Tuesday, June 11, 2013

तुम्हारी हँसी

तुम्हे पता हैं
तुम्हारी हँसी
कितनी मासूम हैं
कितनी नटखट
अल्हड़..मदमस्त
बहकते सावन जैसी
जिसकी पहली बारिश
कर देती है शांत
और तृप्त...
रेत के धोरो को भी
पल ही भर मे
ठीक वैसे ही
तुम्हारी मुस्कुराहट
भी सक्षम हैं
रेत के तूफान को
पस्त करने में
जो उठता हैं
मेरे मन में
हर बार..यूँ ही
तुम्हे देख के
मेरी दुआ है
साथ ही साथ
प्रार्थना भी
ताउम्र..ऐसे ही
खिलखिलाती रहना
मुझे जिताने के लिए
तुम भी...और...
तुम्हारी..वही
मदहोश हँसी...भी .....

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