्याओं और परेशानियों से दो-चार हो रहा है।
यहां रहने वाली मुनीफा बी ने अपने पिता गुलाब
खां को भोपाल गैस त्रासदी में खो दिया। वह
कहती हैं कि सरकार ने तरह-तरह के वादे किए, लेकिन
किया कुछ नहीं। मुनीफा ने कहा कि पूरे देश में
सफाई अभियान की बात चल रही है, लेकिन
यहां विधवाओं की कालोनी में कोई सफाई करने
आने के लिए तैयार नहीं है। हादसे में
पति को गंवा चुकी अनेक महिलाएं ऐसी हैं, जिनके
पास आय का कोई अन्य जरिया नहीं है। उनके लिए
पेंशन ही एक मात्र सहारा थी। पेंशन अटक जाने से
उनकी मुसीबतें और बढ़ गई हैं।
Thursday, March 12, 2015
विधवाओं को मौत का इंतज़ार
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