Thursday, November 8, 2018

हवा में घुलता ज़हर

पटाख़े फूट रहे है.दरवाज़ा खोल बालकनी में गया तो धुआँ ही धुआँ सीधे नाक से होता फेफड़े में घुस आया. किसी घनघोर राष्ट्रवादी की दीवार पर पढ़ा था कि हमें मत सिखाओ कैसे त्योहार मनाना है. पर साँस तो तुम्हें भी लेना है न यार...

मिठाई खा लिये. दोस्तों के साथ त्योहार मना लिये. तिलक वाली तस्वीर लगा लिये. अब साँस फूल रही है. दरवाज़ा, खिड़की बंद कर बैठे है. ऐसा लग रहा है सारा ऑक्सिजन सोख लिया गया है.

वो कौन होगा जो अपने हाथो अपना गला घोंट लेगा. अफ़सोस वो हम ही है. देवी लक्ष्मी से धन की कामना करते हाँफते लोग क्या थोड़ी सी साफ़ हवा भी नही माँग सकते. माँगने की ज़रूरत भी नही होगी. सबअपने हाथ में ही है.

No comments:

Post a Comment