Saturday, November 17, 2018

यारी

#यारी
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" मौलवी साहब ..बाहिर आइये ...देखिये काफिरों ने क्या कर दिया ....अरे ! ' गीता रखी है मस्जिद में ...मस्जिद को नापाक करने की कोशिश की है ....!

दीनपुर ...एक ऐसी तहसील जिसका निजाम जुरूर परगना अधिकारी (S.D.M) के नाम से चलता है ...लेकिन जिसका कानून शहर काजी चलाते हैं ....मैंने उड़ते-उड़ते ये भी सुना है कि यहाँ शरीयत से तहसील हाँकी जाती है ....दबी जुबान में लोग इस तहसील को मुस्लिम गढ़ तो मुगलिया जागीर भी बयान करते हैं ...

यहाँ दाखिल होते ही दुनिया मुझे कुछ अलग सी लगी ...अलग सा एक वातावरण ..अजब सा एक दस्तूर ...आदमी बेसबब चेहरे पहने दिखे ...मगर औरतों के नाम पर मैंने सिर्फ काला लिबास देखा ,, पर्दा औरतों से होकर , हर मकान , दुकान से होता हुआ मजाहिब के उन सुतूनों (आधार स्तम्भ) पर भी डला था जहाँ बच्चियाँ कुरआन पढ़ती हैं ... बच्चियाँ यहाँ मेट्रो सिटीज या किसी छोटे -मोटे मॉडर्न शहर सी भी नही दिखती ...उनके सीने में कुरआन और सर पर हिजाब बयाँ करता है कि वह आदतन इस महौल और वेशभूषा में ढल चुकी हैं ....वक्त से पहले तजुर्बों से पकी उनकी अम्मियाँ भी सौदा मंगवाने के लिए बेंत या बाँस के पर्दे के पीछे से आवाज लगाती हैं ....

खुलेआम कटता गोश्त , और सींक कवाब , रुमाली रोटी पर घिरी भीड़ ये बयाँ करती है कि यहाँ कोई हिन्दू या गैर मजहबी नही रहता ....

लेकिन मेरा ये विश्वास अगले सात कदम पर दम तोड़ गया ... हरिहर  पंक्चर वर्क्स का एक होर्डिंग एक बरगद के पेड़ पर टँगा मिला और उसी के साथ टँगे मिले दो स्कूटर के पुराने बेदम टायर ......

उसी होर्डिंग के नीचे झीनी कॉलर फरार कमीज पहनें एक साँवला सा अधेड़ एक टायर पर पंक्चर जोड़ता नजर आया ......

आगे तीन मुस्लिम बच्चों से अकेले लोहा लेता उसका 11 साला बच्चा ...दरअसल कंचे (अंठी ) पर बात ठन गई ...ऐसा लगा मुझे कि उसके साथ बेईमांटी ( बेमानी ) हुई थी..... बात गोट से लंगोट तक न पहुँचे तो हरिहर ने आवाज लगाकर चंदू को पुकारा और अपने पास बैठा लिया .....

लेकिन बचपन यदि खूँट से बंध जाए तो ...बचपन हराम कहलाता है ...हरिहर ने उसका बस्ता पेड़ से उतारा और ब्लेड से पेन्सिल छील उसके हाथ में टेक दी ..ताकि वो कल पंक्चर न जोड़े ...लेकिन ढेड़ सौ ग्राम आँसू जाया कर चुका चन्दू अब भी  स्टोर में रखे आँसू जाया कर रहा था ....

" ये ले चन्दू ...मेरे कंचे ले ..ले !"

नदीम अशरफ खाँ,, चन्दू की ही उम्र का ही पिद्दा ...लेकिन खासियत ये कि शहर इमाम ( मौलवी) का लौंडा ...चन्दू ने लपक के कंचे ले लिए ..लेकिन हरिहर ने उसे अपनी कमीज से पोंछकर नदीम को वोवापस लौटा दिये ...और बोला ...

" नदीम बेटा ...रहने दो अभी हम काम से अलग होते ही दिलवा देंगे ...."

मैंने चन्दू की आँखों में इस बार आँसू नही एक चमक और स्नेह देखा ... बचपन ..बचपन पर फ़िदा हो चुका था ...मुझे यकीन था कि अब से कुछ दिन तलक ये साथ खेलेंगे ...फिर  रसूख दबदबा और मजहब इस खेल को बिगाड़ देगा ....

लेकिन शुक्र खुदा का कि दोनों एक ही सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं तो दोस्ती टिकी रहेगी ....और चन्दू  गरीब यानि उस तहसील की अल्पसंख्यक औलाद ..इमाम के लौंडे के साथ दोस्ती का सफल पेंच निभा पाया तो महफूज और खुशहाल भी रहेगा ....

इस मुस्लिम झुरमुट के बीच मुझे ..हरिहर का होना बहुत अखरा ..या मुझे उसपर कोशों तरस आया ... और उससे जियादह दर्द तब हुआ जब हरिहर की लुगाई को आते देखा ...वो   पहनती तो सूट -सलवार है लेकिन करती वो भी पर्दा है ..फूँकनी से भी पतला जिस्म ..पैरों पर झेरे भर पायजेब ...हाथों में ऊंघती घूनी चूड़िया ...सुना रिवाज सा बन गया है शहर का ...कि औरत पर्दे में और आदमी पैर के टखनों से  ऊपर तलक पायजामा और सर पर टोपी रखे ......

ये मेरी बर्रा खोपड़ी को लगने  वाला दूसरा ...करंट था कि जब मैं अगले दिन चन्दू के स्कूल के करीब से गुजरा ...तो पता चला मास्टर काशीराम भी हिन्दू हैं....और अब तलक " श्रीराम " का नाम मैनेज करे हुयें है ...जबकि पांच  वक्त गूँजती अजानें ...नात ..कव्वाली ..और इज्तमाओं के रेलों के बीच मैंने उनको कमर में हाथ धर उठते वक्त श्रीराम कहते हुए सुना .....

उनका श्रीराम को अक्सर याद कर लेना आता -जाता यूँ भी पचा लेता है क्यूँकि वो अंग्रेजी और गणित के कर्रे मास्टर है...और जैसा हाल हम तीसरी दुनिया के मर्दों का अंग्रेजी औरतों को  देखकर होता है वैसा ही अंग्रेजी सुनकर भी ....क्यूँकि इन्हीं दो वसवसों में बहकर या बिककर हम में कुछ राम -अल्लाह वालों ने अपना भगवान और ईमान भी कभी बेचा है......

तकरीर भी अच्छी फूँक लेते है ..मास्टर जी ...मतलब वो आज भी हिम्मत रखते हैं ये कहने की ..कि भगवान या रहमान एक ही चीज है और हर मजहब और मजहब वालों की इज्जत ख़ुदा और राम का ही काम है .....

काशीराम के विश्वास के ही बूते ..कुछ और हिन्दू परिवार भी दीनपुर चले आये ...और किसी भी जमीन और मुल्क में अल्पसंख्यक चाहे कितने भी बड़े प्रेम और दया की बूँद हो ...सदैव उनके सागर बनने का भ्रम बना रहने से कुछ लोग इसपर दुकान और रमण लगाकर कारोबार जमा ही लेते हैं ....

इसी तरह दीनपुर के कुछ विशुद्ध कट्टर मुसलमानों ने उन्हें तंग और बदनाम करने की साजिशें शुरू कर दी ....वो किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के वास्ते बस मौका और हथियार तलाश रहे थे ...

और वो वक्त बखूब आया भी ......एक रात इरफान मुल्ला अपने हुजरे में खा डकार के पेट की गैस से लोहा ले रहे थे ..और नींद उनसे कोशों दूर खड़ी होकर उनका मजाक उड़ा रही थी ...तभी उनके कानों में मस्जिद का दरवाजा खुलने की आवाज गिरी ....वो लुंगी डाल जैसे ही मस्जिद में दाखिल हुए ...मस्जिद के दरवाजों को खुला पाया ...उन्होंने अंदर झाँका ..और फिर दबे  पैर अंदर दाखिल हुए ....लेकिन उनको कुछ नजर न आया लौट ही रहे थे कि तभी उनकी नजर मस्जिद के बड़े फूलदान पर जा लगी ...जो हौले -हौले काँप रहा था ..उन्होंने जाकर देखा तो पाया वहाँ एक किताब रखी थी ...उन्होंने हाथ से उसे उठाकर देखा तो चकरा गए ...लपककर ..गुस्से में फुंकार कर बाहिर आये और सीधे मौलवी साहब के हुजरे के बाहर खड़े होकर बोले -

" मौलवी साहब ..बाहिर आइये ...देखिये काफिरों ने क्या कर दिया ....अरे ! ' गीता रखी है मस्जिद में ...मस्जिद को नापाक करने की कोशिश की है ....!

देखते ही देखते ..बन्द दरवाजे खिड़कियाँ खुलने लगी ...और खुलने लगी जुबानें और औजारों की पेटियाँ ...हर पुराना हथियार गाजी होने की सनद थी ...वो दस एक हिन्दू परिवार ऐसे काँपने और रुँधने लगे जैसे मौत और उनके बीच महज एक दरवाजा खुलने या उसके टूटने तलक भर की देरी है ...पहली बार मास्टर काशीराम भी घुटनों पर आ गए ...उन्हें भी लगने लगा कि अब वो होने वाला है जो मेरी दी हुई विद्या और विश्वास सबको जला कर होम कर देगा .....

इस उठापटक में चन्दू कहीं नही दिख रहा था ...उसे लगातार जो आँखे और कदम ढूँढ रहे थे उनमें हरिहर , उसकी पत्नी के साथ उसका जिगरी यार नदीम भी था ....

आखिर यारी ने यारी को ढूँढ ही लिया क्यूँकि यारी को ही यारी के सारे अड्डे और फड्डे मालूम होते है ....तब तलक चन्दू के माता-पिता भी उस तलक पहुँच बना चुके थे ...चन्दू बहुत घबराया हुआ था और उसने नदीम से  हकलाते हुए कुछ बोला...

तभी मौलवी साहब भीड़ को दिशा और हुक्म देने ऊपर मसाजिद की मीनार पर चढे ...मुझे पता नही था कि वो क्या कहेंगे ...तभी किसी ने पूरी भीड़ का हल्ला एक आवाज से काट दिया ...वो आवाज जो मस्जिद के अंदर रखे माइक से गुजर कर हर सिम्त फैलती चली गई ...

" अब्बू ...मस्जिद में ये किताब मैंने रखी है ..अब्बू मैं नदीम हूँ ...अब्बू आप ही ने कहा था कि अल्लाह के रसूल ने हर मजहब और मजहब वालों की इज्जत की ...आप ही ने कहा था कि उन्हें कुरआन के अलावा और हर किताब से नफरत होती तो वो उन तमाम किताबों को जलाने या ख़ाक करने का हुक्म देते जो किसी और खुदा की गवाही देते है ...अब्बू आप ही कहते है कि सच्चा इस्लाम वो जो गिरते हो उठाये ...अब्बू मैंने भी एक मजहब की ये मुक़द्दस किताब कहीं गिरी देखी और सोचा  खुदा के घर में सम्हाल देता हूँ .. जिसकी होगी मेरा अल्लाह उसे लौटा देगा .....

थू साला थू ...करके भीड़ मुड़ने लगी ...लौंडा औकात से बाहर है ...लौंडे को छूट मिल गई है ..लौंडा हाथ से निकल गया है वगैरह -वगैरह  कहकर भीड़ छँट गई .....और भीड़ के छँटते ही नजर आया चन्दू ...जिसने दौड़कर नदीम को अपने गले लगा लिया ...झर -झर आँसू बहने लगे ..हरिहर और उसकी लुगाई की आँखों से ....

तभी नदीम बोला ...ये तो बता तुझे ये किताब मिली कहाँ और तूने इसको मस्जिद में ही क्यूँ रखा पागल ...?

चन्दू बड़े  लाड़ से बोला ...

" अले याल ...मुझे  एक अंतल ने दस रूपये दिए और बोला मस्जिद में रख आ ..औल मैंने लख दी ....

मौलवी साहब जो उन दोनों बच्चों के स्नेह , प्रेम , समर्पण और मित्रता को देख आँखों में नमी लेकर  मुस्कुराह रहे थे ...चन्दू का जवाब सुनकर सन्न रह गए ....क्यूँकि वो जान गए कि चन्दू जैसे मासूम को लालच देकर गीता, मस्जिद में रखवाने वाला कोई अपना ही था ....

खैर नदीम बोला -

" यार मास्टर जी ठीक बोलते हैं.. कि गीता में बड़ी ताकत है ...अल्हम्दुलिल्लाह आज देख भी लिया ......चल डब्बा-गिट्टी खेलते है " ......नवाज़िश
#जुनैद.........

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