Sunday, March 8, 2015

Bhopal gas kand

भोपाल गैस काण्ड
भोपाल गैस काण्ड स्मारक
भारत के मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल शहर मे 3
दिसम्बर सन् 1984 को एक भयानक औद्योगिक
दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस
त्रासदी के नाम से जाना जाता है। भोपाल स्थित
यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक
ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000
से अधिक लोगो की जान गई तथा बहुत सारे लोग
अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन
के भी शिकार हुए। भोपाल गैस काण्ड में
मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस
का रिसाव हुआ था। जिसका उपयोग कीटनाशक
बनाने के लिए किया जाता था। मरने वालों के
अनुमान पर विभिन्न स्त्रोतों की अपनी-अपनी राय
होने से इसमें भिन्नता मिलती है। फिर भी पहले
अधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 2,259
थी। मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकार ने 3,787
की गैस से मरने वालों के रुप में पुष्टि की थी। अन्य
अनुमान बताते हैं कि ८००० लोगों की मौत
तो दो सप्ताहों के अंदर हो गई थी और लगभग
अन्य 8000 लोग तो रिसी हुई गैस से फैली संबंधित
बीमारियों से मारे गये थे। २००६ में सरकार
द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में
माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125सीधे तौर
पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित
होने की संख्या लगभग 38,478 थी। ३९००
तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के
शिकार हो गये।
भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय
और उसके पर्यावास को सबसे ज़्यादा प्रभावित
करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में
गिना जाता रहा। इसीलिए 1993 में भोपाल की इस
त्रासदी पर बनाए गये भोपाल-अंतर्राष्ट्रीय
चिकित्सा आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण
और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक
प्रभावों को जानने का काम सौंपा गया था।
पूर्व-घटना चरण
सन १९६९ मे यू.सी.आइ.एल.कारखाने का निर्माण
हुआ जहाँ पर मिथाइलआइसोसाइनाइट नामक
पदार्थ से कीटनाशक बनाने की प्रक्रिया आरम्भ
हुई। सन १९७९ मे मिथाइल आइसोसाइनाइट के
उत्पादन के लिये नया कारखाना खोला गया।
कारकों का योगदान
नवम्बर १९८४ तक कारखाना के कई
सुरक्षा उपकरण न तो ठीक हालात में थे और न
ही सुरक्षा के अन्य मानकों का पालन
किया गया था। स्थानीय समाचार पत्रों के
पत्रकारों की रिपोर्टों के अनुसार कारखाने में
सुरक्षा के लिए रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे
जबकि कारखाने में कार्य करने वाले ज़्यादातर
कर्मचारी को अंग्रेज़ी का बिलकुल ज्ञान नहीं था।
साथ ही, पाइप की सफाई करने वाले हवा के वेन्ट ने
भी काम करना बन्द कर दिया था। सम्स्या यह
थी कि टैन्क संख्या ६१० मे नियमित रूप से
ज़्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान
भी निर्धारित ४.५ डिग्री की जगह २० डिग्री था।
गैस का निस्तार
२-३ दिसम्बर की रात्रि को टैन्क इ-६१० मे
पानी का रिसाव हो जाने के कारण अत्यन्त ग्रीश्म
व दबाव पैदा हो गया और टैन्क
का अन्तरूनी तापमान २०० डिग्री के पार पहुच
गया जिसके तत पश्चात इस विषैली गैस का रिसाव
वातावरण मे हो गया। ४५-६० मिनट के अन्तराल
लगभग ३० मेट्रिक टन गैस का रिसाव हो गया।
गैस का बादल
ये विषैली गैसें दक्षिण पूर्वी दिशा मे भोपाल पर
उड़ीं। वातावरण में गैसों के बादल के प्रभाव
की संभावनाओं की चिन्ता आज भी चर्चा का विषय
बना हुआ है। संभवत: मिक के उपरान्त गैस के
बादल् मे फोस्जीन, हायड्रोजन सायनाइड, कार्बन
मोनो-ऑक्साइड, हायड्रोजन क्लोराइड आदि के
तथ्य पाये गये थे।
निस्तार वाद
इस त्रासदी के उपरान्त भारतीय सरकार ने इस
कारखाने में लोगों के घुसने पर रोक दी, अत: आज
भी इस दुर्घटना का कोइ पुष्ट् कारण एवम तथ्य
लोगो के सामने नही आ पाया है। शुरुआती दौर मे
सी बी आइ तथा सी एस आइ आर द्वारा इस
दुर्घट्ना की छान-बीन करी गयी।
दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव
भोपाल की लगाभग ५ लाख २० हज़ार
लोगो की जनता इस विशैलि गैस से सीधि रूप से
प्रभावित हुइ जिसमे २,००,००० लोग १५ वर्ष
की आयु से कम थे और ३,००० गर्भवती महिलाये
थी, उन्हे शुरुआती दौर मे तो खासी, उल्टी,
आन्खो मे उलझन और घुटन का अनुभव हुआ।
२,२५९ लोगो की इस गैस की चपेट मे आ कर
आकस्मक ही म्रित्यु हो गयी। १९९१ मे सरकार
द्वारा इस सन्ख्या की पुष्टि ३,९२८ पे की गयी।
दस्तावेज़ो के अनुसार अगले २ सप्ताह के भीतर
८००० लोगो कि म्रित्यु हुइ। मध्या प्रदेश सरकार
द्वारा गैस रिसाव से होने वालि म्रित्यु
की सन्ख्या ३,७८७ बतलायी गयी है।
स्वास्थ्य देखभाल
रिसाव के तुरन्त बाद चिकित्सा सन्स्थानो पर
अत्यधिक दबाव पडा। कुछ सप्ताह के भीतर
ही राज्य सरकार ने गैस पीडितो के लिये कइ
हस्पताल एव चिकित्सा खाने खोले, साथ ही कइ नये
निजि सन्स्थान भी खोले गये। भयन्कर रूप से
पीडित इलाको मे ७० प्रतीशत से ज़्यादा कम पढे
लिखे चिकित्सक थे, वे इस रसाय्निक् आपदा के
उपचार के लिये सम्पूर्ण रूप से तैयार न थे। १९८८
मे चालू हुए भोपाल मेमोरिअल हस्पताल एव रिसर्च
सेन्टर को ८ वर्षो के लिये ज़िन्दा पीडितो को मुफ्त
उप्चार प्रदान करा गया।
पर्यावरण पुनर्वास
१९८९ मे हुई जाँच से यह जानकारी प्राप्त हुई
कि कारखानें के समीप का पानी और
मिट्टी मछ्लियो के पनपने के लिये हानिकारक है।
आर्थिक पुनर्वास
त्रासदी के २ दिन के पश्चात ही राज्य सरकार ने
राहत का कार्य आरम्भ कर दिया था। जुलाई
१९८५ मे मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने राहत
कार्य के लिये लगभग एक करोड़ चालीस लाख
डॉलर कि धन राशि लगाने का निर्णय लिया।
अक्टूबर २००३ के अन्त तक भोपाल गैस
त्रासदी राहत एव पुनर्वास विभाग के अनुसार
५५४,८९५ घायल लोगो को व १५,३१० मृत लोगों के
वारिसों को मुआवज़ा दिया गया है।
यूनियन कार्बाइड कारखाने के
विरुद्ध प्रभार
दुर्घट्ना के ४ दिन के पश्चात, ७ दिसम्बर १९८४
को यु सी सी के अध्य्क्ष और सी ई ओ वारेन
एन्डर्सन की गिरफ्तारी हुई परन्तु ६ घन्टे के बाद
उन्हे २१००$ के मामूली जुर्माने पर मुक्त कर
दिया गया।

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