Monday, June 24, 2013

लाड़ प्यार

अमर अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। दोनों ने लाड़ प्यार के आँचल में ममता की छाँव तले उसे पालकर बड़ा किया। उसकी हर आरजू को पूरा करने को तत्पर रहते थे जानकी और वासुदेव। ज्यों ज्यों अमर प्राइमरी से मिडिल, फिर मिडिल से हाई स्कूल का फासला तय करता रहा, उसकी ख़ूबियाँ भी प्रेम का पानी पाकर निखरती रही। शक्ल सूरत से तो वह मनमोहक था पर बुद्धिमान भी बहुत साबित हुआ। जब वह कालेज पहुँचा तो माँ-बाप के सामने अमेरिका जाकर पढ़ने की इच्छा प्रकट की, और साथ में वह वादे भी करता रहा कि वह पढ़ाई पूरी करते ही वापस आकर पिता के नक़्शे-कदम पर चलकर, यहीं पर बसेरा डालकर उन दोनों की देखभाल भी करता रहेगा। इस प्रकार माता पिता की ममता का क़र्ज़ भी उतारता रहेगा।

उसकी मीठी बातें और सलीकेदार सोच सुनकर जानकी और वासुदेव दोनों बहुत खुश हुए और अपनी बाकी तमाम उम्र की जमा पूँजी लुटाकर उसे बाहर रवाना करने में मदद की। यों वक्त आने पर अमर उनकी आँखों में नए सपने सजाकर उनकी आँखों से दूर चला गया। पहले अमर जल्दी जल्दी उन्हें ख़त लिखा करता था, उन्हें यहाँ की पढ़ाई के बारे में, अपने बारे में, माहौल के बारे में, बताता था। पर बहुत जल्द ही उन ख़तों की रफ्तार ढीली पड़ गई और एक वक्त ऐसा आया कि वासुदेव के लिखे हुए ख़तों का जवाब आना ही बंद हो गया। यों दो साल और बीत गए। निराशा आँखें उठाए हर सूनी डगर पर ख़त के इंतज़ार में पथराई आँखों से निहारा करती थी।

और एक दिन डाकिया एक बड़ा-सा लिफ़ाफ़ा उन्हें दे गया, जिसमें ख़त के साथ-साथ कुछ फोटो भी थे। जल्दी में वासुदेव ख़त पढने लगा जिसको सुनते सुनते उसकी पत्नी जानकी वहीं बेहोश हो गई। ये अमर की शादी के फोटो थे। शादी उसने अमेरिका में एक विदेशी लड़की के साथ कर ली थी और ख़त में लिखा था "पिताजी हम दोनों पाँच दिन के लिए आपके पास आ रहे हैं और फिर घूमते हुए वापस लौटेंगे। एक ख़ास बात है अगर हमारे रहने का बंदोबस्त किसी होटल में हो जाए तो बेहतर होगा। पैसों की ज़रा भी चिंता न कीजिएगा।"

यह खबर थी जो पढ़ने के बाद वासुदेव का बदन गुस्से से थर थर काँपने लगा, जिसे काबू में रखते हुए वह अपनी पत्नी को होश में लाने की कोशिश करते रहे और वहीं ज़मीन पर बैठकर बच्चों की तरह रोने लगे। उम्मीदें और अरमान सब बिखर गए, सामने अपनी ममता का महल टूटा हुआ खंडहर-सा लगा। जिसको अपने लहू से सींचा वो ही उस अपनेपन को भूल कर गैर देश को अपना मान बैठा। वह अपना तो किसी हाल में भी नहीं, मगर अपनों से भी बदतर है। ऐसा बेटा प्यार तो छोड़ो, नफ़रत के काबिल भी नहीं है, यही कुछ सोचते-सोचते आँख से गर्म आँसू बहने लगे। दूसरे दिन सुबह तार द्वारा बेटे को जवाब में लिखा,
"तुम्हारा हाल पढ़ा पढ़कर जो दिल को धक्का लगा है उसी को कम करने के लिए हम पति-पत्नी कल तीर्थों के लिए रवाना हो रहे हैं, कब लौटेंगे पता नहीं और अब हमें किसी का इंतज़ार भी नहीं। इसलिए तुम पराये मुल्क को अपना समझ कर नए रिश्तों को निभाने की कोशिश करना। यहाँ अब तुम्हारा अपना कोई नहीं है."...वासुदेव

Sunday, June 23, 2013

पायथोगोरस

यूनान देश के एक गाँव का लड़का जंगल में लकड़ियाँ काट के शाम को पास वाले शहर के बाजार मे बेचकर अपना गुजारा करता था. एक दिनएक विद्वान व्यक्ति बाजार से जा रहा था. उसने देखा कि उस बालक का गट्ठर बहुत ही कलात्मक रूप से बंधा हुआ है.
उसने उस लड़के से पूछा- “क्या यह गट्ठर तुमने बांधा है?”
लड़के ने जवाब दिया : “जी हाँ, मै दिनभर लकड़ी काटता हूँ, स्वयं गट्ठर बांधता हूँ और रोज शामको गट्ठर बाजार मे बेचता हूँ.”
उस व्यक्ति ने कहा कि “क्या तुम इसे खोलकर इसी प्रकार दुबारा बांध सकते हो?”
“जी हाँ, यह देखिए” – इतना कहेते हुए लडके नेगट्ठर खोला तथा बड़े ही सुन्दर तरीके से पुन: उसे बांध दिया. यह कार्य वह बड़े ध्यान, लगन और फूर्ती के साथ कर रहा था.
लड्के की एकाग्रता, लगन तथा कलात्मक रीति से काम करने का तरीका देख उस व्यक्ति ने कहा“क्या तुम मेरे साथ चलोगे ? मै तुम्हे शिक्षा दिलाऊंगा और तुम्हारा सारा व्यय वहन करूँगा.”
बालक ने सोच-विचार कर अपनी स्वीकृति दे दी और उसके साथ चला गया. उस व्यक्तिने बालक के रहने और उसकी शिक्षाका प्रबंध किया. वह स्वयं भी उसे पढ़ाता था.थोड़े ही समय में उसबालकने अपनी लगन तथा कुशाग्र बुद्धि के बल पर उच्च शिक्षा आत्मसात कर ली. बड़ा होने परयही बालक युनान के महान दार्शनिक पाइथागोरस के नामसे प्रसिद्द हुआ.
वह भला आदमी जिसने बालक की भीतर पड़ी महानता के बीज को पहचान कर उसे पल्लवित किया , वह था, वह था यूनान का विख्यात तत्त्व ज्ञानी डेमोक्रीट्स .
इस कहानी से हम सीख ले सकते हैं कि हमें छोटे-छोटे कार्य भी लगन एवं इमानदारी से करने चाहियें , उसी में महानता के बीज छिपे होते है.

शिक्षा --हमें छोटे-छोटे कार्य भी लगन एवं इमानदारी से करने चाहियें , उसी में महानता के बीज छिपे होते है.

Wednesday, June 12, 2013

रोल्स रॉयस

इंगलैण्ड की राजधानी लंदन में यात्रा के दौरान एक शाम महाराजा जयसिंह सादे कपड़ों में बॉन्ड स्ट्रीट में घूमने के लिए निकले और वहां उन्होने रोल्स रॉयस कम्पनी का भव्य शो रूम देखा और मोटर कार का भाव जानने के लिए अंदर चले गए। शॉ रूम के अंग्रेज मैनेजर ने उन्हें “कंगाल भारत” का सामान्य नागरिक समझ कर वापस भेज दिया। शोरूम के सेल्समैन ने भी उन्हें बहुत अपमानित किया, बस उन्हें “गेट आऊट” कहने के अलावा अपमान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।अपमानित महाराजा जयसिंह वापस होटल पर आए और रोल्स रॉयस के उसी शोरूम पर फोन लगवाया और संदेशा कहलवाया कि अलवर के महाराजा कुछ मोटर कार खरीदने चाहते हैं।

कुछ देर बाद जब महाराजा रजवाड़ी पोशाक में और अपने पूरे दबदबे के साथ शोरूम पर पहुंचे तब तक शोरूम में उनके स्वागत में “रेड कार्पेट” बिछ चुका था। वही अंग्रेज मैनेजर और सेल्समेन्स उनके सामने नतमस्तक खड़े थे। महाराजा ने उस समय शोरूम में पड़ी सभी छ: कारों को खरीदकर, कारों की कीमत के साथ उन्हें भारत पहुँचाने के खर्च का भुगतान कर दिया।
भारत पहुँच कर महाराजा जयसिंह ने सभी छ: कारों को अलवर नगरपालिका को दे दी और आदेश दिया कि हर कार का उपयोग (उस समय के दौरान 8320 वर्ग कि.मी) अलवर राज्य में कचरा उठाने के लिए किया जाए।

विश्‍व की अव्वल नंबर मानी जाने वाली सुपर क्लास रोल्स रॉयस कार नगरपालिका के लिए कचरागाड़ी के रूप में उपयोग लिए जाने के समाचार पूरी दुनिया में फैल गया और रोल्स रॉयस की इज्जत तार-तार हुई। युरोप-अमरीका में कोई अमीर व्यक्‍ति अगर ये कहता “मेरे पास रोल्स रॉयस कार” है तो सामने वाला पूछता “कौनसी?” वही जो भारत में कचरा उठाने के काम आती है! वही?

बदनामी के कारण और कारों की बिक्री में एकदम कमी आने से रोल्स रॉयस कम्पनी के मालिकों को बहुत नुकसान होने लगा। महाराज जयसिंह को उन्होने क्षमा मांगते हुए टेलिग्राम भेजे और अनुरोध किया कि रोल्स रॉयस कारों से कचरा उठवाना बन्द करवावें। माफी पत्र लिखने के साथ ही छ: और मोटर कार बिना मूल्य देने के लिए भी तैयार हो गए।

महाराजा जयसिंह जी को जब पक्‍का विश्‍वास हो गया कि अंग्रेजों को वाजिब बोधपाठ मिल गया है तो महाराजा ने उन कारों से कचरा उठवाना बन्द करवाया

Tuesday, June 11, 2013

दो सहेलियाँ वर्षों बाद मिलीं.

दो सहेलियाँ वर्षों बाद मिलीं.
.
औपचारिक कुशलक्षेम के बाद एक ने दूसरी से पूछा..'कितने बच्चे हैं तुम्हारे ?
'दो बेटियाँ हैं'दूसरी ने हर्ष के साथ कहा

पहली सहेली ने चेहरे पर सिकन लाते हुए कहा -:'हे भगवान, इस जमाने में दो बेटियाँ. मेरे तो दो बेटे हैं. मुझे भी दो बार
पता चला था गर्भ में बेटी है, मैंने तो छुटकारा पा लिया. . ..अब देखो कितनी निश्चिन्त हूँ.

'पहली ने कहा.
काश, तीस वर्ष पहले तेरी माँ ने भी तेरे जन्म से पहले ऐसा किया होता तब आज तू दो हत्याओं की दोषी न होती. तेरी माँ को एक ही ह्त्या का पाप लगता'. पास में खड़ी सहेली की इस बात पर घिग्गी बन्ध गई ..! !
उसके पास सर नीचे झुकाने के आलावा कोई चारा ना था ..!!
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मोमीन हुसैन

पढ़िए एक अनपढ़ की उपलब्धि जिसे देखकर आपका सिर भी उसके लिए अदब से झुक जाएगा। आज के जमाने में भी कोई ऐसा सोचता है?

एक शख्स ने जीरो से शुरुआत कर जीवन भर जी-तोड़ मेहनत करके खुद अपनी हस्ती बनाई और जब समाज को देने की बारी आई, तो वह जरा भी नहीं हिचकिचाया है। मामला है गुजरात का, जहां पर एक अनपढ़ कार मकैनिक ने अपने जीवन भर की कमाई से अपनी पुश्तैनी जमीन पर गरीबों के लिए हॉस्पिटल बना दिया। हॉस्पिटल भी ऐसा, जहां पर इलाज कराने के लिए मरीजों को उतना ही पैसा देना होगा, जितना उनका सामर्थ्य है।

अहमदाबाद के बाहरी इलाके में साणंद के पास तेलाव गांव में 'आदर्श हॉस्पिटल' नाम से हॉस्पिटल बनाने वाले मोमीन हुसैन ने 20 साल की उम्र में परिवार का पेट पालने के लिए गांव छोड़ दिया था। कुछ हफ्तों तक इधर-उधर काम की तलाश में भटकने के बाद गांधीनगर में उन्होंने गाड़ियों की रिपेयरिंग का काम सीखना शुरू कर दिया। 15 साल तक वहीं काम करने के बाद उन्होंने गांव लौटने का फैसला किया। जेब में 7 लाख रुपये लेकर वह गांव लौटे और यहीं पर रिपेयरिंग वर्क शुरू कर दिया। काम जम भी गया, लेकिन उनके सिर पर अपने गांव में एक हॉस्पिटल खोलने की धुन सवार थी।

मोमीन के पास कुछ पैसे थे और पुश्तैनी जमीन का एक टुकड़ा। यह प्लॉट प्राइम लोकेशन पर था और उन्हें खरीददारों से 10 करोड़ रुपये तक मिल रहे थे। वह चाहते तो आराम से इस जमीन को बेचकर आराम की जिंदगी जीते, लेकिन उन्होंने जमीन नहीं बेची। करीब 2 साल पहले 1200 स्कवॉयर यार्ड की इस जमीन पर उन्होंने हॉस्पिटल तैयार कर दिया। इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद के जाने-माने ऑर्थोपेडिक सर्जन कार्तिक शुक्ला से मुलाकात की। डॉक्टर शुक्ला ने हॉस्पिटल में सेवाएं देने के लिए हामी भर दी और सेटअप करने में मोमीन की मदद भी की। उनके साथ कुछ और डॉक्टर्स की टीम भी बिना शर्त हॉस्पिटल में सेवाएं देने के लिए तैयार हो गई। अभी एक दर्जन से ज्यादा अलग-अलग स्पेशैलिटी वाले डॉक्टर्स इस हॉस्पिटल के साथ जुड़े हैं।
शुरुआत में मोमीन नहीं चाहते थे कि इलाज के बदले मरीजों से पैसा लिया जाए, लेकिन बाद में हॉस्पिटल चलाने का खर्च निकालने के लिए यह नियम बनाया गया कि मरीज जितने पैसे देने की हैसियत रखता है, अपने मन से वह उतनी ही फीस देगा। इंग्लिश अखबार 'डेली मेल' की रिपोर्ट के मुताबिक हॉस्पिटल के हेड डॉक्टर कार्तिक शुक्ला ने बताया, 'पैसों की वजह से अक्सर गांव के लोग इलाज कराने से कतराते हैं, जिससे छोटी-छोटी बीमारियां बड़ा रूप ले लेती हैं। बाद में इससे खर्च भी ज्यादा होता है और केस भी कॉम्प्लिकेटेड हो जाता है। मगर हमारे हॉस्पिटल में पैसों की वजह से मरीजों का इलाज नहीं रुकेगा। वे अपनी हैसियत के हिसाब से पेमेंट कर सकते हैं।'

wake up , wake up , wake up

Eta'at Ki Kami 

Afkar Main Azmat Ki Kami Dekh Raha Hoon
Guftar Main Jurat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Izha'ar Main Himmat Ki Kami Dekh Raha Hoon
Kirdar Main Ghairat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Jizboon Main Sadaqat Ki Kami Dekh Raha Hoon
Eman Main Hararat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Shamsheer Say Reghbat Ki Kami Dekh Raha Hoon
Sheroon Main Shuja'at Ki Kami Dekh Raha Hoon

Qabza Hai Teray Minbar-o-Mahrab Pay Phir Bhi
Main Tuj Main Qayadat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Qata'al-o-Shahdaat Ki Batata Nahi Khoobi
Taqreer Main Sunnat Ki Kami Dekh Raha Hoon

America Ka Visa Hai Tujay Jaan Say Piyara
Khoon Main Teri Ghairat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Zahir Tera Sufa'af Hai Lakin Main Musalsal
Batin Main Sharafat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Talwar Uthanay Say Gurazan Hai Musalman
Eman Main Taqat Ki Kami Dekh Raha Hoon

Hargiz To Muhammad (صلى الله عليه وسلم ) Ka Wafadar Nahi Hai
Main Tuj Main Eta'at Ki Kami Dekh Raha Hoon

wake up , wake up , wake up

राबर्ट वाड्रा के....

एक साहब गुडगाँव रेलवे स्टेशन से बहार आये
और टैक्सी वाले को कहा की “जयपुर जाना है,
चलोगे ?”
टैक्सी वाला : क्यों नही ..
साहब : कितनी दूर है वैसे ?
टैक्सी वाला : ज्यादा नही, बस 8 खेत छोड़ के
ही तो है.
साहब टैक्सी में बैठ गये... टैक्सी हवा से बातें
करने लगी.....
आधा घंटा हुआ ... फिर एक घंटा....
टैक्सी दौड़ती ही जा रही थी...
साहब ने टैक्सी वाले को टोका “भाईतूम तो कह
रहे थे की बस 8 खेत छोड़ के है”
टैक्सी वाला हंसने लगा, “अरे साहब
आपको नही मालूम की ये खेत किसके है ... राबर्ट
वाड्रा के....

तुम्हारी हँसी

तुम्हे पता हैं
तुम्हारी हँसी
कितनी मासूम हैं
कितनी नटखट
अल्हड़..मदमस्त
बहकते सावन जैसी
जिसकी पहली बारिश
कर देती है शांत
और तृप्त...
रेत के धोरो को भी
पल ही भर मे
ठीक वैसे ही
तुम्हारी मुस्कुराहट
भी सक्षम हैं
रेत के तूफान को
पस्त करने में
जो उठता हैं
मेरे मन में
हर बार..यूँ ही
तुम्हे देख के
मेरी दुआ है
साथ ही साथ
प्रार्थना भी
ताउम्र..ऐसे ही
खिलखिलाती रहना
मुझे जिताने के लिए
तुम भी...और...
तुम्हारी..वही
मदहोश हँसी...भी .....

Monday, June 10, 2013

बुजुर्ग

मेरे कॉलोनी में एक बुजुर्ग थे तकरीबन ८६-८७ साल के.. उन्होंने
जिंदगी में काफी कुछ किया, बहुत इज्जत कमाई,
बहुतों को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया, छोटी सी झोपडी को महल
बना दिया | फिर शादी करने की सोची तो कभी लड़की नहीं मिली,
कभी लड़की के घरवालों ने पसंद नहीं किया | इससे वो इतने कुंठित
हो गए की जब भी अपने किसी की शादी की बात
चलती तो गुस्सा हो जाते, और गुस्से में भूल जाते
की की उनकी शादी की उमर जा चुकी | उनकी जिद्द के चक्कर में न
उनकी शादी हो रही थी और न अपने से छोटों की होने दे रहे रहे थे | पर
परिवार तो आगे बढ़ाना था, तो घर के लोगों ने सोच समझकर परिवार के
एक छोटे पर सबको पसंद आने वाले की शादी पक्की कर दी | वो बुजुर्ग
इससे नाराज हो गए और शादी में नहीं गए, लोगों ने पूछा तो घरवालों ने
बहाना मार दिया की बीमार हैं, अब ८६ के हो चले |
घर के लोगों ने बहुत समझाया की अब ८६ की उमर में सन्यास लो और
आराम करो, पर माने नहीं | अंततः उनके गुस्से के बावजूद लड़के
की शादी हुई, और जैसे ही लड़का घर पहुंचा, उन्होंने आशीर्वाद देने
की जगह दुल्हे पर पत्थर फेकने शुरू कर दिए |

ऐसी बातें नहीं करते

एक मां अपने बच्चे को ढूंढ रही थी। बहुत देर तक जब वह नहीं मिला, तो वह रोने लगी और जोर-जोर से बच्चे का नामलेकर पुकारने लगी। कुछ समय बाद बच्चा दौड़ता हुआ उसके पास आ पहुंचा। मां ने पहले तो उसे गले से लगाया, जी भर कर लाड़ किया, फिर उसे डांटने लगी। उससे पूछा कि इतनी देर तक वह कहां छुपा हुआ था।
बच्चे ने बताया, 'मां! मैं छुपा हुआ नहीं था, मैं तो बाहर की दुकान से गोंद लेनेगया था। मां ने पूछा कि गोंद से क्या करना है, तो बच्चा भोलेपन से बोला, मैं उससे चाय की प्याली जोडूंगा। वह टूट गई है।
मां ने आगे पूछा, टूटी प्याली जोड़ कर क्या करोगे?वह तो बहुत खराब दिखेगी। तबबच्चे ने भोलेपन से कहा, जब तुम बूढ़ी हो जाओगी तो उसी कप में तुम्हें चाय पिलाया करूंगा। यह सुन कर मां पसीने-पसीने हो गई। कुछ पल तक तो उसे समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे?
फिर होश संभालते ही उसने बच्चे को गोद में बिठाया औरप्यार से कहा, बेटा! ऐसी बातें नहीं करते। बड़ों का सम्मान करते हैं। उनसे ऐसा व्यवहार नहीं करते। देखो, तुम्हारे पापा कितनी मेहनत करते हैं ताकि तुम अच्छे स्कूल में जा सको। मम्मी तुम्हारे लिए तरह-तरह के भोजन बनाती है। सब लोग तुम्हारा ख्याल रखते हैं किताकि जब वे बूढ़े हो जाएं तो तुम उनका सहारा बनो........।
बच्चे ने मां की बात बीच में ही काटते हुए कहा, 'लेकिन मां! क्या दादा-दादी ने भी यही नहीं सोचा होगा, जब वे पापा को पढ़ाते होंगे? आज जब दादी से गलती से चाय का कप टूट गया तो तुमकितने जोर से चिल्लाई थीं। इतना गुस्सा किया था आपने कि दादा जी को आपसे दादी के लिए माफी मांगनी पड़ी। पता है मां, आप तो कमरे में जा कर सो गईं, लेकिन दादी बहुत देर तक रोती रहीं। मैंने वहकप संभाल कर रख लिया है, और अब मैं उसे जोड़ दूंगा।

Sunday, June 9, 2013

इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?

इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?

पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है
भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?

सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?

अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?
108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं?

इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं,
लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.

मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है,
लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?

कब डूबते हुए सुरज को देखा त, याद है?
कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?

तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है
जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या ह.....

Saturday, June 8, 2013

शेयर मार्केट मई पैसा में लगाने से पहले ये आर्टिकल पूरा पढ़ ले

शेयर मार्केट मई पैसा में लगाने से पहले ये आर्टिकल पूरा पढ़ ले

पूरा पता चल जाएगा की शेयर मार्केट में पैसा केसे डूबता है

एक बार एक आदमी ने गांववालों से कहा की वो 10 रु .में एक बन्दर खरीदेगा , ये सुनकर सभी गांववाले नजदीकी जंगल की और दौड़ पड़े और वहां से बन्दर पकड़ पकड़ कर 10 रु .में उस आदमी को बेचने लगे .......
कुछ दिन बाद ये सिलसिला कम हो गया और लोगों की इस बात में दिलचस्पी कम हो गयी .......

फिर उस आदमी ने कहा की वो एकएक बन्दर के लिए 20 रु .देगा, ये सुनकर लोग फिर बन्दर पकड़ने में लग गये , लेकिन कुछ दिन बाद मामला फिर ठंडा हो गया ....

अब उस आदमी ने कहा की वो बंदरों के लिए 50 रु . देगा,लेकिन क्यूंकि उसे शहर जाना था उसने इस काम के लिए एक असिस्टेंट नियुक्त कर दिया ........
50 रु .सुनकर गांव वाले बदहवास हो गए ,लेकिन पहले ही लगभग सारे बन्दर पकडे जा चुके थे इसलिए उन्हें कोई हाथ नही लगा ......

तब उस आदमी का असिस्टेंट उनसे आकर कहता है .....
" आप लोग चाहें तो सर के पिंजरे में से 35 -35 रु . में बन्दर खरीद सकते हैं , जब सर आ जाएँ तो 50 -50 में बेच दीजियेगा "...
गांव वालों को ये प्रस्ताव भा गया और उन्होंने सारे बन्दर 35 -35रु .में खरीद लिए .....

"अगले दिन न वहां कोई असिस्टेंट था और न ही कोई सर .......बस बन्दर ही बन्दर "

रहम दिल चोर,लौटाया चोरी का माल

रहम दिल चोर,लौटाया चोरी का माल 

खटीमा। डाकुओं के चिट्ठी लिखकर डकैती करने की कहानियां तो मशहूर रही हैं लेकिन शायद यह पहली बार हुआ है कि किसी चोर ने चोरी का धन पत्र लिखकर खेद जताते हुए चुपचाप वापस किया हो। उत्तराखंड में ऊधमसिंह नगर जिले के खटीमा में चोर ने अपाहिज नाथचंद (38) के घर से 17 हजार रूपए नकद तथा 50 किलो चावल और 30 किलो आलू प्याज चुराए।

चोर को जैसे ही पता चला कि जिस घर से उसने चोरी की है उसका मुखिया हाल ही में एक सड़क दुर्घटना में दोनों टांगे गंवा चुका है और जो पैसा तथा खाद्यान्न उसने चुराया है वह आसपास के लोगों ने अपाहिज की मदद के लिए एकत्र किया था। चोर का ह्वदय पिघल गया और उसने बाकायदा पत्र लिखकर अगले ही दिन पूरा सामान लौटा दिया। 

नाथ चंद ने बताया कि जिस तौलिये में मैने पैसे छिपाकर जहां रखे थे अगले दिन मुझे उसी तौलिये में और उसी जगह पर पैसे रखे मिले। इसके साथ ही दरवाजे पर टंगी एक चिट्ठी भी मिली जिसमे लिखा है ".. मुझे तुम्हारी सही हालत का पता नहीं था क्षमा करना।"

Friday, June 7, 2013

“मुझे नहीं होना बड़ा…”

आज फिर सुबह-सुबह से शर्मा जी के घर से आता शोर सुनाई दे रहा था। मेरे और उनके घर के बीच में सिर्फ एक दीवार का फासला है। बड़ी आसानी से उनके घर की ज़रा-सी भी ऊंची आवाज़ हमारे घर में सुनाई दे जाती है। मालूम पड़ा—किसी बात को लेकर बड़े भाई अमित की अपने छोटे भाई अनुराग से कहा-सुनी हो गयी है। बात जब हाथापाई तक पहुँचती लगी तो मुझसे रहा नहीं गया और बीच-बचाव के लिए मैं उनके घर पहुँच गया। हालांकि इस कोशिश में मैं नाक पर एक घूँसा खा गया और चेहरे पर भी कुछ खरोंचें चस्पा हो गयीं, मगर संतोष इस बात का रहा कि उनका युद्ध महाभारत में तब्दील होने से बच गया। वैसे तो अमित और अनुराग दोनों से ही मेरे दोस्ताना बल्कि कहें तो तीसरे भाई जैसा रिश्ता था लेकिन अल्लाह की मेहरबानी थी कि उन दोनों के बीच आये दिन होने वाले झगड़े की तरह इस तीसरे भाई से उनका कोई झगड़ा नहीं होता था। 

अमित के दो बेटे हैं—बड़ा ७-८ साल का है और छोटा ४-५ साल का। झगड़े के समय वे दोनों खिसियाने से दाल्हान के बाहरी खम्भों से ऐसे टिके खड़े थे जैसे कि खम्भों के साथ उन्हें भी मूर्तियों में ढाल दिया गया हो। उनकी फटी-फटी आँखें और खुला हुआ मुँह देखने लायक था। झगड़ा निपटने के लगभग आधे घंटे बाद जब दोनों कुछ संयत होते दिखे तो उनकी माँ, सुहासिनी भाभी, उनके लिए दूध से भरे गिलास लेके आयीं।

”चलो तुम लोग जल्दी से दूध पी लो और पढ़ने बैठ जाओ।” भाभी की आवाज़ से उनके उखड़े हुए मूड का पता चलता था। बड़े ने तो आदेश का पालन करते हुए एक सांस में गिलास खाली कर दिया लेकिन छोटा बेटा ना-नुकुर करने लगा।

भाभी ने उसे बहलाने की कोशिश की,“दूध नहीं पियोगे तो बड़े कैसे होओगे, बेटा?”

“मुझे नहीं होना बड़ा…” कहते हुए छोटा अचानक फूट-फूट कर रोने लगा,“मुझे छोटा ही रहने दो… भईया मुझे प्यार तो करते हैं…”

Thursday, June 6, 2013

जाड़े की शाम

जाड़े की शाम
धुल धूसरित मैदान
बगल की खेत से
गेहूं के बालियों की सुगंध
और मेरे शरीर से निकलता दुर्गन्ध !
तीन दिनों से
मैंने नहीं किया था स्नान
ऐसा था बचपन महान !
.
दादी की लाड़
दादा का प्यार
माँ से जरुरत के लिए तकरार
पढाई के लिए पापा-चाचा की मार
खेलने के दौरान दोस्तों का झापड़
सर "जी" की छड़ी की बौछाड़
क्यूं नहीं भूल पाता वो बचपन!!
.
घर से स्कूल जाना
बस्ता संभालना
दूसरे हाथों से
निक्कर को ऊपर खींचे रहना
नाक कभी कभी रहती बहती
जैसे कहती, जाओ, मैं नहीं चुप रहती
फिर भी मैया कहती थी
मेरा राजा बेटा सबसे प्यारा ..
प्यारा था वो बचपन सलोना !
.
स्कूल का क्लास
मैडम के आने से पहले
मैं मस्ती में कर रह था अट्टहास
मैडम ने जैसे ही मुझसे कुछ पूछा
रुक गयी सांस
फिर भी उन दिनों की रुकी साँसें ,
देती हैं आज भी खुबसूरत अहसास !
वो बचपन!!
.
स्कूल की छुट्टी के समय की घंटी की टन टन
बस्ते के साथ
दौड़ना , उछलना ...
याद है, कैसे कैसे चंचल छिछोड़े
हरकत करता था बाल मन
सबके मन में
एक खास जगह बनाने की आस लिए
दावं, पेंच खेलता था बचपन
हाय वो बचपन!!
.
वो चंचल शरारतें
चंदामामा की लोरी
दूध की कटोरी
मिश्री की चोरी !
आज भी बहुत सुकून देता है
वो बचपन की यादें
वो यादगार बचपन!!!!!!

जाड़े की शाम
धुल धूसरित मैदान
बगल की खेत से
गेहूं के बालियों की सुगंध
और मेरे शरीर से निकलता दुर्गन्ध !
तीन दिनों से
मैंने नहीं किया था स्नान
ऐसा था बचपन महान !
.
दादी की लाड़
दादा का प्यार
माँ से जरुरत के लिए तकरार
पढाई के लिए पापा-चाचा की मार
खेलने के दौरान दोस्तों का झापड़
सर "जी" की छड़ी की बौछाड़
क्यूं नहीं भूल पाता वो बचपन!!
.
घर से स्कूल जाना
बस्ता संभालना
दूसरे हाथों से
निक्कर को ऊपर खींचे रहना
नाक कभी कभी रहती बहती
जैसे कहती, जाओ, मैं नहीं चुप रहती
फिर भी मैया कहती थी
मेरा राजा बेटा सबसे प्यारा ..
प्यारा था वो बचपन सलोना !
.
स्कूल का क्लास
मैडम के आने से पहले
मैं मस्ती में कर रह था अट्टहास
मैडम ने जैसे ही मुझसे कुछ पूछा
रुक गयी सांस
फिर भी उन दिनों की रुकी साँसें ,
देती हैं आज भी खुबसूरत अहसास !
वो बचपन!!
.
स्कूल की छुट्टी के समय की घंटी की टन टन
बस्ते के साथ
दौड़ना , उछलना ...
याद है, कैसे कैसे चंचल छिछोड़े
हरकत करता था बाल मन
सबके मन में
एक खास जगह बनाने की आस लिए
दावं, पेंच खेलता था बचपन
हाय वो बचपन!!
.
वो चंचल शरारतें
चंदामामा की लोरी
दूध की कटोरी
मिश्री की चोरी !
आज भी बहुत सुकून देता है
वो बचपन की यादें
वो यादगार बचपन!!!!!!

Brajesh Asopa Dadhich

Ladki thodi healthy honi chahiye,

Ladki thodi healthy honi chahiye,
Patli toh nokia charger ki pin b hoti hai.....!!
Must read....All combined
*Mausam rainy hona chahiye,
Sunny toh deol b hai..
*Ladki aurat honi chahiye,
Mahela toh jaywardhne b hai..

*Ladka handsome hona chahiye,
Smart toh mobile b hote hai..
*Ladki akalmand honi chahiye,
Susil toh Shinde b hai..
*Ladki mein Attitude Hona Chahiye,
Angry toh Birds bhi hoti hai..
*Ladki cute honi chahiye,
Lovely toh university b hai..
*Ladki dikhne me achi ho,
Hot toh aalu k pranthe b hote hai..
*Bande ki izzat honi chahiye,
paise to sunny leone k paas b hai..
*Ladki hasi majak wali honi chahiye,
Cute toh puppy b hote hai..
*Ladka dimaag wala hona chahiye,
Engineer toh Osama bin laden btha..
*Ladki thodi healthy honi chahiye,
Patli toh nokia charger ki pin b hoti hai..
*Girlfriend passionate honi chahiye,
Caring toh Nurse bhi hoti hai....
*Admin creative hona chahiye
post toh postman bhi karta hai

Kaamwali

Kaamwali ne pagaar badhane ke liye kaha.

Lady: "Kyo badhaau?"

Kaamwali: "Bibiji, 3 reasons hai.
1st, mai aap se behtar kapde press karti hu."

Lady: "Ye kaun bola?"

Kaamwali: "Saahab bole.
2nd reason, mai aap se behtar khana banaati hu."

Lady: "Ye kaun bola?"

Kaamwali: "Saahab bole.

Aur
3rd reason ye ki SEX me aap se jyada maja deti hu."

Lady (gusse me chilla ke): "Kya ye bhi Saahab bole?"

Kaamwali: "Nahi bibiji, ye baat to aap ka driver bola"..=D =)).
Lady: kitni pagaar chahiye bolo.. ???

Wednesday, June 5, 2013

हरिया

आज हरिया बहुत खुश था। तीन चार दिन की भाग–दौड़ के बाद आखिर पैसे निकलवाने की मंजूरी मिल ही गई थी। हरवर्ष ऐसा होता था। मंजूरी मिलने पर वह बड़े बाबू की शरण में जाता था जहाँ कुछ दे कर ही रुपए निकलते थे। इस ‘कुछ’ में बड़े साहब का भी हिस्सा था, ऐसा बड़े बाबू कहते थे।
इस बार हरिया ने सोचा थाकि क्यों न बड़े साहब सेही मिला जाए और सीधी बातकी जाए। यह सोच कर वह बड़े साहब के दफ्तर की ओर चल पड़ा। ‘‘किसी भी काम के लिए सीधे बड़े साहब से मिले’’ की तख्ती पढ़ कर उसका हौसला बढ़ा।
‘‘मे आई कम इन सर’’ हरिया ने डरते–डरते पूछा। दफ्तर में पानी पिलाने का कार्य करते यह वाक्य उसने सीख लिया था।
‘‘यस’’ मैं वाटरमैन हरिया–
हाँ कहो, साहब ने बिना उसकी ओर देखे कहा।
साहब, ये मेरा छोटे से लोन का बिल था–आपके साइन हो जाते तो
‘लाओ।’
फुर्ती से हरिया ने बिल आगे किया, साहब ने साइन किए। वह लौटने लगा।
सुनो, साहब ने कहा।
जी, हरिया ठिठक गया। उसेलगा अब साहब उससे पैसे भी मांग सकते हैं अथवा बिल भी लटका सकते हैं।
इधर आओ–साहब ने जोर देकर कहा तो हरिया उनके बिल्कुल पास जा खड़ा हुआ।
अच्छी पगार है तुम्हारी–कपड़े साफ–सुथरे पहना करो, धोते नहीं क्या इन्हें?ये लो–इससे साबुन खरीद लेना– आइंदा जब आओ तो कपड़े धुले होने चाहिए। कह कर साहब ने पचास का नोट उसे थमा दिया।
हरिया को कुछ नहीं सूझा। वह साहब के पाँव पकड़ कर बोला।
साहब आपके नाम पर बड़े बाबू हर वर्ष मुझसे पैसे ऐंठते रहे। आप तो देवता आदमी हैं कहते हुए उसकी आँखें भर आईं।
दफ्तर से बाहर निकलते हुए हरिया सोच रहा था काश! वह पहले ही बड़े साहब से मिला होता। कही–सुनी बातें सुन कर अपना नुकसान करता रहा था।
उधर दफ्तर में बैठे–बैठे बड़े साहब सोच रहे थे–काश! ये हरिया और हरिया जैसे न जाने कितने सीधे उस तक पहुँच पाते। न जाने ऐसा कब तक चलता रहेगा?

राष्ट्र प्रेम

इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे। उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।

एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा - अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।

डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया - अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है। आपके देश की कोई भाषा नहीं है? डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ-साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक-महक नहीं थी।

गृहस्वामिनी बोली - डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते।

गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया - मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्‍यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी।

फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था। स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी।

एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ-साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।

बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है? मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुना पाते। साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार-बार आग्रह करने पर वह बोली - 'महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?'

साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा - 'बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा - 'महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।'

इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं 'लड़की' नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है। साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती। जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया।

मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा। यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। गृहस्वामिनी ने कहा - 'डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ। हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं...।'

हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई। आप समझ रहे हैं न!

हिन्दी अपनाएं ! देवनागरी विश्व की प्राचीनतम लिपी है !
यह सबसे अधिक वैज्ञानिक व समृद्ध भाषा है !
हिन्दी के शब्द भंडार में 70000 से अधिक मूल शब्द हैं !
जो विश्व की किसी भी अन्य भाषा से बहुत अधिक हैं !