Saturday, March 28, 2015

India is great

भारत में सर्वाधिक बड़ा, लम्बा एवं ऊँचा (Most Important )
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1. सबसे लम्बा सड़क पुल - महात्मा गाँधी सेतु, पटना
2. सबसे बड़ा पशु मेला - सोनपुर (बिहार)
3. सबसे ऊँची मीनार - कुतुबमीनार (दिल्ली)
4. सबसे बड़ी झील - चिल्का झील (ओडिशा)
5. सबसे ऊँचा गुरुत्वीय बाँध - भाखड़ा बाँध (पंजाब)
6. सबसे बड़ा रेगिस्तान- थार (राजस्थान)
7. सबसे बड़ा गुफा मंदिर - कैलाश मंदिर (एलोरा)
8. सबसे बड़ी मस्जिद - जामा मस्जिद (दिल्ली)
9. सबसे बड़ा चिड़ियाघर - जूलॉजिकल गार्डन (कोलकाता)
10. सबसे ऊँची चोटी - गॉडविन ऑस्टिन (K-2)
11. सबसे लम्बी सुरंग - जवाहर सुरंग (जम्मू-कश्मीर)
12. सबसे बड़ा डेल्टा - सुन्दरवन डेल्टा (पश्चिम बंगाल)
13. सबसे अधिक वनों वाला राज्य - मध्य प्रदेश
14. सबसे बड़ा कॉरिडोर - रामेश्वरम मन्दिर (तमिलनाडु)
15. सबसे ऊँचा झरना या जलप्रपात - जोग (कर्नाटक)
16. सबसे लम्बी सड़क - ग्रैंड ट्रंक रोड
17. सबसे ऊँचा दरवाजा - बुलन्द दरवाजा
18. सबसे लम्बी नदी - गंगा नदी
19. सबसे बड़ा अजायबघर - चेन्नई अजायबघर
20. सबसे बड़ा गुम्बज - गोल गुम्बज (बीजापुर)
21.सबसे ऊँची मूर्ति - गोमतेश्वर (कर्नाटक)
22. सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान - मासिनराम (मेघालय)
23. सबसे बड़ा लीवर पुल - हावड़ा ब्रिज (कोलकाता)
24. सबसे लम्बी नहर - इन्दिरा गाँधी नहर (राजस्थान)
25. सबसे लम्बा रेलवे प्लेटफॉर्म - गोरखपुर(उत्तरप्रदेश)
26. सबसे विशाल स्टेडियम - युवा भारती (कोलकाता)
27. सर्वाधिक आबादी वाला शहर - दिल्ली
28. सर्वाधिक शहरी क्षेत्र वाला राज्य - महाराष्ट्र
29. सबसे लम्बा रेलमार्ग - डिब्रूगढ़ से कन्याकुमारी
30. सबसे बड़ा प्राकृतिक बन्दरगाह - मुंबई (महाराष्ट्र)
31.सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग - राष्ट्रीय राजमार्गसंख्या-7 (वाराणसी से कन्याकुमारी)
32.सबसे लम्बी तटरेखा वाला राज्य - गुजरात
33. खारे पानी की सबसे बड़ी झील - चिल्का झील(ओडिशा)
34. मीठे पानी की सबसे झील - वूलर झील (जम्मू-कश्मीर)
35. सबसे लम्बी सहायक नदी - यमुना
36. दक्षिण भारत की सबसे लम्बी नदी - गोदावरी
37. सबसे लम्बा बाँध - हीराकुड बाँध(ओडिशा)
38. सर्वोच्च शौर्य सम्मान - परमवीर चक्र
39. सर्वोच्च सम्मान - भारत रत्न
40. सबसे बड़ा गुरुद्वारा - स्वर्ण मंदिर (अमृतसर)
41. सबसे बड़ा गिरजाघर - सेंट कैथेड्रल (गोवा)
42. सबसे ऊँचा टीवी टावर - पीतमपुरा (नई दिल्ली)
43. सबसे लम्बा समुद्रतट - मैरिना बीच (चेन्नई)
44. सर्वाधिक मार्गबदलने वाली नदी - कोसी नदी
45. सबसे बड़ा नदीद्वीप - माजुली (ब्रह्मपुत्र नदी, असम)
46. सबसे बड़ा तारामंडल - बिड़ला प्लैनेटेरियम(कोलकाता­)
47. सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल) - राजस्थान
48. सबसे बड़ा राज्य (जनसंख्या) - उत्तर प्रदेश
49. सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित युद्धस्थल - सियाचिनग्लेशियर
50. सबसे ऊँचा हवाई पत्तन - लेह
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Friday, March 27, 2015

Chanakya

वोचाणक्य मछली कोचेन्नई में अब तक फ्राई कर लिया होगा जिसने कल भारतके जीतनेकीभविष्यवाणी कीथी
..... खेल में तोहार जीतहोती रहती है मैदान पर दोटीमउतरतीहै एक कीहार होती है और एक जीतआज हम लोगो अफ़सोसजरूर हुआ के हमारी टीमआज हार गई लेकिन खुशीभीइस बातकी है के हमारी टीमसेमीफाइनल तक पहुंची हम लोगो कोहर हाल में अपनीटीमकोसपोर्ट करना है ये नही के हमारी टीमहार गई तोहम खिलाड़ियों के घर जाकरपत्थर बजी करेनही ऐसा नही हमे उनकोवापसहिन्दुस्तान आने पे वैसे ही वेलकमकरे जैसे जीतके आने पे करते है उन सभीखिलाड़ियों कोबहोत बहोत मुबारकबाद जिन्होंने यहाँ तक टीमकोपहुंचाया हमें फक्र है अपनीटीमपर .

Tuesday, March 24, 2015

Bhagat singh

अधिवक्ता ने पूछा, 'शहीद का दर्जा कब'

शहीद भगत सिंह ब्रिगेड से जुड़े मेरठ के अधिवक्ता मनिंदर सिंह की उस फाइल को केंद्र सरकार ने बंद कर दिया है जिसमें उन्होंने भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव को शहीद का दर्जा देने की मांग की थी।

साथ ही अन्य मांगों पर भी पानी फेरते हुए बस यह कहकर खानापूर्ति की दी कि उनकी मांग और सुझाव नोट कर लिए गए हैं।

मनिंदर सिंह के मुताबिक वर्ष 2013 में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय से जन सूचना के अधिकार में सूचना मांगी थी कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को शहीद का दर्ज कब दिया गया।

यदि अभी तक नहीं दिया गया तो इसके लिए क्या कार्रवाई चल रही है। इस बाबत भारत सरकार ने जवाब दिया गया कोई सूचना उनके पास उपलब्ध नहीं है।

Sunday, March 22, 2015

२३ मार्च

शहीदे–आजम भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव के बलिदान
दिवस पर उन्हें याद करते हुए हमारे मन में यह सवाल
उठना लाजिमी है कि जिस सपने को लेकर हमारे
क्रान्तिकारी पुरखों ने हँसते–हँसते फाँसी के फन्दे
को चूम लिया था, उसका क्या हुआ ? जो लोग इन
शहीदों की याद में जलसे करने और उत्सव मनाने पर
बेहिसाब पैसा फँूकते हैं, क्या उन लोगों को पता
भी है कि हमारे शहीदों के विचार क्या थे, वे किस
तरह का समाज बनाना चाहते थे और देश को किस
दिशा में ले जाना चाहते थे ? उनके सपनों और
विचारोंे को दरकिनार करके, उनके बलिदान दिवस
का उत्सवधर्मी, खोखला और पाखण्डी आयोजन
करना उन शहीदों का कैसा सम्मान है ?
सच तो यह है कि अंग्रेजों ने भगत सिंह और उनके
साथियों के शरीर को ही फाँसी चढ़ायी थी,
उनके विचारों को वे खत्म नहीं कर सकते थे और कर
भी नहीं पाये । भगत सिंह ने कहा था कि––
हवा में रहेगी मेरे खयाल की बिजली,
ये मुश्ते–खाक है फानी रहे, रहे न रहे ।
आजादी के बाद देशी शासक भी भगत सिंह के
विचारों से उतना ही भयभीत थे जिम्मा अंग्रेज ।
उन्होंने इन विचारों को जनता से दूर रखने की भरपूर
कोशिश की । लेकिन देश की जनता अपने
गौरवशाली पुरखों को भला कैसे भूल सकती है ।
आज भी जन–जन के मन–मस्तिष्क में उन
बलिदानियों की यादें जिन्दा हैं ।
आज 23 मार्च है. हमारे नौजवान और बच्चों से अगर
ये पूछा जाये कि 23 मार्च का क्या महत्व है, तो
अधिकाँश इस पर अपनी अनभिज्ञता जाहिर करेंगे.
हो सकता है कि कुछ 23 मार्च को वर्ल्ड कप के
नॉक आउट मुकाबलों का दौर शुरू होने के दिन के
तौर पर याद करें. लेकिन आज का दिन समर्पित है
उन महान स्वतन्त्रता सेनानियों को, जिन्होंने
मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ
बलिदान कर दिया. मैं बात कर रहा हूँ भगत सिंह,
राजगुरू और सुखदेव की जिनका आज शहीदी दिवस
है.
बात आगे बढ़ाने से पहले सरदार भगत सिंह के जीवन
को याद कर लें.
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर
ज़िले के बंगा में चक नंबर 105 (अब पाकिस्तान में)
नामक जगह पर हुआ था। अमृतसर में 13 अप्रैल 1919
को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह
की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के
नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम
के एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए थे। भगत सिंह
ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा
की स्थापना की थी। इस संगठन का उद्देश्य
‘सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले’ नवयुवक
तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरू के साथ
मिलकर17 दिसम्बर 1928 लाहौर में सहायक पुलिस
अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को
मारा था। क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के
साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल
एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को ‘अंग्रेज़
सरकार को जगाने के लिए’ बम और पर्चे फेंके थे। बम
फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी
भी दी। बाद में भगत सिंह कई क्रांतिकारी दलों के
सदस्य बने । बाद मे वो अपने दल के प्रमुख
क्रान्तिकारियो के प्रतिनिधि बने। उनके दल मे
प्रमुख क्रन्तिकारियो मे सुखदेव, राजगुरु थे। इन
तीनों ने मिलकर अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर
दिया. घबराई सरकार ने इनको जेल में बंद कर दिया.
23 मार्च 1931 को भगत सिह तथा इनके दो
साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई ।
फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे -
दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी ।
फांसी के बाद कोई आन्दोलन ना भड़क जाए इसके
डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए
तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फ़िरोजपुर की ओर
ले गए जहां घी के बदले किरासन तेल में ही इनको
जलाया जाने लगा । गांव के लोगो ने आग देखी तो
करीब आए । इससे भी डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश
के अधजले टुकड़ो को सतलुज नदी में फेंक कर भागने
लगे। जब गांव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत
शरीर के टुकड़ो को एकत्रित कर विधिवत दाह
संस्कार किया ।
तो ये थी हमारे इन महान स्वतन्त्रता सेनानियों के
गौरवमयी जीवन गाथा। यह सत्य है कि आज के
हालातों में यदि भगत सिंह जैसे कर्मठ और माटी के
सपूत जीवित होते तो देश का इतना बुरा हाल नहीं
होता। धन्य है भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव। भगत
सिंह और उनके साथियों का हमारे लिए सबसे बड़ा
महत्त्व यह है कि वे महान क्रान्तिकारी और महान
विचारक थे । हमारे देश, समाज और मेहनती गरीब
जनता के लिए उन क्रान्तिकारियों के विचार आज
पहले से कहीं ज्यादा प्रासांगिक हैं । लेकिन
अफसोस की बात यह है कि उनके विचारों के बारे
में आज भी देश के अधिकांश लोगों को कुछ खास
पता नहीं है । भगत सिंह को याद करने का सबसे
सही तरीका यही हो सकता है कि उनके विचारों
को जन–जन तक पहुँचाया जाय । साथ ही उनके
विचारों को व्यवहार में उतारने के लिए एकजुट
होना भी आज समय की माँग है । शहीदों के सपने
को देश की बहुसंख्य जनता का सपना बनाना और
उसे साकार करना ही उनके प्रति सच्ची
श्रद्धांजलि हो सकती है ।

Friday, March 20, 2015

अचारी दही भिंडी

I am cooking अचारी दही भिंडी
500 ग्राम भिंडी, को बीच मैं से चीरा लगाकर लम्बे
टुकड़े करें |
2 बड़े चम्मच तेल मैं इन्हें तल लें
पुन:2 बड़े चम्मच तेल गर्म करें |इसमें 2 छोटे चम्मच सौंफ,
1 छोटा चम्मच राई, 1/2. छोटा चम्मच कलौंजी, 1/4
छोटा चम्मच मेथी दाना और चुटकी भर हींग डालकर
अच्छी तरह भून लें| अब 2 चम्मच अदरक लहसुन पेस्ट
डालकर अच्छी तरह भूनें|
अब 1 कप ताज़ा दही लें इसमें 1/2. छोटा चम्मच
हल्दी पावडर, 1 छोटा चम्मच मिर्च पावडर, 2 बड़े
चम्मच धनिया पावडर तथा नमक स्वादानुसार
डालकर अच्छी तरह फेंट लें गर्म तेल मैं डालें 1 2 मिनट
कपने दें फिर इसमें तली हुई भिंडी डालकर 2 पकनें दें
फिर नीचे उतार कर सर्विंग वाउल मैं धनिया पत्ती
से गार्निश करें
लीजिए तैयार है स्वादिष्ट अचारी दही भिंडी

Thursday, March 12, 2015

बचपन

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 30
वर्ष पहले हुई दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक
त्रासदी का असर अब भी बरकरार है। यूनियन
कार्बाइड संयंत्र के आसपास की हर बस्ती इस बात
की गवाही दे रही है कि यहां बचपन पर संकट
बना हुआ है, यहां बीमारियां उनके जीवन
को दीमक की तरह चट कर रही हैं।
अभी तक दर्द झेलने को मजबूर लोग
अब से 30 वर्ष पहले यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से
रिसी जहरीली गैस ने भोपाल के
हजारों परिवारों को ऐसे जख्म दिए जो आज भी हरे
हैं। हर उम्र वर्ग के लोग बीमारियों का दंश झेल रहे हैं,
इनमें वे बच्चे भी हैं जिनके माता-पिता हादसे के समय
या तो बच्चे थे या उनका हादसे के बाद जन्म हुआ।
सुदामा नगर में रहने वाले शमशाद कुरैशी के दो वर्ष
का बेटा ताहा जिंदगी और मौत के बीच झूल
रहा है। उसने अभी जिंदगी का मतलब
भी नहीं जाना है और उसे मौत का डर सताने
लगा है। ताशा की तिल्ली (स्प्लीन) बढ़ गई है, ब्लड
कैंसर है और इलाज पर हर माह दो हजार रुपये से
ज्यादा की दवाएं लग जाती हैं।
शमशाद का कहना है, "पहले उसे जहरीली गैस ने
नुकसान पहुंचाया और अब बेटा बीमारी से घिर
गया है। ताशा की बीमारी ने उसके परिवार
की कमर तोड़ दी है, उसका इलाज मुम्बई में होना है
मगर अब तो उसके पास बेटे के इलाज के लिए
भी पैसा नहीं है। उसने अपनी बेटी की शादी के
लिए रकम जमा कर रखी थी जो बच्चे के इलाज में
खर्च हो गई।"
इलाज के लिए बिक गया सब कुछ
ताशा जैसी ही हालत तीन वर्ष के अलबेज की है।
जहरीली गैस के दुष्प्रभाव के चलते उसको त्वचा रोग
है, उसके शरीर पर छाले बन जाते हैं। उसका इलाज
महंगा है। अनवर बताते हैं, "उनका अपने बेटे के इलाज में
जमीन, दुकान तक बिक गया है। गैस पीड़ितों के लिए
बनाए गए अस्पताल से भी अलबेज को इलाज
नहीं मिल पा रहा है।"
करौंद में रहने वाला हर्ष चल फिर नहीं पाता है। वह
अन्य बच्चों की तरह दौड़ना चाहता है, मगर चल फिर
नहीं चल सकता है। हर्ष के पिता शंकर कहते हैं, "30
वर्ष पहले रिसी जहरीली गैस ने उनके बच्चे का बचपन
छीन लिया है। वे बताते हैं कि सिर्फ हर्ष
ऐसा नहीं है बल्कि उस जैसे हजारों बच्चे हैं
जो खुशहाल जीवन नहीं जी पा रहे है।"
भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के
संयोजक अब्दुल जब्बार बताते हैं कि यूनियन
कार्बाइड से रिसी गैस ने जन्मजात
बीमारियां दी हैं। जहरीली गैस ने गुर्दे, फेफड़े, आंख
की बीमारी के अलावा त्वचा के रोग दिए हैं।
हजारों बच्चे अपाहिज पैदा हुए हैं।
वहीं भोपाल ग्रुप फॉर इन्फार्मेशन एण्ड एक्शन
की प्रमुख रचना ढींगरा कहती हैं कि हजारों बच्चे
बीमारियों की जद में हैं। उनकी बीमारी की वजह
गैस का असर भी है। मगर अब तक ऐसा कोई शोध
नहीं हुआ है जो यह बता सके
कि बच्चों की बीमारी की मूल वजह क्या है।
विकंलागता से ग्रसित बच्चे
इडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर)
के डा. नालोक बनर्जी का कहना है कि भोपाल में
गैस के असर के चलते बच्चों में जन्मजात
बीमारियां और विकलांगता आ रही है इस तरह
का न तो कोई शोध हुआ है और न ही इस तरह के
प्रमाण ही सामने आए हैं।
लिहाजा बच्चों की बीमारी और
विकलांगता को गैस के असर से
नहीं जोड़ा जा सकता है।
भोपाल में रिसी गैस के असर
को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि यूनियन
कार्बाइड के करीब बनी बस्तियों में पैदा होने वाले
बीमार बच्चों की संख्या किसी और इलाकों से
कहीं ज्यादा नजर आती है।

Gas Kand

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल
की हाउसिंग बोर्ड कालोनी में रहने वाली कुसुम
बाई की आंखें अपने दिवंगत पति जयराम को याद
कर आज भी डबडबा जाती हैं। यूनियन कार्बाइड
संयंत्र से रिसी गैस ने उन पर ऐसा कहर
ढाया कि उन्हें पति का शव तक नहीं मिला। वह
जयराम की तस्वीर निहारते सिर्फ यादों के सहारे
जी रही हैं। गैस त्रासदी की ऐसी पीड़िताएं और
भी हैं।
जहरीली गैस से अपनों को खोने वाले
हजारों परिवार हैं, जिन्हें अपनों के शव तक नसीब
नहीं हुए। भोपाल में दो-तीन दिसंबर 1984 की रात
काल बनकर आई थी। यूनियन कार्बाइड संयंत्र से
मिथाइल आइसो साइनाइड (मिक) गैस रिसी और वह
जिस ओर बढ़ी, वहां तबाही मचाती रही। कुसुम बाई
बताती हैं कि वह हादसे की रात सो रही थीं, उनके
पति ने उन्हें जगाया और कहा, "पूरा भोपाल
भागा जा रहा है और तुम हो कि सो रही हो।"
कुसुम ने जैसे ही पति की बात सुनी, वह भी घर से
निकल पड़ी। वह बताती हैं कि जहरीली गैस के
कारण उनकी आंखों में जलन हो रही थी, फिर
भी भागे जा रही थीं। उस रात जिसे
जहां रास्ता दिख रहा था, वह भागे जा रहा था।
सड़कों पर लोग गिरे हुए थे। बच्चों और महिलाओं
की चीख-पुकार से पूरा माहौल
मातमी हो गया था। उसी भगदड़ में कुसुम पति से
बिछुड़ गईं। काफी खोजा, मगर
पति कहीं नहीं मिले।
भोपाल गैस त्रासदी : 30 साल बाद
भी बीमारियों के साये में बचपन
कुछ ऐसा ही दुख मेवा बाई का है। उसने भी अपने
पति किशन को हादसे की रात खो दिया। वह
बताती हैं कि उनके पति स्टेशन के पास फर्नीचर
बनाने का काम करते थे। जब गैस रिसी तब वह दुकान
पर थे। उन्होंने अपनी जान बचाने की बजाय घर आकर
उन्हें जगाया। मेवा बाई जागीं और अपने बच्चों के
साथ सुरक्षित स्थान की तलाश में भागीं।
इसी दौरान वह पति बिछुड़ गईं। उनके पति का आज
तक कहीं कोई सुराग नहीं लगा है।
भोपाल ग्रुप फॉर इंफोरमेशन एंड एक्शन की सदस्य
रचना ढींगरा बताती हैं कि प्रशासनिक
आंकड़ा हकीकत से मेल नहीं खाता।
बताया गया कि हादसे की रात ढाई से तीन हजार
लोगों की मौत हुई, लेकिन यह सच्चाई से कहीं दूर है।
पहले सात दिन तो हाल यह रहा कि प्रशासन
अनगिनत शवों का अंतिम संस्कार करने
की स्थिति में नहीं था। आखिरकार
शवों की सामूहिक अंत्येष्टि करनी पड़ी और
सैकड़ों शव नर्मदा नदी में बहा दिए गए। यही कारण
रहा कि हजारों लोगों को अपने परिजनों के शव
नसीब नहीं हो सके।
हर धर्म में अंतिम संस्कार का विधान है, मगर गैस
पीड़ित हजारों परिवार ऐसे हैं जो अपनों को अंतिम
विदाई तक नहीं दे सके। उन्हें 30 वर्ष बाद भी इस
बात का मलाल है।

इतिहास

इतिहास तो आपने खूब पढ़ा होगा, लेकिन
क्या कभी सोचा है कि जब हमारे समय
का इतिहास लिखा जाएगा तो वह किस तरह
लिखा जाएगा. पेश है भविष्य में लिखे जाने वाले
इतिहास का एक लुगदी उदाहरण.
मैं खाली समय हूं, मेरे पास बहुत टाइम है तो आज मैं
आपको भारतीय तमाशे का इतिहास बताऊंगा.
भारतीय तमाशे को दो कालखंडों में
बांटा जा सकता है. टीवी तमाशा युग और सोशल
मीडिया तमाशा युग. टीवी तमाशा युग में इतिहास
ने कई विभूतियों को देखा, लेकिन इन सबमें सबसे ऊपर
थीं राखी सावंत. हालांकि इस दौर में भी मीका,
संभावना सेठ, कश्मीरा शाह जैसी कई हस्तियों ने
इन्हें टक्कर देने की कोशिश की लेकिन इनका परचम
हमेशा ऊंचा ही रहा. राखी सावंत युग के अवसान के
बाद तमाशे ने अगले दौर में प्रवेश किया.
सोशल मीडिया तमाशा युग में. इस दौर में बहुत
भारी प्रतिस्पर्धा थी. एक तरफ कमाल आर खान
जैसे लोग ट्विटर पर थोक के भाव सस्ते ट्वीट्स
गिराए जा रहे थे तो दूसरी तरफ राजनीतिक
पार्टियों ने भी इस माध्यम को अबकी बार से लेकर
पांच साल टाइप नारों से नाश कर रखा था. इन
तमाम विपरीत परिस्थितियों से निबटते हुए सिर्फ
अपनी मेहनत और निजी संपदा के बल पर पूनम पांडे ने
अपना लोहा मनवाया.
नीले रंग के फेसबुक और नीले रंग के ट्विटर के दौर में
जनकवि हनी सिंह ने यह वैज्ञानिक खोज भी कर
दी थी कि पानी भी ब्लू ही होता है. तो नीलेपन
की इंतिहा वाले इस दौर में पूनम पांडे ने
लोगों की मांग और अपनी टांग पर
पूरा भरोसा किया. उन्होंने हर वो चीज
नुमाया की जो जनता देखना चाहती थी. मन से
वैराग्य को अपना चुकीं पूनम जानती थीं कि कपड़े-
लत्ते मोह-माया हैं तो वह इन तामझामों से दूर
ही रही.
उन्होंने दुनिया को यह ज्ञान
दिया कि देशभक्ति सिर्फ जताने के साथ-साथ
दिखाने की भी चीज होती है. पूनम ने 2011 क्रिकेट
वर्ल्ड कप में ट्विटर पर यह
मुनादी पिटवा दी कि अगर टीम इंडिया खिताब
जीत जाती है तो वह बिना कपड़ों के मैदान
का चक्कर लगाएंगी. इस घोषणा के बाद भारतीय
रणबांकुरों ने 28 साल बाद वर्ल्ड कप जीतकर ही दम
लिया. हालांकि इतिहास जयचंद के बाद उस इंसान
को ही गद्दार मानेगा जिसने इस
घोषणा को अमलीजामा पहनाने और पूनम को सारे
जामे उतारने से रोका. पूनम ने हालांकि अपने
प्रशंसकों को निराश होने के मौके नहीं दिया.
ट्विटर के जरिए मुफ्त में पूनम ने गरीब और इच्छुक
जनता की झोली समय-समय पर खूब भरी.
ट्विटर ने कभी उनको कभी ब्लू टिक
मार्का वेरिफाइड अकाउंट मयस्सर नहीं कराया,
लेकिन फिर भी उनके फॉलोअरों में कोई
कमी नहीं आई. उनके जादू का अंदाजा इसी तथ्य से
लगाइए कि भारत वर्ल्ड कप में जो भी मैच
जीतता ट्रेंड पूनम करने लगती.
#PoonamPandeyKoBulao सोशल
मीडिया तमाशा युग में पूनम की बड़ी उपलब्धि के
तौर पर देखी जाती है.
पूनम प्रकृति पर इंसान के विजय की प्रतीक हैं.
उन्होंने शरीर में जो अंग नहीं जंचा उसे
बदलवा लिया. ट्विटर के कारनामोें की वजह से उन्हें
एक बॉलीवुड फिल्म भी मिली जिसका नाम
था 'नशा'. यह
दुनिया का पहला ऐसा नशा था जो इतनी जल्दी उतरा.
इसके बाद इसे नशामुक्ति केंद्रों ने अपने केंद्र में
दिखाना शुरू कर दिया. पूनम ने हिप्पोक्रेसी के
खिलाफ अभियान चलाया. जो है उसे
दिखाना ही चाहिए. कहते हैं
कि ईमानदारी की क्लोज फाइट में अरविंद
केजरीवाल उनसे इसी बेबाकी से पिछड़ गए. सोशल
मीडिया की इस
महानायिका को लुगदी इतिहासकार का प्रेम
भरा रिट्वीट.

गैस कांड

मध्य प्रदेश में भोपाल गैस त्रासदी ने
सैंकड़ों महिलओं से जिंदगी का सुख ही छीन
लिया। लापरवाही से हुई यह त्रासदी एक शाप
साबित हुई। इस त्रासदी के दर्द का अंदाजा इस
बात से लगाया जा सकता है कि यूनियन कार्बाइड
संयंत्र के हादसे के बाद महिलाओं की गोद में
किलकारी नहीं गूंजी। क्योंकि रिसी जहरीली गैस
के दुष्प्रभाव ने कई महिलाओं की कोख को आबाद
ही नहीं होने दिया उनको बांझ बना दिया।
भोपाल के लोगों के लिए दो-तीन दिसंबर को 1984
की रात तबाही बनकर आई थी। इस काली रात
को संयंत्र से मिथाईल आइसो सायनाइड गैस
का रिसाव हुआ जिसमें हजारों लोगों को मौत के
मुह में दखेल दिया।
अशोक गार्जन में रहने वाली राधा बाई बताती हैं
कि उनका भरा-पूरा परिवार था। तीन बेटों और
पति के साथ वे खुशहाल जिंदगी जी रही थीं।
लेकिन यूनियन कार्बाइड संयंत्र उनके लिए
इतना दुखदाई साबित हुआ कि परिवार के तीनों बेटे
कुछ माह के भीतर ही दुनिया छोड़कर चले गए।
राधाबाई बताती हैं कि तीन बच्चों की मौत के
बाद वह कभी मां नहीं बन पाईं। गैस के रिसाव ने
उनके बेटों को तो छीना ही साथ ही उनसे संतान
सुख भी छिन गया। वह बताती हैं कि उन्हें
गेस्ट्रो इंटोटायसिस है जिसकी वजह से सुकून से
ना ही सो पाती हैं और न ही ढंग से चल फिर
पाती हैं।
यही हाल छोला क्षेत्र में रहने
वाली राजिया का है। राजिया आज तक
मां नहीं बन सकीं। रजिया बताती हैं कि त्रासदी में
उनका शारीरिक रूप से वह इतना प्रभावित हुईं
कि आज तक मां नहीं बन पाईं।

पीढ़तों का दर्द

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के
देवकी नगर में रहने वाली साजिदा बानो ने पहले
पति को खोया और फिर दो-तीन दिसंबर 1984
को रिसी जहरीली गैस के चलते भोपाल के रेलवे
स्टेशन पर गोद में बच्चे ने भी दम तोड़ दिया।
पति और बच्चे को खोने का गम आज भी उसे साल
रहा है।
दर्द की गवाही देती आंखें
साजिदा की आंखें उसके दर्द की गवाही दे
जाती हैं। चेहरे पर छाई उदासी अपनों के बिछुड़ने
की कहानी कहती है, अब तो हाल यह है कि उसके
आधे दिन अस्पताल के बिस्तर पर ही कटते हैं।
साजिदा बानो के पति अशरफ अली यूनियन
कार्बाइड संयंत्र में फिटर हुआ करते थे, वह अपने
पति और दो बच्चों के साथ खुशहाल थी।
उसकी खुशहाल जिंदगी को किसी की नजर लग गई
और 28 दिसंबर 1981 को फासजीन गैस का टैंक
खोलने से निकली गैस ने अशरफ की जान ले ली।
ट्रेन में बिगड़ गई बच्चों की तबियत
पति की मौत के बाद साजिदा बानो का अपने
मायके कानपुर आना जाना रहता था, दो दिसंबर
1984 की दोपहर को वह अपने दोनों बच्चों अरशद
(चार वर्ष) और शोएब (दो माह) के साथ गोरखपुर-
मुंबई एक्सप्रेस से भोपाल के लिए निकली। वह तीन
दिसंबर की सुबह जब भोपाल स्टेशन
पहुंची तो वहां का हाल देखकर उसे यह समझ में
नहीं आया कि आखिर हो क्या गया है।
साजिदा बानो बताती है कि वह ट्रेन से
उतरती कि उससे पहले दोनों बच्चों की तबियत
बिगड़ने लगी। उसे भी आखों में जलन हो रही थी और
सांस लेने में परेशानी बढ़ती जा रही थी। कुछ ही देर
में वह देखती है कि बड़ा बेटा अरशद
बेहोशी की हालत में है। उसने
दोनों बेटों को लिया और स्टेशन से बाहर निकली,
तो उसे ऑटो रिक्शा बड़ी मुश्किल से मिला। जब
तक वह अस्पताल पहुंची तब तक अरशद की मौत
हो चुकी थी। वहीं शोएब की भी तबीयत बिगड़ी,
मगर वह बच गया।
30 साल बाद भी कम नहीं हुआ दर्द
हादसे के वर्ष 30 बीतने के बाद
भी साजिदा बानो अपने दुखों से अब तक उबर
नहीं पाई है। उसे सांस की बीमारी है, कुछ कदम
भी आसानी से चल नहीं पाती है। पति की मौत पर
उसे अनुकंपा नियुक्ति जरूर मिल गई है, मगर वेतन
का एक बड़ा हिस्सा उसके इलाज पर खर्च
हो जाता है। वहीं बीमारी के चलते उसका हाल यह
है कि आधे दिन गैस पीड़ितों के उपचार के लिए बने
अस्पतालों में कटते हैं। एक बेटा शोएब
भी बीमारी का शिकार है।
साजिदा बानो को अफसोस इस बात का है कि उसे
गंभीर बीमारी है मगर सिर्फ 25 हजार रुपये
ही मुआवजे के तौर पर मिले हैं। बेटा शोएब
भी बीमार रहता है और उसे भी 25 हजार रुपये
ही मिले हैं। वह कहती है, "उसे अब लगता नहीं है
कि उनकी जिंदगी में कभी खुशियां भी आएंगी।"
आज भी याद आता है वह मंजर
साजिदा बानो अपने साथ हुई घटना को याद कर
कहीं खो जाती है, आंखों से आंसू बहने लगते हैं और
सांस फूलने लगती है। हाल यह होता है कि वह बैठकर
बात तक नहीं कर पाती है। वह बताती है कि कई
बार तो पति और बेटे की याद आते
ही उसकी तबीयत इतनी बिगड़ जाती है कि उसे
अस्पताल जाना पड़ता है।
साजिदा बानो का परिवार तो एक उदाहरण भर है,
जिसे यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी गैस ने तबाह
किया है। ऐसे और भी हजारों परिवार हैं जो आज
भी मर-मर कर जिए जा रहे हैं।